आर्थिक नियमन, संपादकीय स्वतंत्रता और लोकतंत्र की कसौटी

 लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला 


आर्थिक नियमन, संपादकीय स्वतंत्रता और लोकतंत्र की कसौटी

भारत की न्यायिक-राजनीतिक बहस में हाल में एक महत्वपूर्ण हस्तक्षेप तब सामने आया जब न्यायमूर्ति B. V. Nagarathna ने यह टिप्पणी की कि “राज्य के आर्थिक नियमन संपादकीय स्वतंत्रता पर गहरा प्रभाव डालते हैं।” यह कथन केवल विधिक व्याख्या नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक संरचना के उस जटिल आयाम की ओर संकेत है जहाँ अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और आर्थिक नियंत्रण आपस में गुंथे हुए हैं।

यह प्रश्न आज इसलिए अधिक प्रासंगिक है क्योंकि वैश्विक सूचकांकों—विशेषकर Reporters Without Borders द्वारा जारी 'Press Freedom Index'—में भारत की स्थिति पिछले वर्षों में गिरती रही है। सरकार इन आकलनों की पद्धति पर प्रश्न उठाती रही है; आलोचक इसे संस्थागत दबावों का संकेत मानते हैं। सत्य संभवतः इन दोनों के बीच की जटिलता में निहित है।


1. ‘डायरेक्ट’ बनाम ‘इनडायरेक्ट’ सेंसरशिप: संवैधानिक बहस


भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19(1)(a) अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की गारंटी देता है, जबकि अनुच्छेद 19(2) “यथोचित प्रतिबंधों” की अनुमति देता है। न्यायिक इतिहास बताता है कि प्रत्यक्ष सेंसरशिप—जैसे प्रकाशन-पूर्व रोक—लोकतंत्र में असाधारण परिस्थिति ही मानी जाती है।


न्यायमूर्ति नागरत्ना की टिप्पणी का केंद्रीय बिंदु यह है कि यदि राज्य विज्ञापन नीतियों, कर-प्रावधानों, लाइसेंसिंग, या नियामकीय तंत्र के माध्यम से मीडिया संस्थानों पर अप्रत्यक्ष दबाव बनाता है, तो यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को व्यावहारिक रूप से सीमित कर सकता है—भले ही औपचारिक रूप से सेंसरशिप न हो।


यहाँ प्रश्न सरकार की मंशा से अधिक संरचना का है:


* क्या सरकारी विज्ञापन वितरण पारदर्शी और मानकीकृत है?

* क्या कर-कार्रवाइयाँ चयनात्मक दिखती हैं?

* क्या नियामकीय ढाँचा प्रतिस्पर्धा को प्रोत्साहित करता है या कुछ समूहों को लाभ पहुँचाता है?


यदि इन प्रश्नों के उत्तर अस्पष्ट हैं, तो “आर्थिक प्रहार” की आशंका जन्म लेती है।


2. ‘Manufacturing Consent’ और कॉरपोरेट–राज्य संबंध


मीडिया अध्ययन में “Manufacturing Consent” की अवधारणा यह बताती है कि आर्थिक और संरचनात्मक कारक समाचार-चयन और प्रस्तुति को प्रभावित कर सकते हैं। भारत में मीडिया का बड़ा हिस्सा कॉरपोरेट स्वामित्व में है; राजस्व का महत्वपूर्ण अंश विज्ञापनों—सरकारी और निजी—से आता है।


इस परिप्रेक्ष्य में आलोचक कहते हैं कि एक “ईकोसिस्टम” विकसित हुआ है जहाँ राज्य और कॉरपोरेट हित परस्पर आश्रित हैं। सरकार को अनुकूल नैरेटिव; कॉरपोरेट को नीतिगत स्थिरता। परंतु यह भी उतना ही सत्य है कि डिजिटल मीडिया, स्वतंत्र पोर्टल और क्षेत्रीय पत्रकारिता ने वैकल्पिक आवाज़ें भी निर्मित की हैं।


अर्थात, परिदृश्य एकरूप नहीं है—बल्कि बहुस्तरीय है। चुनौती यह है कि आर्थिक निर्भरता संपादकीय स्वायत्तता को प्रभावित न करे।


