हेडलाइन मैनेजमेंट, न्यायिक सक्रियता और पश्चिम एशिया: भारत की कूटनीति पर वैश्विक नज़र
लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला
हेडलाइन मैनेजमेंट, न्यायिक सक्रियता और पश्चिम एशिया: भारत की कूटनीति पर वैश्विक नज़र
भारतीय अख़बारों के पहले पन्ने अक्सर उस दिन की “राष्ट्रीय प्राथमिकता” का सार्वजनिक संकेत होते हैं। आज जब NCERT की पाठ्यपुस्तक पर Supreme Court of India के स्वतः संज्ञान और प्रधानमंत्री Narendra Modi की Israel यात्रा—दोनों—समाचार-सरणी में साथ उपस्थित हैं, तब विभिन्न अख़बारों की प्राथमिकताएँ अपने-अपने संपादकीय विवेक और संस्थागत दृष्टिकोण का प्रतिबिंब बन जाती हैं।
The Hindu और Hindustan Times ने एनसीईआरटी प्रकरण को प्रमुखता दी; The Indian Express ने इज़राइल यात्रा को लीड बनाते हुए न्यायपालिका की टिप्पणियों को तीखे शीर्षक के साथ प्रकाशित किया; The Telegraph और The Times of India ने पश्चिम एशिया में भारत की भूमिका और समझौतों पर फोकस किया। यह विविधता भारतीय मीडिया-परिदृश्य की बहुलता का प्रमाण है—पर साथ ही यह प्रश्न भी उठाती है कि क्या “हेडलाइन मैनेजमेंट” धीरे-धीरे संस्थागत स्वभाव बनता जा रहा है।
## न्यायपालिका बनाम पाठ्य-विमर्श: संस्थागत संदेश
सर्वोच्च न्यायालय द्वारा स्वतः संज्ञान और कठोर टिप्पणियाँ—विशेषतः न्यायपालिका की गरिमा पर संभावित आघात की चिंता—लोकतांत्रिक संस्थाओं के बीच शक्ति-संतुलन का संकेत हैं। शिक्षा मंत्री की सार्वजनिक प्रतिक्रिया और जवाबदेही तय करने की बात यह दर्शाती है कि कार्यपालिका भी इस प्रकरण को हल्के में नहीं ले सकती।
परंतु इसी परिप्रेक्ष्य में जब असम के मुख्यमंत्री Himanta Biswa Sarma को Gauhati High Court से नोटिस की खबर अंदर के पन्नों पर सिमट जाती है, तब यह बहस जन्म लेती है कि संस्थागत सक्रियता और मीडिया-प्राथमिकता का संबंध कितना स्वतंत्र है। लोकतंत्र में यह संतुलन—न्यायिक सतर्कता, कार्यपालिका की जवाबदेही और मीडिया की स्वतंत्रता—सिर्फ आंतरिक मामला नहीं; यह भारत की वैश्विक छवि से भी जुड़ता है।
## पश्चिम एशिया की ओर: रणनीतिक पुनर्संयोजन
प्रधानमंत्री की इज़राइल यात्रा पर अंतरराष्ट्रीय मीडिया की दृष्टि अधिक व्यापक है। Al Jazeera, Gulf News और The New Arab जैसे मंचों पर विश्लेषणों ने इसे भारत की विदेश नीति में “रणनीतिक बदलाव” के संकेत के रूप में पढ़ा है।
