महाभारत की एक विस्मृत गाथा : "वृषाली" — कर्ण की पत्नी, इतिहास की मौन साक्षी
लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला
महाभारत की एक विस्मृत गाथा : "वृषाली" — कर्ण की पत्नी, इतिहास की मौन साक्षी
महाभारत केवल युद्ध का आख्यान नहीं है। वह उन असंख्य जीवनों की कथा है, जो युद्ध से पहले ही हार चुके थे। उस विराट ग्रंथ में जहाँ शंखनाद गूंजते हैं, जहाँ रथों के पहिए इतिहास को कुचलते हैं, वहीं कुछ जीवन ऐसे भी हैं जो बिना किसी शस्त्र के सबसे गहरी चोट सहते हैं। वृषाली उन्हीं जीवनों में से एक है।
## इतिहास के हाशिये पर खड़ी एक स्त्री
वृषाली का नाम महाभारत के प्रमुख श्लोकों में नहीं आता। वह न सभा की वक्ता है, न युद्ध की निर्णायिका। परन्तु यही उसका महत्व है।
क्योंकि इतिहास जिन स्त्रियों को भूल जाता है, वही स्त्रियाँ इतिहास का सबसे भारी बोझ उठाती हैं। वृषाली कोई राजकुमारी नहीं थी। वह किसी विजय-यज्ञ का पुरस्कार नहीं बनी। वह स्वयंवर की विजेता नहीं थी।
उसका विवाह किसी उत्सव का विषय नहीं बना। क्योंकि उसने विवाह किया— एक ऐसे पुरुष से जिसे समाज ने जन्म से ही अस्वीकार कर दिया था।
## जब कर्ण केवल “सूतपुत्र” था
कर्ण के जीवन का प्रारंभ अपमान से हुआ था। कुंती के गर्भ से जन्म लेकर अधिरथ के घर पलने वाला यह बालक अपनी प्रतिभा के कारण नहीं, अपनी जाति के कारण जाना जाता था।
उसी समय वृषाली उसके जीवन में आई। जब कर्ण के पास न राज्य था, न प्रतिष्ठा, न कोई भविष्य सुनिश्चित था— तब वृषाली ने उसे पति के रूप में चुना।
👉 उसने किसी राजा से विवाह नहीं किया।
👉 उसने उस पुरुष को चुना, जिसे समाज ने ठुकरा दिया था।
यह चुनाव प्रेम का नहीं, साहस का था।
## सभा का वह क्षण — जब अपमान दो हृदयों में उतरा
द्रौपदी का स्वयंवर।
सभा भरी हुई थी— राजाओं, योद्धाओं, देवपुत्रों से।
कर्ण आगे बढ़ा। उसकी भुजाओं में शक्ति थी, उसकी दृष्टि में आत्मसम्मान।
पर जैसे ही उसने धनुष की ओर हाथ बढ़ाया— सभा में एक वाक्य गूंजा— “सूतपुत्र को अधिकार नहीं।”
इतिहास कहता है— यह कर्ण का अपमान था। पर इतिहास यह नहीं लिखता— उस क्षण वृषाली भी वहीं थी। उसने देखा— उसका पति संसार के सामने अस्वीकार किया गया।
वह स्त्री जिसने समाज के विरोध में विवाह किया था, आज उसी समाज द्वारा फिर से दंडित की जा रही थी। उसने प्रतिवाद नहीं किया। क्योंकि वह जानती थी—कुछ अपमानों का उत्तर मौन से ही दिया जाता है।
## दुर्योधन और वह निष्ठा जो मृत्यु बन गई
दुर्योधन ने कर्ण को राजा बनाया। अंग देश का सिंहासन दिया। इतिहास इसे कर्ण का उद्धार कहता है। वृषाली इसे एक ऋण का प्रारंभ समझती थी। कर्ण कृतज्ञ था। पर कृतज्ञता धीरे-धीरे निष्ठा बन गई। और निष्ठा दासता में बदलती चली गई। वृषाली ने यह परिवर्तन देखा।
उसने कहा— “धर्म वह नहीं जो उपकार के बदले चुना जाए, धर्म वह है जो सत्य के साथ खड़ा हो।”
पर कर्ण ने नहीं सुना।
क्योंकि जो पुरुष अपमान से टूट चुका हो, वह सम्मान देने वाले के लिए सब कुछ त्यागने को तैयार रहता है।
## सत्य का उद्घाटन — और वृषाली की मौन स्वीकृति
जब कुंती ने कर्ण को सत्य बताया—कि वह पांडव है, कि वह कुन्तीपुत्र है—उस क्षण कर्ण के भीतर युद्ध समाप्त हो सकता था। वृषाली ने सब समझ लिया। यदि कर्ण पक्ष बदलता है—तो वह जीवित रहेगा। यदि नहीं—तो वह मरेगा। कर्ण ने पक्ष नहीं बदला। वृषाली ने उसे रोका नहीं। क्योंकि प्रेम का एक रूप यह भी है—प्रिय के निर्णय को उसके अंत तक स्वीकार करना।
## युद्ध के बाद — एक स्त्री का अकेलापन
कर्ण मारा गया। इतिहास ने आगे बढ़ना चुना। युधिष्ठिर राजा बने। धर्म की स्थापना हुई।
पर वृषाली?
उसके पास—न राज्य था, न न्याय, न सांत्वना। केवल स्मृतियाँ थीं—एक ऐसे पुरुष की जो गलत नहीं था, पर अकेला था।
## वृषाली का महत्व — आज के लिए
वृषाली हमें यह सिखाती है—
• हर युद्ध रणभूमि में नहीं लड़ा जाता
• हर पराजय दिखाई नहीं देती
• और हर नायिका इतिहास में दर्ज नहीं होती
कुछ स्त्रियाँ इतिहास नहीं बदलतीं—वे इतिहास को जीती हैं।
महाभारत यदि केवल योद्धाओं की कथा है, तो वह अधूरी है। वृषाली जैसी स्त्रियाँ उस कथा की अनलिखी आत्मा हैं। वह स्त्री— जिसे कभी चुना नहीं गया, पर जिसने सब कुछ चुन लिया। और उसी में उसकी महानता है।
