अरावली का संरक्षण और 'सतत खनन' का मृगतृष्णा

 लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला 


अरावली का संरक्षण और 'सतत खनन' का मृगतृष्णा

अरावली पर्वतमाला के भविष्य को लेकर हालिया प्रशासनिक घोषणाओं ने एक बार फिर विकास और पर्यावरण के पुराने द्वंद्व को सतह पर ला दिया है। केंद्र सरकार द्वारा नए खनन पट्टों (Mining Leases) पर रोक को एक प्रगतिशील कदम के रूप में प्रचारित किया जा रहा है, किंतु यदि हम माननीय उच्चतम न्यायालय के आदेश की बारीकियों का अवलोकन करें, तो यह स्पष्ट होता है कि यह निर्णय किसी नई नीतिगत क्रांति के बजाय न्यायिक अधिदेश का अनिवार्य अनुपालन मात्र है।

## विधिक अधिदेश की वास्तविकता

उच्चतम न्यायालय के आदेश का बिंदु संख्या 50(v) स्पष्ट रूप से यह निर्देशित करता है कि जब तक पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEF&CC), भारतीय वानिकी अनुसंधान एवं शिक्षा परिषद (ICFRE) के माध्यम से 'मैनेजमेंट प्लान फॉर सस्टेनेबल माइनिंग' (MPSM) को अंतिम रूप नहीं दे देता, तब तक नए पट्टे जारी नहीं किए जा सकते। ऐसे में प्रशासन का इसे अपनी उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत करना 'हेडलाइन मैनेजमेंट' की उस संस्कृति को दर्शाता है, जहाँ संवैधानिक कर्तव्यों को भी राजनीतिक उपहार की तरह पेश किया जाता है।

## 'सस्टेनेबल माइनिंग' (सतत खनन): परिभाषा और विरोधाभास

तकनीकी शब्दावली में 'सस्टेनेबल माइनिंग' या 'सतत खनन' एक ऐसा दृष्टिकोण है जो खनिज निष्कर्षण को पर्यावरणीय मर्यादाओं के भीतर रखने का दावा करता है। इसकी मुख्य विशेषताएं इस प्रकार परिभाषित की जा सकती हैं:

पारिस्थितिक पदचिह्न (Ecological Footprint): खनन के दौरान स्थानीय जैव-विविधता और जल-संरचनाओं (जैसे अरावली के एक्वीफर्स) को होने वाली क्षति को न्यूनतम करना।

 पुनरुद्धार (Reclamation): खनन समाप्त होने के बाद उस भूमि को पुनः वनीकरण या अन्य पारिस्थितिक उपयोग के योग्य बनाना।

 सामाजिक उत्तरदायित्व: स्थानीय समुदायों के स्वास्थ्य और अधिकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करना।

अदालत ने स्पष्ट किया है कि भविष्य में खनन की अनुमति केवल उन्हीं क्षेत्रों में दी जाएगी जहाँ इसे 'सतत' माना जा सके। किंतु, अरावली जैसी प्राचीन और जर्जर पर्वतमाला के लिए 'सतत खनन' की अवधारणा स्वयं में विरोधाभासी है, क्योंकि यहाँ का पारिस्थितिकी तंत्र पहले से ही नाजुक दौर (Tipping Point) में है।

## वर्तमान परिचालन और अनुपालन की चुनौती

आदेश का बिंदु संख्या (vii) एक महत्वपूर्ण विसंगति की ओर इशारा करता है: जबकि नए पट्टों पर रोक है, वर्तमान में संचालित खदानों को कार्य जारी रखने की अनुमति दी गई है, बशर्ते वे समिति की रिपोर्ट के पैराग्राफ 8 की सिफारिशों का सख्ती से पालन करें। यह प्रावधान एक गंभीर प्रश्न खड़ा करता है—यदि वर्तमान खदानों का संचालन पूर्णतः सुरक्षित होता, तो सख्त सिफारिशों की आवश्यकता ही क्यों पड़ती?

प्रशासनिक तंत्र को यह समझना होगा कि सूचना के इस युग में जनता केवल घोषणाओं से संतुष्ट नहीं होने वाली। अरावली का संरक्षण केवल कागजी 'मैनेजमेंट प्लान' तक सीमित नहीं रहना चाहिए। वास्तविक सफलता तब मानी जाएगी जब ICFRE का यह प्लान वैज्ञानिक ईमानदारी पर आधारित हो, न कि केवल खनन माफियाओं को विधिक रास्ता देने का एक माध्यम बने। अरावली को विज्ञापनों की बैसाखियों की नहीं, बल्कि कठोर विधिक और नैतिक संरक्षण की आवश्यकता है।