यूएपीए, जमानत और न्यायपालिका का बदलता चेहरा
लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला
यूएपीए, जमानत और न्यायपालिका का बदलता चेहरा
सुप्रीम कोर्ट द्वारा उमर ख़ालिद और शरजील इमाम की जमानत याचिका खारिज किया जाना केवल दो व्यक्तियों से जुड़ा फ़ैसला नहीं है, बल्कि यह भारतीय न्यायपालिका के उस नए चेहरे को उजागर करता है, जो राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर व्यक्तिगत स्वतंत्रता और शीघ्र न्याय जैसे संवैधानिक मूल्यों के साथ एक असहज संतुलन साधता दिखाई दे रहा है।
2020 के उत्तर-पूर्वी दिल्ली दंगों की कथित “बड़ी साज़िश” के आरोप में दिल्ली पुलिस द्वारा गिरफ़्तार किए गए उमर ख़ालिद और शरजील इमाम साढ़े पाँच वर्षों से अधिक समय से जेल में बंद हैं। उल्लेखनीय तथ्य यह है कि इस अवधि में न तो मुक़दमा शुरू हुआ है और न ही दोषसिद्धि हुई है। इसके बावजूद सुप्रीम कोर्ट ने यह कहते हुए जमानत देने से इनकार कर दिया कि “लंबे समय तक जेल में बंद रहने मात्र से आतंकवाद का आरोपी जमानत का हक़दार नहीं हो जाता।”
यह टिप्पणी अपने आप में गंभीर है, क्योंकि यही सर्वोच्च न्यायालय बीते वर्षों में यूएपीए के मामलों में ठीक इसके उलट सिद्धांत स्थापित करता रहा है।
## पूर्ववर्ती न्यायिक दृष्टांत और वर्तमान विरोधाभास
2016 से 2025 के बीच सुप्रीम कोर्ट की विभिन्न पीठों ने कम से कम 16 मामलों में यूएपीए के तहत आरोपित व्यक्तियों को बिना ट्रायल शुरू हुए लंबे समय तक जेल में रखे जाने के आधार पर जमानत प्रदान की है। इन फ़ैसलों में न्यायालय ने स्पष्ट रूप से कहा कि यदि ट्रायल के पूरा होने में अत्यधिक विलंब संभावित है, तो कठोर क़ानून भी अनिश्चितकालीन कैद का औचित्य नहीं बन सकते।
सबसे महत्वपूर्ण उदाहरण के.ए. नजीब बनाम भारत सरकार (2021) का है, जहाँ अदालत ने यूएपीए की धारा 43(D)(5) की कठोर शर्तों के बावजूद यह कहते हुए जमानत दी थी कि— “यदि आरोपी को जितनी अवधि तक जेल में रखा गया है, वह संभावित सज़ा की अवधि के बराबर या उससे अधिक हो जाए, तो जमानत की कठोर शर्तें अपना अर्थ खो देती हैं।”
इस फ़ैसले में यह भी कहा गया था कि जहाँ 276 गवाह शेष हों और ट्रायल के शीघ्र निष्कर्ष की कोई संभावना न हो, वहाँ अनुच्छेद 21 के तहत प्रदत्त व्यक्तिगत स्वतंत्रता को निलंबित नहीं किया जा सकता।
इसी सिद्धांत के आधार पर अप्रैल 2024 में भीमा कोरेगांव मामले में आरोपी प्रो. सोमा सेन को जमानत दी गई थी। कोर्ट ने तब दो टूक कहा था कि— “अनुच्छेद 21 के अंतर्गत स्वतंत्रता के हनन की अवधि, मामले के तथ्यों के अनुपात में होनी चाहिए और उसे न्यायोचित, तर्कसंगत तथा पक्षपात-रहित प्रक्रिया से ही सीमित किया जा सकता है।”
जुलाई 2024 में सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन न्यायाधीश जे.बी. पारदीवाला और उज्जल भुइयां ने नौ वर्षों से जेल में बंद नेपाली नागरिक शेख जावेद इक़बाल को शीघ्र ट्रायल के अधिकार के आधार पर जमानत दी थी। अदालत ने माना था कि न्याय में अत्यधिक विलंब स्वयं संवैधानिक अन्याय है।
## तो फिर उमर और शरजील के मामले में अपवाद क्यों?
उमर ख़ालिद और शरजील इमाम के मामले में न केवल जमानत से इनकार किया गया, बल्कि एक वर्ष तक नई जमानत याचिका दाख़िल करने पर भी रोक लगा दी गई। साथ ही जिन पाँच अन्य आरोपियों को सशर्त जमानत मिली, उनके अभिव्यक्ति के अधिकारों पर भी कठोर प्रतिबंध लगाए गए।
यह दृष्टिकोण एक खतरनाक संकेत देता है—कि यदि कोई नागरिक सरकार की नीतियों से असहमति व्यक्त करता है, संवैधानिक दायरे में विरोध करता है, या सत्ता को असुविधाजनक सवालों के घेरे में लाता है, तो उसे बिना मुक़दमा चलाए अनिश्चित काल तक जेल में रखा जा सकता है।
## समानता के सिद्धांत पर प्रश्न
इस पूरे परिदृश्य में समानता के संवैधानिक सिद्धांत पर भी प्रश्न उठते हैं। एक ओर यूएपीए के तहत बंद विचारधारात्मक असहमति रखने वाले छात्र और बुद्धिजीवी वर्षों से जेल में हैं, दूसरी ओर सत्तारूढ़ दल के मंत्री—जिनके भड़काऊ भाषणों और नारेबाज़ी को दंगों से जोड़ा गया—आज भी सत्ता और शासन में बने हुए हैं। यह अंतर केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि क़ानून के समान अनुप्रयोग पर भी गंभीर सवाल खड़े करता है।
उमर ख़ालिद और शरजील इमाम का मामला आज उस बिंदु पर खड़ा है जहाँ प्रश्न यह नहीं है कि वे दोषी हैं या निर्दोष—यह तो मुक़दमे के बाद तय होगा। असली प्रश्न यह है कि क्या भारतीय लोकतंत्र बिना ट्रायल के दी जाने वाली लंबी कैद को सामान्य मानने की दिशा में बढ़ रहा है?
यदि राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर अनुच्छेद 21 को स्थगित कर दिया गया, यदि जमानत नियम नहीं बल्कि अपवाद बन गई, और यदि असहमति को अपराध की श्रेणी में डाल दिया गया—तो यह केवल न्यायपालिका का नहीं, पूरे संवैधानिक लोकतंत्र का संकट होगा।
आज ज़रूरत है कि सुप्रीम कोर्ट अपने ही स्थापित न्यायिक सिद्धांतों की कसौटी पर इन मामलों को फिर से देखे, क्योंकि लोकतंत्र केवल सुरक्षा से नहीं, बल्कि स्वतंत्रता और न्याय के संतुलन से जीवित रहता है।