Benjamin Netanyahu के साथ वार्ताओं में रक्षा, प्रौद्योगिकी और डिजिटल भुगतान (UPI) जैसे समझौते उजागर हुए। भारतीय मीडिया के एक हिस्से ने इसे “असाधारण रूप से उत्पादक” कहा; वहीं अरब विश्लेषकों ने इसे उस समय का संकेत माना जब ग़ाज़ा संघर्ष के कारण इज़राइल के कई पारंपरिक साझेदार असहज हैं। इस संदर्भ में भारत का सार्वजनिक रुख—आतंकवाद की निंदा के साथ इज़राइल के प्रति स्पष्ट एकजुटता—नई दिल्ली की पारंपरिक “संतुलित” नीति से भिन्न प्रतीत होता है, जो ऐतिहासिक रूप से फिलिस्तीनी आकांक्षाओं के समर्थन और दो-राष्ट्र समाधान की वकालत से चिह्नित रही है।
## वैश्विक दक्षिण की दृष्टि और शक्ति-समीकरण
अरब विश्लेषकों का तर्क है कि यदि भारत–इज़राइल निकटता सैन्य-साझेदारी तक गहराती है, तो यह क्षेत्रीय शक्ति-समीकरण—विशेषतः पाकिस्तान, तुर्की और सऊदी अरब—के साथ नई प्रतिस्पर्धा को जन्म दे सकती है। यह भी रेखांकित किया गया कि 7 अक्टूबर 2023 के बाद “ग्लोबल साउथ” के नेताओं की इज़राइल यात्राएँ सीमित रही हैं; ऐसे में भारत की उपस्थिति प्रतीकात्मक रूप से अधिक महत्व रखती है।
भारत के लिए यह अवसर भी है—उन्नत रक्षा-तकनीक, साइबर सहयोग और नवाचार-आधारित साझेदारी—पर जोखिम भी है: ऊर्जा-आपूर्ति, प्रवासी भारतीयों की सुरक्षा और अरब जगत में उसकी दीर्घकालिक साख। कूटनीति का मूल्यांकन तात्कालिक समझौतों से अधिक, दीर्घकालिक धारणा-निर्माण से होता है।
## घरेलू विमर्श, अंतरराष्ट्रीय प्रतिध्वनि
विपक्षी नेताओं—जैसे Rahul Gandhi और Jairam Ramesh—ने यात्रा को अमेरिका-भारत समझौतों और कथित “एप्सटीन फाइल” संदर्भों से जोड़ते हुए सवाल उठाए हैं। सरकार ने इन आरोपों को निराधार बताया है। किंतु अंतरराष्ट्रीय मंच पर आरोप–प्रत्यारोप से अधिक महत्व उस निरंतरता का है जो किसी देश की विदेश नीति को विश्वसनीय बनाती है।
यदि दुनिया के विश्लेषक यह निष्कर्ष निकालते हैं कि भारत अपनी ऐतिहासिक संतुलित नीति से हटकर स्पष्ट ध्रुवीकरण की ओर बढ़ रहा है, तो यह बदलाव केवल पश्चिम एशिया तक सीमित नहीं रहेगा; यह संयुक्त राष्ट्र मंचों, ब्रिक्स और ग्लोबल साउथ की राजनीति में भी परिलक्षित होगा।
## प्रश्न: कीमत और दिशा
भारत की कूटनीति आज दो मोर्चों पर परीक्षा दे रही है—भीतर, जहाँ न्यायपालिका और शिक्षा-विमर्श के प्रश्न संस्थागत स्थिरता को चुनौती देते हैं; और बाहर, जहाँ पश्चिम एशिया में रणनीतिक पुनर्संयोजन उसकी नैतिक-साख को कसौटी पर रखता है।
कूटनीति में मित्रताएँ स्थायी नहीं, हित स्थायी होते हैं। किंतु हित भी तभी दीर्घजीवी बनते हैं जब वे सिद्धांतों की नींव पर खड़े हों। आज की सुर्खियाँ चाहे जो कहें—लीड हो या अंदर का पन्ना—इतिहास अंततः उसी कथा को दर्ज करता है जिसमें शक्ति और नैतिकता का संतुलन कायम रहता है। प्रश्न यही है: क्या भारत यह संतुलन साध पाएगा, या हेडलाइन-प्रबंधन के शोर में दीर्घकालिक रणनीतिक स्पष्टता धुँधली पड़ जाएगी?
