संस्थानों की साख और लोकतंत्र का 'सर्जिकल' स्ट्राइक
लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला
संस्थानों की साख और लोकतंत्र का 'सर्जिकल' स्ट्राइक
आज जब हम दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र होने का दंभ भरते हैं, तब देश की लोकतांत्रिक संस्थाओं के गलियारों से आती खबरें उत्सव का नहीं, बल्कि गहरी चिंता का विषय हैं। न्यायपालिका से लेकर चुनाव आयोग तक और कार्यपालिका से लेकर नागरिक अधिकारों तक, ऐसा प्रतीत होता है कि 'नियम' अब न्याय के लिए नहीं, बल्कि 'रणनीति' के लिए इस्तेमाल किए जा रहे हैं।
## न्याय के दोहरे तराजू
सुप्रीम कोर्ट का यह कहना कि "कुत्तों के चलते आखिर कब तक परेशानी झेलेंगे आम लोग", पहली नजर में नागरिक सुविधाओं की चिंता लगता है। लेकिन जब इसी न्याय के तराजू के दूसरे पलड़े पर हम दिल्ली के तुर्कमान गेट पर चलते बुलडोजर, कड़कती ठंड में उजड़ते आशियाने और मलबे के बीच होती पुलिसिया झड़प को देखते हैं, तो सवाल उठता है कि 'आम आदमी' की परिभाषा क्या सत्ता की सहूलियत से तय होगी?
विचित्र विरोधाभास देखिए—मणिपुर को हिंसा की आग में झोंकने के आरोपों से घिरे मुख्यमंत्री के कथित ऑडियो क्लिप की जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट को आदेश देना पड़ता है, वहीं दूसरी ओर दिल्ली दंगों के आरोपी बिना साबित हुए अपराध के पांच-पांच साल से सलाखों के पीछे हैं। क्या न्याय की गति व्यक्ति के रसूख और विचारधारा को देखकर तय की जा रही है?
## मतदाता सूची या चुनावी डेटाबेस?
उत्तर प्रदेश में मतदाता सूची पुनरीक्षण (SIR) के नाम पर जो खेल चल रहा है, वह लोकतंत्र की बुनियाद हिलाने वाला है। एक झटके में 2.89 करोड़ नामों का हट जाना और उसके तुरंत बाद सत्तारूढ़ दल द्वारा हर बूथ पर 200 नए नाम जोड़ने का 'लक्ष्य' निर्धारित करना, चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगाता है। क्या यह मतदाता सूची का पुनरीक्षण है या सत्ता की वापसी के लिए 'चुनिंदा मतदाताओं' की सूची तैयार करने का अभियान?
जब 92 वर्षीय नोबेल विजेता अमर्त्य सेन को उनकी मां की उम्र के साथ 'तर्कसंगत अंतर' न होने के तकनीकी बहाने पर नोटिस थमाया जाता है, तो साफ हो जाता है कि संस्थानों का विवेक मर चुका है और वे केवल 'ऊपर' से मिले निर्देशों के पोस्टमैन बन गए हैं।
## संवैधानिक पदों पर रहस्य का पर्दा
पूर्व उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ के इस्तीफे और उनकी आधिकारिक सूचनाओं में जो 'RTI' वाला रहस्योद्घाटन हुआ है, वह संवैधानिक शुचिता के लिए काला धब्बा है। क्या देश के दूसरे सबसे बड़े पद का इस्तीफा 'एक्स' (ट्विटर) के माध्यम से तय होगा? राष्ट्रपति भवन और गृह मंत्रालय के जवाबों में विरोधाभास यह बताने के लिए काफी है कि शीर्ष पदों पर बैठे लोग जवाबदेही के प्रति कितने लापरवाह हो चुके हैं।
## संस्थान बनाम व्यक्ति: न्यायमूर्ति वर्मा का प्रकरण
न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा के मामले ने न्यायपालिका की आंतरिक राजनीति और पारदिर्शता को नंगा कर दिया है। घर में आग लगने पर मिले 'नोटों' के स्रोत की जांच करने के बजाय, जिस तरह आनन-फानन में उन्हें पद से हटाने की संसदीय प्रक्रिया शुरू की गई, वह 'जांच' कम और 'बदला' ज्यादा प्रतीत होती है। मुकुल रोहतगी की यह दलील कि लोकसभा अध्यक्ष ने संयुक्त जांच पैनल के नियम को दरकिनार कर 'एकतरफा' कमेटी बनाई, संसदीय तानाशाही का संकेत है।
सोनम वांगचुक जैसे शांतिपूर्ण आंदोलनकारियों पर NSA की बेड़ियाँ, JNU में नारों पर FIR, और दूसरी तरफ नागरिकों को पीने के पानी में सीवेज की आपूर्ति—यही आज के भारत का क्रूर यथार्थ है। जब संवैधानिक रक्षक ही 'पॉलिटिकल टूल' बन जाएं, तो समाज में असुरक्षा का भाव पनपना स्वाभाविक है।
अदालतों को यह समझना होगा कि उनकी साख 'BMW' के प्रस्तावों या रिटायरमेंट के बाद के इनामों से नहीं, बल्कि 'समान न्याय' के साहस से बचती है। अगर संस्थानों की यह गिरावट न रुकी, तो लोकतंत्र केवल एक कागजी ढांचा बनकर रह जाएगा, जिसकी आत्मा बहुत पहले ही कुचली जा चुकी होगी।