3. राजनीतिक विमर्श: ‘कांग्रेस मुक्त भारत’ और वैचारिक प्रश्न


सत्ता-राजनीति में प्रयुक्त नारे—जैसे “कांग्रेस मुक्त भारत”—को समर्थक वैचारिक प्रतिस्पर्धा का रूप मानते हैं; आलोचक इसे विपक्ष-विहीन व्यवस्था की आकांक्षा के रूप में देखते हैं।


ऐतिहासिक रूप से Indian National Congress स्वतंत्रता आंदोलन का प्रमुख वाहक रही है। किंतु लोकतंत्र का मूल सिद्धांत यह है कि कोई भी दल स्थायी नहीं; संस्थाएँ स्थायी हैं। यदि राजनीतिक प्रतिस्पर्धा स्वस्थ और निष्पक्ष रहे, तो किसी भी दल की हार-जीत लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा है।


चिंता तब उत्पन्न होती है जब विपक्षी स्थान (opposition space) सिकुड़ता प्रतीत हो—चाहे वह प्रवर्तन एजेंसियों की कार्रवाइयों, संसदीय बहस के सीमित समय, या मीडिया कवरेज की असमानता के रूप में हो। यह धारणा, चाहे पूर्णतः सही हो या अतिरंजित, लोकतांत्रिक स्वास्थ्य पर प्रश्नचिह्न लगाती है।


4. सामूहिक स्मृति और संस्थागत संतुलन


स्वतंत्रता आंदोलन की विरासत—विचारों की बहुलता, असहमति का सम्मान, और संस्थागत संतुलन—भारतीय लोकतंत्र की आधारशिला है। यदि प्रेस आर्थिक रूप से निर्भर और राजनीतिक रूप से अनुकूलित हो जाए, तो वह “चौथा स्तंभ” से “सूचना-प्रसारक” में बदल सकता है।


परंतु यह भी ध्यान रखना आवश्यक है कि भारतीय न्यायपालिका, विशेषकर Supreme Court of India, ने कई अवसरों पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा की है। नागरिक समाज और डिजिटल प्लेटफॉर्म भी निरंतर सक्रिय हैं। इसलिए परिदृश्य को पूर्ण अंधकार या पूर्ण उजाले में देखना सरलीकरण होगा।


5. क्या ‘तानाशाही की आहट’?


“तानाशाही” एक गंभीर शब्द है। किसी भी लोकतंत्र में इसके संकेत संस्थागत क्षरण, चुनावी निष्पक्षता पर प्रश्न, और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के संकुचन से जुड़े होते हैं। भारत में नियमित चुनाव, न्यायिक हस्तक्षेप, और सक्रिय नागरिक विमर्श अभी भी विद्यमान हैं।


फिर भी, यदि आर्थिक नियमन पारदर्शी न हों और मीडिया-स्वामित्व का संकेन्द्रण बढ़ता जाए, तो लोकतंत्र की गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है। यही न्यायमूर्ति नागरत्ना की चेतावनी का सार है—कि स्वतंत्रता केवल संवैधानिक पाठ में नहीं, बल्कि उसके व्यावहारिक क्रियान्वयन में निहित है।


## सुधार का अवसर


भारत के सामने विकल्प द्वंद्वात्मक नहीं हैं।


* सरकार पारदर्शी विज्ञापन नीति और स्वतंत्र नियामकीय ढाँचे से आलोचनाओं को कम कर सकती है।

* मीडिया संस्थान स्व-नियमन और संपादकीय–व्यावसायिक पृथक्करण को सुदृढ़ कर सकते हैं।

* न्यायपालिका संतुलनकारी भूमिका निभाती रह सकती है।


लोकतंत्र का स्वास्थ्य केवल सूचकांकों से नहीं, बल्कि निरंतर आत्म-संशोधन की क्षमता से मापा जाता है। यदि आर्थिक नियमन और संपादकीय स्वतंत्रता के बीच संतुलन पुनर्स्थापित होता है, तो यह आलोचना नहीं, बल्कि सुधार का अवसर सिद्ध हो सकता है।


प्रश्न अंततः यही है: क्या भारत अपनी संवैधानिक आत्मा—स्वतंत्रता, बहुलता और असहमति—को आर्थिक और राजनीतिक दबावों के बीच अक्षुण्ण रख पाएगा? यही कसौटी आने वाले वर्षों में उसके लोकतांत्रिक चरित्र का निर्धारण करेगी।