डिजिटल मीडिया ने क्या बदला? — सूचना, शक्ति और समाज का नया समीकरण
लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला
डिजिटल मीडिया ने क्या बदला? — सूचना, शक्ति और समाज का नया समीकरण
लोकतांत्रिक व्यवस्था में मीडिया को परंपरागत रूप से “चौथा स्तंभ” कहा गया है — सत्ता, संस्थानों और समाज के बीच एक सेतु। किंतु पिछले एक दशक में डिजिटल मीडिया के उदय ने इस स्तंभ की संरचना, कार्यप्रणाली और प्रभाव — तीनों को मौलिक रूप से बदल दिया है। यह परिवर्तन केवल तकनीकी नहीं, बल्कि सामाजिक, राजनीतिक और मनोवैज्ञानिक स्तर पर भी गहरा है।
1️⃣ सूचना का लोकतंत्रीकरण — या अराजकता?
डिजिटल मीडिया का सबसे बड़ा वादा था:
✔ सूचना की सार्वभौमिक पहुँच
✔ अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता
✔ पारंपरिक मीडिया के एकाधिकार का अंत
आज हर नागरिक संभावित “प्रकाशक” है। सोशल प्लेटफ़ॉर्म्स ने आवाज़ को संस्थानों से निकालकर व्यक्तियों तक पहुँचा दिया। पर प्रश्न यह है: "क्या सूचना वास्तव में लोकतांत्रिक हुई है, या केवल असंयमित?"
✔ तथ्य और राय का भेद धुंधला
✔ सत्यापन की प्रक्रिया कमजोर
✔ अफवाहों की गति तीव्र
जहाँ पहले सूचना का संकट “अभाव” था, अब “अधिभार” है।
2️⃣ गेटकीपर का पतन
पारंपरिक मीडिया में संपादक, संस्थान और मानक — "सूचना के गेटकीपर होते थे।"
डिजिटल युग में:
✔ एल्गोरिदम = नया संपादक
✔ ट्रेंड = नया एजेंडा
✔ वायरलिटी = नया सत्यापन
यहाँ मूल्य-आधारित चयन नहीं, बल्कि एंगेजमेंट-आधारित चयन होता है। 'जो उत्तेजक है, वही दृश्य है। जो दृश्य है, वही प्रभावशाली है।"
3️⃣ एल्गोरिदमिक वास्तविकता (Algorithmic Reality)
डिजिटल मीडिया ने एक नई वास्तविकता गढ़ी है:
✔ व्यक्तिगत समाचार संसार (Personalised Information Bubble)
✔ पुष्टि पक्षपात का विस्तार (Confirmation Bias Amplification)
✔ वैचारिक इको-चेंबर्स
दर्शक अब “समाचार” नहीं देखता — "अपनी पसंद का प्रतिबिंब देखता है।"
परिणामस्वरूप:
✔ सामाजिक ध्रुवीकरण तीव्र
✔ संवाद के स्थान पर प्रतिध्वनि
✔ विमर्श के स्थान पर टकराव
4️⃣ गति बनाम गहराई
डिजिटल मीडिया का मूल स्वभाव:
✔ तात्कालिकता (Instantaneity)
✔ निरंतरता (24/7 Flow)
✔ ध्यान अर्थव्यवस्था (Attention Economy)
यहाँ “पहले देना” अधिक महत्वपूर्ण है, “सही देना” नहीं।
✔ ब्रेकिंग कल्चर
✔ संदर्भहीन सूचनाएँ
✔ अधूरी समझ
गति ने गहराई को विस्थापित कर दिया है।
5️⃣ भावनात्मक अर्थशास्त्र
डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म्स का राजस्व मॉडल स्पष्ट है:
✔ क्लिक
✔ शेयर
✔ व्यू
✔ एंगेजमेंट
और एंगेजमेंट किससे आता है?
✔ भय
✔ आक्रोश
✔ उत्तेजना
✔ नैतिक क्रोध
डिजिटल मीडिया ने समाचार को भावनात्मक उत्पाद (Emotional Commodity) बना दिया है।
6️⃣ सत्ता और नागरिक का नया संबंध
डिजिटल मीडिया ने शक्ति समीकरण भी बदला है।
(a) सकारात्मक आयाम
✔ नागरिक पत्रकारिता
✔ त्वरित जवाबदेही
✔ हाशिए की आवाज़ों का उभार
(b) चिंताजनक आयाम
✔ दुष्प्रचार (Disinformation)
✔ संगठित नैरेटिव अभियानों
✔ डिजिटल ट्रोलिंग एवं भीड़ मानसिकता
सूचना अब केवल संवाद का साधन नहीं — रणनीतिक हथियार (Strategic Instrument) बन चुकी है।
7️⃣ मीडिया बनाम प्लेटफ़ॉर्म — एक मौलिक अंतर
डिजिटल युग की एक महत्वपूर्ण भूल यह रही:
✔ प्लेटफ़ॉर्म को मीडिया समझ लेना
मीडिया का नैतिक दायित्व होता है।
प्लेटफ़ॉर्म का एल्गोरिदमिक उद्देश्य।
✔ मीडिया = संपादकीय जवाबदेही
✔ प्लेटफ़ॉर्म = तकनीकी मध्यस्थता
यह अंतर लोकतांत्रिक विमर्श में निर्णायक है।
8️⃣ दर्शक की भूमिका: अब अधिक केंद्रीय
डिजिटल मीडिया ने उपभोक्ता को निष्क्रिय दर्शक से सक्रिय सहभागी बना दिया है।
✔ हर शेयर = संपादकीय निर्णय
✔ हर क्लिक = एल्गोरिदमिक संकेत
✔ हर प्रतिक्रिया = नैरेटिव सुदृढ़ीकरण
अब प्रश्न केवल मीडिया से नहीं — "नागरिक विवेक से भी है।"
## परिवर्तन का द्वंद्व
डिजिटल मीडिया न तो पूर्णतः वरदान है, न पूर्णतः संकट। यह एक शक्तिशाली उपकरण है — जिसका प्रभाव उसके उपयोग पर निर्भर है।
✔ सूचना अधिक स्वतंत्र हुई
✔ सत्य अधिक विवादित हुआ
✔ आवाज़ अधिक मुखर हुई
✔ विवेक अधिक आवश्यक हुआ
लोकतंत्र में डिजिटल मीडिया ने सबसे बड़ा परिवर्तन यह किया है: "सूचना का नियंत्रण संस्थानों से हटाकर मनोविज्ञान, एल्गोरिदम और बाजार के त्रिकोण में स्थानांतरित कर दिया।"
## अंतिम विचार
डिजिटल युग में मीडिया साक्षरता (Media Literacy) अब विलासिता नहीं, लोकतांत्रिक अनिवार्यता है।
✔ तथ्य की पहचान
✔ स्रोत का मूल्यांकन
✔ भावनात्मक उत्तेजना से सावधानी
✔ विविध दृष्टिकोणों का उपभोग
क्योंकि अंततः: "डिजिटल मीडिया केवल वही बढ़ाता है, जिसे समाज देखने, मानने और साझा करने को तैयार होता है।"
