सत्ता का मद, न्याय की मर्यादा और मीडिया का नैतिक पतन: एक विश्लेषण
लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला
सत्ता का मद, न्याय की मर्यादा और मीडिया का नैतिक पतन: एक विश्लेषण
भारतीय राजनीति के वर्तमान दौर में 'राष्ट्रवाद' और 'सुशासन' के बड़े-बड़े दावों के बीच, जब कुलदीप सिंह सेंगर, बृजभूषण शरण सिंह या अंकिता भंडारी जैसे मामले सामने आते हैं, तो वे केवल व्यक्तिगत अपराध नहीं रह जाते। वे सत्ता के उस कुरूप चेहरे को उजागर करते हैं जहाँ 'लोकसेवक' होने का मुखौटा पहनकर 'भस्मासुर' निर्मित किए जा रहे हैं।
1. संवैधानिक और विधिक परिप्रेक्ष्य: न्यायपालिका की साख का प्रश्न
सुप्रीम कोर्ट द्वारा कुलदीप सेंगर की जमानत रद्द करना कानून के शासन (Rule of Law) की जीत है। दिल्ली हाई कोर्ट का यह तर्क कि "वे चुने हुए प्रतिनिधि थे," विधिक दृष्टि से संदेहास्पद था। संविधान का अनुच्छेद 14 'समानता' की बात करता है; कानून की नज़र में एक विधायक और एक आम नागरिक बराबर है।
उच्चतम न्यायालय ने स्पष्ट कर दिया कि "जनप्रतिनिधि" होना अपराध के बाद कवच नहीं बन सकता। यदि रक्षक ही भक्षक बन जाए, तो न्यायपालिका का दायित्व है कि वह कठोरतम रुख अपनाए। यह फैसला जन-दबाव के कारण नहीं, बल्कि न्यायिक विश्वसनीयता को बचाने के लिए लिया गया है। सेंगर का मामला केवल बलात्कार का नहीं, बल्कि पीड़िता के पूरे परिवार को सिस्टम के जरिए 'मिटा देने' की साज़िश (पिता की हिरासत में मौत और चाचाओं की दुर्घटना) का था। ऐसे में जमानत देना समाज में यह संदेश देता कि 'सत्ता के पास न्याय खरीदने की ताकत है।'
2. राजनैतिक परिप्रेक्ष्य: 'पार्टी विद ए डिफरेंस' का संकट
भारतीय जनता पार्टी जो स्वयं को सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और उच्च चारित्रिक मूल्यों की संवाहक मानती है, उसके लिए ये मामले एक "अस्तित्ववादी संकट" हैं।
संरक्षण की राजनीति: जब सत्ता अपने दागी नेताओं के पीछे ढाल बनकर खड़ी होती है, तो वह विपक्षी दलों के समान ही 'बी' (भ्रष्टाचारी या बलात्कारी) श्रेणी की ओर अग्रसर होने लगती है।
मौन की राजनीति: विडंबना यह है कि जो कार्यकर्ता और महिला नेत्री छोटी-छोटी बातों पर 'नैतिकता' का पाठ पढ़ाते हैं, वे अपनी ही पार्टी के भीतर हो रहे 'चारित्रिक पतन' पर चुप्पी साध लेते हैं। यह "चयनात्मक आक्रोश" (Selective Outrage) राजनीति के अपराधीकरण को खाद-पानी देता है।
3. सामाजिक और नैतिक परिप्रेक्ष्य: चारित्रिक पतन का दौर
अंकिता भंडारी का मामला उस गहरे दलदल की ओर इशारा करता है जहाँ सत्ता के शीर्ष पर बैठे लोग 'यौन शोषण' को अधिकार समझने लगते हैं। सुरेश राठौर की पत्नी द्वारा सार्वजनिक की गई क्लिप्स यदि सत्य हैं, तो यह भारतीय समाज के उस 'उच्चतम मूल्य' की हत्या है जिसे हम 'नारी सम्मान' कहते हैं। बिलकिस बानो के दोषियों का स्वागत करना या कठुआ मामले में आरोपियों के पक्ष में रैलियां निकालना—ये समाज के सामूहिक नैतिक पतन के संकेत हैं।
4. मीडिया की नकारात्मक भूमिका: लोकतंत्र का 'अंधा' स्तंभ
इस पूरे विमर्श में मीडिया की भूमिका सबसे अधिक चिंताजनक और नकारात्मक रही है:
गोदी मीडिया का चरित्र: मीडिया का एक बड़ा वर्ग सत्ता की जवाबदेही तय करने के बजाय 'विक्टिम शेमिंग' (पीड़िता को ही दोषी ठहराना) या मुख्य मुद्दों से ध्यान भटकाने में लगा रहता है।
मुद्दों का सरलीकरण: अंकिता भंडारी या उन्नाव जैसे मामलों को 'सनसनी' बनाकर छोड़ दिया जाता है, उनकी विधिक तार्किक परिणति तक मीडिया पीछा नहीं करता।
सत्ता की चाटुकारिता: जब सत्ता के बड़े नाम (जैसे दुष्यंत गौतम या बृजभूषण) चर्चा में आते हैं, तो मीडिया "सावधानी" बरतने लगता है। वह जनता के गुस्से को दबाने के लिए 'राष्ट्रवाद' का नया नैरेटिव खड़ा कर देता है ताकि इन आपराधिक कृत्य पर परदा डाला जा सके।
## क्या सेंगर को अब जमानत नहीं मिल पाएगी?
विधिक रूप से, सुप्रीम कोर्ट के इस कड़े रुख के बाद अब निचली अदालतों के लिए सेंगर को जमानत देना लगभग असंभव होगा। जब तक कि मामले में कोई नया और ठोस साक्ष्य उनके पक्ष में न आए, सुप्रीम कोर्ट ने यह सुनिश्चित किया है कि 'शक्ति संतुलन' न्याय के पक्ष में रहे।
सत्ता और शासन अस्थायी होते हैं, लेकिन किसी राष्ट्र की 'नैतिक रीढ़' उसके चरित्र से बनती है। यदि राष्ट्रवाद का प्रमाण-पत्र बांटने वाली जमात अपने ही भीतर के 'दुर्योधनों' और 'दुशासनों' को संरक्षण देना बंद नहीं करती, तो इतिहास उन्हें उसी नाम से याद रखेगा जिसका जिक्र आपने किया है। न्याय केवल अदालतों में नहीं, समाज की चेतना में भी होना चाहिए।
