दिल्ली: 'वोट चोरी' का सन्नाटा और मीडिया की 'नारी शक्ति': जब जनहित से ऊपर हेडलाइन मैनेजमेंट
लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला
'वोट चोरी' का सन्नाटा और मीडिया की 'नारी शक्ति': जब जनहित से ऊपर हेडलाइन मैनेजमेंट
जब देश की राजधानी की हवा 'गंभीर' श्रेणी में दम घोंट रही हो और मुख्य विपक्षी दल का नेता सरेआम सत्ता पर 'वोट चोरी' का सबसे गंभीर आरोप लगा रहा हो, तो देश के राष्ट्रीय दैनिकों की पहली प्राथमिकता क्या होनी चाहिए? इस प्रश्न का उत्तर 16 दिसंबर के समाचार पत्रों के पहले पन्ने ने निराशाजनक रूप से दिया है: जनहित या राष्ट्रीय विमर्श नहीं, बल्कि 'हेडलाइन मैनेजमेंट' और सत्ता के प्रति सुविधाजनक समर्पण।
हाल ही में प्रेस क्लब ऑफ इंडिया की अध्यक्ष चुनी गईं साक्षी जोशी की जीत को हमने 'नारी शक्ति' की विजय बताया था। यह विडंबना है कि उसी समय, भारतीय पत्रकारिता की सामूहिक आत्मा इतनी पतनशील दिख रही है कि वह विपक्ष के सबसे बड़े आरोप को दबाने के लिए सत्ताधारी दल की 'पीढ़ीगत बदलाव' या कांग्रेस की 'आंतरिक कलह' जैसी गैर-जरूरी खबरों को लीड बना रही है।
सत्ता-संरक्षण का 'अमृत काल'
अधिकांश प्रमुख अखबारों द्वारा 'वोट चोर गद्दी छोड़' रैली की खबर को पहले पन्ने से गायब कर देना या उसे महत्वहीन बनाना, सामान्य संपादकीय निर्णय नहीं है; यह सांस्थानिक समर्पण का स्पष्ट संकेत है।
प्रश्न: जब चुनाव आयोग के नेशनल वोटर्स सर्विस पोर्टल (एनवीएसपी) की खामियों का लाभ उठाकर कर्नाटक की एक सीट पर धांधली करने का आरोप लगता है और भाजपा के पूर्व विधायक तथा उनके बेटे को आरोपी बनाया जाता है, तो यह खबर क्यों नहीं बनती?
उत्तर: क्योंकि यह खबर सीधे सत्ताधारी दल पर उंगली उठाती है और उस चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर प्रश्नचिह्न लगाती है, जिसके खिलाफ राहुल गांधी को सार्वजनिक रूप से अधिकारियों को 'याद दिलाना' पड़ रहा है कि वे देश के चुनाव आयुक्त हैं, भाजपा के नहीं।
जिन अखबारों ने इस खबर को दबाया, वे एक खतरनाक नजीर पेश कर रहे हैं: सत्ता की आलोचना करने वाली हर खबर 'अंदरूनी खबर' होगी, और सत्ता की प्रशंसा या विपक्ष की कमजोरी 'लीड' बनेगी।
जनहित का तिरस्कार: प्रदूषण बनाम पॉलिटिक्स
दिल्ली के प्रदूषण संकट को लीड बनाना पत्रकारिता की जिम्मेदारी है, और 'अमर उजाला' या 'हिन्दुस्तान टाइम्स' जैसे अखबारों ने उसे महत्व दिया। लेकिन क्या यह 'जनहित' की खबर को प्राथमिकता देना था, या यह राजधानी के सबसे ज्वलंत और गैर-राजनीतिक संकट को उछालकर राजनीतिक रूप से संवेदनशील 'वोट चोरी' के आरोप से ध्यान भटकाने का एक सुविधाजनक तरीका था?
अमर उजाला ने प्रदूषण की विशाल खबर के बावजूद, लीड का शीर्षक "भाजपा में पीढ़ीगत बदलाव का आगाज..." को दिया। क्या नए कार्यकारी अध्यक्ष का चयन, 'सीवियर प्लस' (Severe Plus) श्रेणी के प्रदूषण से जूझते नागरिकों के लिए या लोकतंत्र की आधारशिला पर लगे 'वोट चोरी' के आरोप से अधिक महत्वपूर्ण था? यह स्पष्ट रूप से विषयों की प्राथमिकता को बदलने (Agenda Setting) का प्रयास है, जहाँ राष्ट्रीय संकट को भी सत्ताधारी दल की सामान्य प्रशासनिक खबर से नीचे रखा गया।
महिला नेतृत्व के लिए चुनौती
प्रेस क्लब की नई महिला अध्यक्ष साक्षी जोशी के सामने चुनौती केवल क्लब को समावेशी बनाने की नहीं है, बल्कि इस सॉफ्ट-एटीट्यूड मीडिया के खिलाफ पत्रकारों के अधिकारों की रक्षा करने की है। जब पत्रकारिता का एक बड़ा हिस्सा सत्ता के हाथों में चला गया हो, तब प्रेस क्लब जैसे संगठनों को ही प्रेस की स्वतंत्रता का अंतिम किला बनना पड़ेगा।
साक्षी जोशी को यह सुनिश्चित करना होगा कि पत्रकार सुरक्षा, उत्पीड़न और सबसे बढ़कर, कवरेज की स्वतंत्रता का प्रश्न क्लब का सर्वोच्च एजेंडा बने। यदि मीडिया स्वयं ही लोकतंत्र के सबसे गंभीर आरोप (वोट चोरी) को नजरअंदाज कर दे, तो वह लोकतंत्र का चौथा स्तंभ नहीं, बल्कि सत्ता का चौथा आभूषण बनकर रह जाएगा।
भारतीय मीडिया को यह समझना होगा कि उनका कार्य सत्ता की सुविधा के लिए 'हेडलाइन मैनेजमेंट' करना नहीं है, बल्कि नागरिकों को सत्य प्रबंधन (Truth Management) के खतरों से अवगत कराना है। जिस दिन राष्ट्रीय मीडिया ने 'वोट चोरी' जैसे आरोपों को पहले पन्ने से गायब कर दिया, उस दिन उसने पत्रकारिता के साथ-साथ लोकतंत्र और नागरिक के विश्वास की भी चोरी कर ली है। यह समय उत्सव मनाने का नहीं, बल्कि गंभीर आत्मनिरीक्षण का है, इससे पहले कि 'नृपनीति' के अनेकरूप का प्रदर्शन करने वाले राजनेताओं के हाथों पत्रकारिता पूरी तरह दम तोड़ दे।
