संसद, विशेषाधिकार और असहमति का संवैधानिक संतुलन

 लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला 


संसद, विशेषाधिकार और असहमति का संवैधानिक संतुलन

भारतीय लोकतंत्र की संरचना तीन मूलभूत स्तंभों पर टिकी है — प्रतिनिधित्व, जवाबदेही और संस्थागत संतुलन। संसद इन तीनों का संगम है। इसलिए सदन के भीतर उत्पन्न हर टकराव केवल राजनीतिक घटना नहीं, बल्कि संवैधानिक संस्कृति की परीक्षा भी होता है।

हाल के संसदीय विवादों ने एक गंभीर प्रश्न को जन्म दिया है: "क्या हम प्रक्रियाओं का संरक्षण कर रहे हैं, या प्रक्रियाओं के माध्यम से राजनीति का विस्तार देख रहे हैं?

## संसदीय विशेषाधिकार: शक्ति नहीं, संरक्षण का सिद्धांत

संविधान ने संसद को विशेषाधिकार दिए हैं, पर उनका मूल उद्देश्य सत्ता का विस्तार नहीं, बल्कि विधायी कार्यों की निर्बाधता सुनिश्चित करना है। विशेषाधिकार का सिद्धांत इस विचार पर आधारित है कि निर्वाचित प्रतिनिधि भय, दबाव या बाहरी हस्तक्षेप से मुक्त होकर बोल सकें।


यही कारण है कि विशेषाधिकार हनन की कार्यवाही को सदैव अत्यंत सावधानी से देखा गया है। क्योंकि यह औज़ार यदि संतुलित विवेक से न प्रयोग हो, तो वह लोकतांत्रिक असहमति पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकता है।


## अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बनाम सदन की मर्यादा


संसद में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पूर्णतः असीमित नहीं है। उसे सदन की मर्यादा, नियमों और प्रक्रियाओं के भीतर ही संरक्षित किया गया है। परंतु लोकतांत्रिक सिद्धांत यह भी स्पष्ट करता है कि:


* तीखा प्रश्न असंसदीय नहीं होता

* असहज आरोप स्वतः अवैध नहीं होते


वास्तविक परीक्षण आरोप की प्रकृति, भाषा और प्रमाणिकता का होता है।


यदि किसी वक्तव्य को कार्यवाही से निष्कासित किया जाता है, तो यह आवश्यक है कि वह निर्णय वस्तुनिष्ठ और नियमाधारित प्रतीत हो। अन्यथा, लोकतांत्रिक विमर्श में निष्पक्षता की धारणा प्रभावित होती है।


## बहुमत की संवैधानिक सीमा


संसदीय लोकतंत्र में बहुमत शासन की स्थिरता का आधार है। किंतु संवैधानिक दर्शन यह भी कहता है कि बहुमत संवैधानिक मर्यादा से ऊपर नहीं हो सकता।


बहुमत का प्रयोग:


* नियमों के संरक्षण हेतु हो — वैध

* असहमति के प्रबंधन हेतु हो — विवादास्पद

* असहमति के दमन हेतु प्रतीत हो — चिंताजनक


लोकतंत्र में संख्या शक्ति देती है; वैधता संतुलन से आती है।


## विशेषाधिकार कार्यवाही का नैतिक आयाम


विशेषाधिकार हनन या सदस्यता से जुड़े कठोर उपाय विधिक प्रक्रियाएँ अवश्य हैं, पर उनका प्रभाव राजनीतिक से अधिक संस्थागत होता है। ऐसे कदम केवल एक प्रतिनिधि को प्रभावित नहीं करते; वे संसदीय परंपरा और लोकतांत्रिक मानस पर दीर्घकालिक संकेत छोड़ते हैं।


इसीलिए संसदीय इतिहास में ऐसे औज़ारों का उपयोग सदैव अंतिम विकल्प के रूप में देखा गया है, न कि प्राथमिक प्रतिक्रिया के रूप में।


## आरोपों की संवैधानिक स्थिति


लोकतांत्रिक ढाँचे में आरोपों का स्थान जटिल है।


* विपक्ष का अधिकार — प्रश्न उठाना

* सत्ता का दायित्व — उत्तर देना

* संस्थाओं का कर्तव्य — संतुलन बनाए रखना


आरोपों का सत्यापन न्यायिक, जाँच और प्रमाणिक प्रक्रियाओं का विषय है। संसद का दायित्व आरोपों का राजनीतिक परीक्षण है, विधिक निर्णय नहीं।


यदि आरोपों पर बहस से पहले प्रक्रियात्मक कार्रवाई प्रमुख बन जाए, तो लोकतांत्रिक विमर्श की दिशा पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है।


## नैतिकता, वैधता और लोकतांत्रिक विश्वास


राजनीतिक जीवन में विधिक दोष सिद्धि और नैतिक अपेक्षाएँ अलग-अलग विमर्श उत्पन्न करती हैं। संवैधानिक संस्थाएँ विधिक ढाँचे से संचालित होती हैं, पर लोकतांत्रिक विश्वास अक्सर नैतिक आचरण से निर्मित होता है।


यहीं लोकतंत्र की सबसे कठिन चुनौती उपस्थित होती है — "कानून पर्याप्त है या नैतिक आभास भी आवश्यक है?"


## संसद की संस्थागत जिम्मेदारी


संसद केवल बहुमत का मंच नहीं; वह अल्पमत की सुरक्षा का भी तंत्र है। लोकतांत्रिक परंपरा का सार यह है कि सत्ता और प्रतिपक्ष के बीच संघर्ष हो, पर संस्थाओं की निष्पक्षता निर्विवाद प्रतीत हो।


लोकतंत्र में सबसे खतरनाक स्थिति वह नहीं जब विवाद तीखे हों,

बल्कि वह जब प्रक्रियाएँ पक्षपातपूर्ण दिखाई देने लगें।


## संतुलन की अनिवार्यता


भारतीय लोकतंत्र की परिपक्वता इस बात से आँकी जाएगी कि:

विशेषाधिकार का प्रयोग कितनी संयमित विवेकशीलता से होता है

 बहुमत असहमति के प्रति कितना धैर्य प्रदर्शित करता है

 विपक्ष आरोपों के प्रति कितनी प्रमाणिक अनुशासनशीलता बनाए रखता है

क्योंकि अंततः "संसद में हर टकराव का वास्तविक दांव किसी दल या नेता का नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक विश्वास का होता है।"