डिजिटल इंडिया की 'महादेव' चुनौती: सत्ता का कवच और जुर्म का साम्राज्य

 लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला 


डिजिटल इंडिया की 'महादेव' चुनौती: सत्ता का कवच और जुर्म का साम्राज्य

## संवैधानिक लोकतंत्र की नींव में 'डिजिटल दीमक'

भारत के डिजिटल-मीडिया-पॉलिटिकल नेक्सस का जो पर्दाफाश दिसंबर 2025 में हुआ है, वह महज एक आर्थिक घोटाला नहीं है। यह हमारे संवैधानिक लोकतंत्र की नींव में लगी 'डिजिटल दीमक' है। जब प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) में कम्युनिकेशन के विशेष अधिकारी (Hiren Joshi) पर चैनल्स को हेडलाइन डिक्टेट करने और विदेशी बेटिंग सिंडिकेट (Mahadev App) से लिंक होने का आरोप लगता है, तो सवाल किसी व्यक्ति विशेष पर नहीं, बल्कि सत्ता के उस केंद्रीकृत दुरुपयोग पर उठता है, जो हमारी संस्थागत ईमानदारी को खोखला कर रहा है।

प्रसार भारती के चेयरमैन (Navneet Sehgal) का रहस्यमय इस्तीफा और उनके बेटे का महादेव घोटाले से कथित जुड़ाव यह दर्शाता है कि कैसे सार्वजनिक प्रसारक संस्था को एक 'प्राइवेट प्रोपगैंडा मशीन' में बदला गया। यह प्रेस की स्वतंत्रता के चौथे स्तंभ को ध्वस्त करने का सीधा प्रयास है, जो संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) द्वारा प्रदत्त अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का गला घोंटता है। मीडिया का नियंत्रण राजनीतिक लाभ के लिए करना सत्ता की तानाशाही का स्पष्ट संकेत है, न कि लोकतांत्रिक शासन का।

## विधिक शील्ड और न्याय पर प्रश्नचिन्ह

कानून और न्याय की सर्वोच्चता पर तब सबसे बड़ा सवाल उठता है, जब 23वीं लॉ कमीशन के पूर्णकालिक सदस्य (Hitesh Jain) को मात्र छह महीने में इस्तीफा देना पड़ता है, और उन पर उसी नेक्सस को 'लीगल शील्ड' प्रदान करने का संदेह होता है। 

क्या यह देश का सबसे बड़ा कानूनी निकाय, जहां संवैधानिक सुधारों पर चर्चा होनी चाहिए, ऐसे तत्वों के लिए 'सुरक्षित ठिकाना' बन गया था?

ईडी की 170 से अधिक छापेमारियां और ₹3,000 करोड़ की संपत्ति की जब्ती केवल जुर्म की गंभीरता बताती है। लेकिन इस नेक्सस का असली खतरा यह है कि इसने सरकारी मशीनरी, राजनीतिक नेतृत्व और कानूनी संरक्षण को एक सूत्र में पिरो दिया। फरार आरोपियों को ट्रेस करने का सुप्रीम कोर्ट का आदेश और हवाला नेटवर्क का देशव्यापी प्रसार यह साबित करता है कि यह एक संगठित अपराध मॉड्यूल है, जिसे उच्च राजनीतिक संरक्षण प्राप्त था। धन शोधन निवारण अधिनियम (PMLA) और सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम (IT Act) का उल्लंघन केवल जुर्म नहीं है, यह राज्य के प्रति विश्वासघात है।

## राजनैतिक चुनौती: जवाबदेही या राजनीतिक सफाई?

इस पूरे प्रकरण की राजनैतिक चुनौती दोहरी है। एक ओर, यह सत्ताधारी प्रतिष्ठान के भीतर की "डिजिटल तानाशाही" को बेनकाब करता है। दूसरी ओर, यह प्रश्न उठाता है कि क्या यह नेक्सस केवल "कुछ भ्रष्ट तत्वों" तक सीमित है, या यह एक संरचित सिस्टम का हिस्सा है?

सोशल मीडिया पर #MahadevInPMO जैसे ट्रेंड यह बताते हैं कि जनता अब केवल आश्वासन नहीं, बल्कि जवाबदेही मांग रही है। सत्ता को यह स्पष्ट करना होगा कि PMO का एक ओएसडी इतने बड़े बेटिंग साम्राज्य से क्यों और कैसे जुड़ा? क्या यह कार्रवाई महज चुनिंदा सफाई अभियान है, जैसा कि अक्सर चुनावों से पहले होता है, या यह संस्थागत शुद्धिकरण का सच्चा प्रयास है?

अगर हमारे लोकतांत्रिक संस्थान, मीडिया और न्याय प्रणाली अवैध धन और राजनीतिक प्रभाव के गठजोड़ के आगे झुक जाते हैं, तो भारत का संविधान "जनता द्वारा, जनता के लिए" शासन की अपनी मूल भावना खो देगा।

सवाल तीखा है: क्या हम एक डिजिटल तानाशाही की ओर बढ़ रहे हैं, जो जुए के पैसों से संचालित है और कानूनी ढाल से सुरक्षित है?

ईडी, सीबीआई और सुप्रीम कोर्ट को इस नेक्सस की जड़ों को राजनीतिक शीर्ष तक खोदना होगा, अन्यथा यह पर्दाफाश इतिहास की एक और अधूरी कहानी बनकर रह जाएगा। देश को 'सच्चाई' नहीं, 'पूरा सच' चाहिए।