ढाका का संवैधानिक द्वंद्व: सत्ता, शिष्टाचार और संतुलन की परीक्षा”

 लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला 


“ढाका का संवैधानिक द्वंद्व: सत्ता, शिष्टाचार और संतुलन की परीक्षा”

बांग्लादेश की राजनीति एक बार फिर उस परिचित मोड़ पर खड़ी दिखाई देती है जहाँ सत्ता परिवर्तन के बाद संस्थागत संतुलन की असली परीक्षा शुरू होती है। चुनावी अस्थिरता और लंबे संक्रमण काल के पश्चात बनी नई सरकार के बीच राष्ट्रपति मोहम्मद शहाबुद्दीन का हालिया इंटरव्यू केवल एक राजनीतिक बयान नहीं, बल्कि संवैधानिक विमर्श का केंद्रबिंदु बन गया है।

राष्ट्रपति के आरोप—असहयोग,l संवैधानिक प्रावधानों की अनदेखी, और शिष्टाचारिक परंपराओं के क्षरण—राजनीतिक विवाद से कहीं अधिक गहरे प्रश्न उठाते हैं: संक्रमणकालीन शासन में संस्थाओं की सीमाएँ क्या हैं? कार्यपालिका और राष्ट्रपति के बीच संवाद की अनिवार्यता कितनी कठोर है? और सबसे महत्वपूर्ण—क्या राजनीतिक स्थिरता के नाम पर संवैधानिक मर्यादाएँ लचीली हो सकती हैं?


## संवैधानिक शिष्टाचार बनाम राजनीतिक व्यावहारिकता


किसी भी संसदीय लोकतंत्र में राष्ट्रपति की भूमिका सामान्यतः औपचारिक मानी जाती है, परंतु औपचारिकता का अर्थ महत्वहीनता नहीं होता। संवैधानिक शिष्टाचार—जैसे विदेश दौरों के पश्चात राष्ट्रपति को सूचित करना, राष्ट्रीय समझौतों की जानकारी देना—कानूनी अनिवार्यता से अधिक संस्थागत विश्वास का आधार होते हैं।


यदि राष्ट्रपति के आरोप तथ्यात्मक रूप से सही हैं, तो यह प्रश्न स्वाभाविक है कि क्या कार्यपालिका ने procedural propriety की उपेक्षा की? और यदि उपेक्षा हुई, तो क्या वह आपातकालीन परिस्थितियों की विवशता थी या राजनीतिक प्राथमिकताओं का परिणाम?


संक्रमणकालीन शासन अक्सर “असाधारण परिस्थितियों” का हवाला देता है। किंतु लोकतंत्र की स्थिरता का आधार यही है कि असाधारण परिस्थितियों में भी संस्थागत संवाद बना रहे।


## अध्यादेशों की राजनीति और वैधता का प्रश्न


राष्ट्रपति द्वारा 132 अध्यादेशों पर जताई गई असहमति एक और संवेदनशील पहलू को उजागर करती है। अध्यादेश, सिद्धांततः, तात्कालिक आवश्यकता के उपकरण होते हैं—स्थायी शासन के विकल्प नहीं।


अध्यादेशों की अधिकता दो तरह की चिंताएँ जन्म देती है:


* क्या विधायी प्रक्रिया पर्याप्त रूप से सक्रिय थी?

* क्या अध्यादेश नीति-निर्माण का स्थायी माध्यम बनते जा रहे हैं?


यह प्रवृत्ति केवल बांग्लादेश तक सीमित नहीं; वैश्विक लोकतंत्रों में भी कार्यपालिका के विस्तार का यह पैटर्न दिखाई देता है।


## संस्थागत दूरी: संकेत और जोखिम


राष्ट्रपति का यह दावा कि मुख्य सलाहकार ने उनसे मुलाकात तक नहीं की, प्रतीकात्मक रूप से अत्यंत गंभीर है। लोकतंत्र में संस्थागत दूरी केवल प्रोटोकॉल का उल्लंघन नहीं, बल्कि governance psychology का संकेत बन जाती है।


संवाद का अभाव तीन जोखिम पैदा करता है:


1. वैधता का क्षरण – संस्थाओं के बीच सार्वजनिक असहमति शासन की नैतिक शक्ति को कमजोर करती है।

2. राजनीतिक ध्रुवीकरण – संवैधानिक विवाद दलगत विमर्श में परिवर्तित हो जाता है।

3. अनिश्चितता का माहौल – निवेश, विदेश नीति और प्रशासनिक स्थिरता प्रभावित होती है।


## राजनीतिक समर्थन और संवैधानिक निरंतरता


बीएनपी और सशस्त्र बलों के समर्थन से पद पर बने रहने का राष्ट्रपति का कथन एक जटिल यथार्थ की ओर संकेत करता है। संक्रमणकालीन राजनीति में संस्थागत निरंतरता अक्सर राजनीतिक समझौतों पर निर्भर होती है।


यहाँ मूल प्रश्न यह नहीं कि समर्थन उचित था या अनुचित; प्रश्न यह है कि क्या ऐसी परिस्थितियाँ संवैधानिक संरचनाओं की नाजुकता को उजागर करती हैं?


## अभिव्यक्ति का अधिकार: लोकतांत्रिक आश्वासन


नई सरकार के गृह मंत्री का यह कथन कि “सबको अपनी बात कहने का अधिकार है,” लोकतांत्रिक संकेत के रूप में स्वागतयोग्य है। परंतु लोकतंत्र में अधिकार की वास्तविकता केवल घोषणा से नहीं, बल्कि व्यवहारिक सहिष्णुता से मापी जाती है।


संवैधानिक विमर्श की परिपक्वता इसी में है कि आलोचना को अस्थिरता नहीं, सुधार का अवसर माना जाए।


## मूल चुनौती: स्थिरता बनाम संस्थागत गरिमा


बांग्लादेश की वर्तमान परिस्थिति उस सार्वभौमिक लोकतांत्रिक द्वंद्व को रेखांकित करती है जहाँ स्थिरता और संस्थागत गरिमा के बीच संतुलन साधना कठिन हो जाता है।

राजनीतिक स्थिरता आवश्यक है, परंतु यदि वह संस्थागत शिष्टाचार और संवैधानिक संवाद की कीमत पर प्राप्त हो, तो दीर्घकालिक स्थिरता स्वयं प्रश्नों के घेरे में आ जाती है।

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"लोकतंत्र में संकट सत्ता परिवर्तन से नहीं, बल्कि तब जन्म लेता है जब संस्थाएँ संवाद खो देती हैं और शिष्टाचार राजनीति का शिकार बन जाता है।"