असहमति का अधिकार: लोकतंत्र की अंतिम कसौटी
लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला
“असहमति का अधिकार: लोकतंत्र की अंतिम कसौटी”
भारत का संविधान नागरिकों को केवल मतदाता नहीं बनाता; वह उन्हें सक्रिय, प्रश्नाकुल और सजग नागरिक के रूप में स्थापित करता है। वोट देना लोकतंत्र की शुरुआत है, पर सवाल पूछना, असहमति दर्ज करना और शांतिपूर्ण विरोध करना उसकी निरंतरता। यदि नागरिकों की आवाज़ को व्यवस्था की असुविधा समझ लिया जाए, तो लोकतंत्र अपनी आत्मा खोने लगता है।
नई दिल्ली में आयोजित एआई समिट के दौरान युवा राजनीतिक कार्यकर्ताओं का विरोध और उसके बाद हुई पुलिस कार्रवाई इसी व्यापक विमर्श का हिस्सा है। यह एक isolated घटना नहीं, बल्कि उस बदलते माहौल का संकेत है जिसमें विरोध को increasingly “व्यवधान”, “जोखिम” या “अपराध” की भाषा में परिभाषित किया जा रहा है। प्रश्न यह नहीं कि विरोध उचित था या अनुचित; प्रश्न यह है कि राज्य की प्रतिक्रिया संवैधानिक संतुलन के अनुरूप थी या नहीं।
## विरोध: अधिकार, रियायत नहीं
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19(1) नागरिकों को अभिव्यक्ति, शांतिपूर्ण एकत्रीकरण और संगठन बनाने के मौलिक अधिकार देता है। ये अधिकार लोकतंत्र के decorative तत्व नहीं हैं; ये उसकी कार्यशीलता के मूल उपकरण हैं। राज्य इन पर प्रतिबंध लगा सकता है, परंतु वे प्रतिबंध तर्कसंगत, आवश्यक और अनुपातिक होने चाहिए।
सर्वोच्च न्यायालय ने बार-बार यह स्पष्ट किया है कि शांतिपूर्ण विरोध लोकतंत्र का intrinsic हिस्सा है। अदालतों ने यह सिद्धांत स्थापित किया है कि राज्य का दायित्व केवल नियंत्रण नहीं, बल्कि facilitation भी है—यानी विरोध को संवैधानिक दायरे में संभव बनाना।
अनुपातिकता का सिद्धांत विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। हर राज्यीय कार्रवाई से पहले यह प्रश्न उठना चाहिए:
* क्या हस्तक्षेप वास्तव में आवश्यक था?
* क्या कम कठोर विकल्प उपलब्ध थे?
* क्या नागरिक स्वतंत्रताओं पर अनावश्यक आघात हुआ?
## राज्य की प्रतिक्रिया: सुरक्षा बनाम स्वतंत्रता
कानून-व्यवस्था बनाए रखना राज्य का अनिवार्य दायित्व है। पर लोकतंत्र की जटिलता यहीं से शुरू होती है: सुरक्षा और स्वतंत्रता के बीच संतुलन। जब हर सार्वजनिक आयोजन को “राष्ट्र की प्रतिष्ठा” के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, तब असहमति स्वतः ही प्रतिष्ठा-विरोधी प्रतीत होने लगती है। यह मनोविज्ञान आधुनिक शासन की एक चुनौती है—जहाँ image management कभी-कभी constitutional tolerance पर भारी पड़ने लगता है।
यदि विरोध शांतिपूर्ण था, तो प्रश्न स्वाभाविक है कि क्या संवाद, सीमांकन या वैकल्पिक व्यवस्थाएँ पर्याप्त नहीं थीं? आपराधिक कानून का त्वरित प्रयोग हमेशा अंतिम उपाय होना चाहिए, प्रथम प्रतिक्रिया नहीं। अन्यथा राज्य की शक्ति नागरिक अधिकारों पर disproportionately प्रभाव डालने लगती है।
## न्यायपालिका की भूमिका: विवेक का संतुलन
न्यायालयों के आदेश अक्सर एक delicate equilibrium को दर्शाते हैं। अदालतें न तो राज्य की वैध चिंताओं की उपेक्षा कर सकती हैं, न नागरिक स्वतंत्रताओं की। परंतु लोकतांत्रिक स्वास्थ्य के लिए यह आवश्यक है कि न्यायिक विवेक केवल प्रक्रियात्मक वैधता तक सीमित न रहे, बल्कि संवैधानिक आत्मा—अधिकारों की वास्तविक सुरक्षा—को भी प्राथमिकता दे।
लोकतंत्र में न्यायपालिका का नैतिक भार इसी में निहित है कि वह राज्यीय शक्ति और नागरिक स्वतंत्रता के बीच संवैधानिक सीमा-रेखा को जीवित रखे।
## “इवेंट-स्टेट” और लोकतांत्रिक संवेदनशीलता
समकालीन शासन increasingly आयोजन-केंद्रित होता जा रहा है। बड़े सम्मेलनों, वैश्विक मंचों और दृश्यात्मक उपलब्धियों का अपना महत्व है। परंतु जब शासन का विमर्श नीति से अधिक प्रतीक पर आधारित होने लगे, तब असहमति अक्सर narrative disruption की तरह देखी जाती है। यही वह बिंदु है जहाँ लोकतांत्रिक परिपक्वता की परीक्षा होती है।
एक सुदृढ़ लोकतंत्र वही है जहाँ राज्य अपनी वैधता का आधार आलोचना-सहनशीलता में खोजे, न कि आलोचना-नियंत्रण में।
## मूल प्रश्न: लोकतंत्र का आत्मविश्वास
लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति उसके संस्थानों की कठोरता में नहीं, बल्कि उसकी सहिष्णुता में निहित है। विरोध व्यवस्था का शत्रु नहीं; वह उसका corrective mechanism है। जब असहमति भय का विषय बन जाए, तो लोकतंत्र औपचारिक ढाँचे में सिमटने लगता है।
राज्य की प्रतिष्ठा नागरिकों की चुप्पी से नहीं, बल्कि उनके विश्वास से निर्मित होती है—और विश्वास तभी बनता है जब अधिकार सुरक्षित महसूस हों।
"लोकतंत्र तब सबसे मजबूत होता है, जब सत्ता आलोचना से नहीं डरती—और नागरिक प्रश्न पूछने से नहीं।"
