नई दिल्ली: 'वन्दे भारत' या 'विक्रय भारत'? जल, जंगल, जमीन और अरावली पर कॉर्पोरेट की विध्वंसक पकड़

लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला 


'वन्दे भारत' या 'विक्रय भारत'? जल, जंगल, जमीन और अरावली पर कॉर्पोरेट की विध्वंसक पकड़

वर्तमान केंद्र सरकार के 'राष्ट्रवाद' के आह्वान ('वन्दे भारत', 'देश नहीं बिकने दूँगा') और उसकी आर्थिक नीतियों (जल, जंगल, जमीन और महत्वपूर्ण भौगोलिक संरचनाओं का निजीकरण/कॉर्पोरेट हस्तांतरण) के बीच मौजूद है। यह एक तीखी टिप्पणी है जो प्रकृति प्रदत्त संसाधनों के 'विक्रय' को 'भारत वंदना' के नारे के विपरीत मानती है।

I. 'वन्दे भारत' के नारे के पीछे संसाधनों का 'विक्रय भारत'

सरकार का नारा 'देश नहीं बिकने दूँगा' रहा है, जबकि पिछले एक दशक में देश की अर्थव्यवस्था ने निजीकरण की जिस गति को देखा है, वह अभूतपूर्व है। लेकिन सबसे खतरनाक पहलू यह है कि निजीकरण अब केवल सार्वजनिक उपक्रमों (रेल, हवाई यात्रा, स्वास्थ्य, शिक्षा) तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह प्रकृति प्रदत्त नि:शुल्क उपहारों — जल, जंगल और जमीन— को भी कॉर्पोरेट मुनाफे के लिए खोलने लगा है। यह कैसी राष्ट्रभक्ति है जो राष्ट्रीय गीत के 'सुजलाम सुफ़लाम शस्य श्यामलाम' भूमि के आधार को ही नष्ट कर रही है?

1. जंगल और जमीन का भयावह अधिग्रहण

सिंगरौली का उदाहरण: मध्य प्रदेश के सिंगरौली में अडानी कोल माइनिंग के लिए लाखों पेड़ों की कटाई की खबर हृदय विदारक है। यह क्षेत्र अब वस्तुतः 'अडानी लैंड' बन चुका है, जहाँ आम नागरिक, यहाँ तक कि विपक्षी दल के नेताओं का प्रवेश भी वर्जित है। आदिवासी समाज के लिए बेशकीमती महुआ के पेड़ों का विनाश और जंगल के लुटेरों द्वारा की गई बर्बादी, कॉर्पोरेट विकास के नाम पर हुए पर्यावरण नरसंहार को दर्शाती है।

हसदेव और ज़ुल्म: छत्तीसगढ़ के हसदेव जंगल में भी आदिवासी समाज के प्रतिरोध के बावजूद कॉर्पोरेट हितों के लिए जो ज़ुल्म और ज्यादतियां हुई हैं, वे लोकतंत्र में आदिवासी अधिकारों के हनन का काला अध्याय हैं।

बुल्डोजर संस्कृति और कीमती जमीन: शहरों और तीर्थस्थलों (अयोध्या, बनारस, उज्जैन, केदारनाथ) में 'बुल्डोजर संस्कृति' के पीछे का एक कड़वा सच यह है कि खाली की गई बेशकीमती जमीन को बाद में ₹1 प्रति इकाई की सांकेतिक दर पर कॉर्पोरेट या विशिष्ट परियोजनाओं के लिए हस्तांतरित कर दिया जाता है।

यह व्यवस्था स्पष्ट करती है कि सरकार की प्राथमिकता 'जन' नहीं, बल्कि 'कारपोरेट' है, जिसके लिए प्राकृतिक संसाधन और नागरिकों के मौलिक अधिकार गौण हो जाते हैं।

II. अरावली पर्वत श्रृंखला: भूगोल और सभ्यता पर आसन्न खतरा

अब यह विनाशकारी सिलसिला देश के सबसे प्राचीनतम पर्वत—लगभग दो अरब साल पुराने—अरावली पर्वतमाला तक पहुँच गया है। सूत्रों के अनुसार, अरावली की 100 मीटर तक की पर्वत श्रृंखला को 'पर्वत' न मानते हुए खनन की कार्ययोजना तैयार की जा चुकी है।

1. अमूल्य खनिज भंडार का लालच

अरावली में सीसा, जस्ता (जिंक), तांबा, संगमरमर, ग्रेनाइट, अभ्रक (Mica), डोलोमाइट और बेरिल जैसे अमूल्य खनिज भंडार हैं। इन खनिजों का लालच, पर्वत के पर्यावरणीय महत्व पर भारी पड़ रहा है।

2. अरावली की पारिस्थितिकीय और भौगोलिक भूमिका

अरावली पर्वतमाला केवल पत्थरों का ढेर नहीं है; यह भारत के भूगोल और जलवायु का जीवन रक्षक तंत्र है:

 जल संचय केंद्र: अरावली से बनास, साबरमती, और लूनी जैसी महत्वपूर्ण नदियाँ निकलती हैं। इसके अलावा, नक्की झील, सांभर झील, पिछोला झील, और हरियाणा की दमदमा झीलें भी अरावली के जल पर निर्भर हैं। खनन से यह जल संचयन केंद्र पूरी तरह नष्ट हो जाएगा।

 मरुस्थल का प्रहरी: अरावली वह प्राकृतिक ढाल है जो थार रेगिस्तान को संपूर्ण राजस्थान, गुजरात, हरियाणा, दिल्ली और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में फैलने से रोकती है। यदि 700 किलोमीटर लंबी यह परिधि नष्ट हुई, तो ये क्षेत्र जबरदस्त सूखाग्रस्त हो जाएंगे और मरुस्थल की चपेट में आ जाएंगे।

पर्यटन और संस्कृति का विनाश: अजमेर शरीफ, पुष्कर, जैसलमेर, जोधपुर, उदयपुर और माउंट आबू जैसे पर्यटन और धार्मिक स्थल, साथ ही भरतपुर की जैव विविधता भी सीधे तौर पर प्रभावित होगी।

 दिल्ली पर विनाशकारी प्रभाव: पहले से ही पराली के धुएं से बेहाल राजधानी दिल्ली, जल संचयन केंद्र के खत्म होने और मरुस्थल के विस्तार से पर्यावरण की दुर्दशा की पराकाष्ठा पर पहुँच जाएगी।

III. निष्कर्ष: यह सिर्फ निजीकरण नहीं, सभ्यता का विनष्ट होना है

निजीकरण के माध्यम से पिछली सरकारों द्वारा निर्मित संस्थानों को बेचने के दुखद परिणाम पहले ही सामने आ चुके हैं। लेकिन जल, जंगल, जमीन, और अब अरावली पर्वत जैसे प्राकृतिक आधारभूत संरचना को कॉर्पोरेट लाभ के लिए नष्ट करने का निर्णय सबसे ख़तरनाक है।

अरावली का विनाश केवल भूगोल नहीं बदलेगा; यह हजारों वर्षों से बनी बनाई भारतीय सभ्यता और संस्कृति को विनष्ट कर देगा जो इन नदियों, झीलों और वन संपदा पर निर्भर रही है।

 अंतिम आह्वान:

हम सभी को समझना होगा कि केवल राष्ट्रीय गीत गाने और 'वन्दे भारत' कहने से राष्ट्र की सुरक्षा नहीं होती। देश को 'सुजलाम सुफ़लाम शस्य श्यामलाम' बनाए रखने के लिए अब एक राष्ट्रव्यापी 'अरावली बचाओ अभियान' प्रारंभ करना नितांत आवश्यक है। यदि हम अपने जल, जंगल और पर्वत को नहीं बचा पाए, तो राजनीतिक नारे केवल खोखले शब्द रह जाएंगे, जिसके पीछे एक बिकाऊ और सूखाग्रस्त भारत खड़ा होगा।