सत्ता की देहरी पर विस्थापित होता 'अस्तित्व': झारखंड की भूमि का कड़वा सच
लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला
सत्ता की देहरी पर विस्थापित होता 'अस्तित्व': झारखंड की भूमि का कड़वा सचभारत की खनिज संपदा का केंद्र झारखंड आज एक ऐसे दोराहे पर खड़ा है, जहाँ 'विकास' और 'विनाश' के बीच की लकीर धुंधली पड़ती जा रही है। हाल ही में सामने आए जिलावार भूमि अधिग्रहण के आंकड़े न केवल चौंकाने वाले हैं, बल्कि वे एक जीवंत समाज के 'मृत समाज' में बदलने की पूर्व-चेतावनी हैं। कुल 19,48,807.896 एकड़ जमीन का अधिग्रहण और 30 लाख लोगों का संभावित विस्थापन केवल एक आर्थिक आंकड़ा नहीं है; यह एक पूरी सभ्यता के उजड़ने की दास्तान है।
1. आर्थिक पक्ष: किसका विकास, किसकी कीमत?
झारखंड के 24 जिलों में लगभग 4000 कंपनियों के लिए जमीन का यह जाल बिछाया जा रहा है। औद्योगिक गलियारों और 418 कारखानों के नाम पर जो जमीन ली जा रही है, वह राज्य के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में तो वृद्धि दिखा सकती है, लेकिन उन 4361 गाँवों का क्या, जिनकी अर्थव्यवस्था कृषि और वनोपज पर टिकी है? भूमि का मालिकाना हक जब कॉरपोरेट हाथों में जाता है, तो स्थानीय आदिवासी समुदाय जो कल तक अपनी जमीन का मालिक था, आज अपने ही आंगन में दिहाड़ी मजदूर बनने को मजबूर है।
2. सामाजिक और भौगोलिक प्रभाव: जड़ों से उखड़ता समाज
भौगोलिक दृष्टि से झारखंड की भूमि केवल मिट्टी नहीं, बल्कि आदिवासियों की सांस्कृतिक पहचान (Identity) है। सरायकेला, दुमका (7,39,017.58 एकड़) और चाईबासा (3,25,740.07 एकड़) जैसे क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर अधिग्रहण वहाँ की जनसांख्यिकी को बदल देगा। जब एक समुदाय अपनी जमीन खोता है, तो उसकी भाषा, परंपराएं और सामाजिक ढांचा भी बिखर जाता है। विस्थापन का अर्थ केवल स्थान बदलना नहीं, बल्कि उस 'सामाजिक सुरक्षा' को खो देना है जो पूर्वजों की जमीन से जुड़ी होती है।
3. पर्यावरणीय संकट: 'ग्रीन' झारखंड पर औद्योगिक साया
झारखंड का पर्यावरण भारत के फेफड़ों के समान है। लाखों एकड़ वन भूमि का औद्योगिक उपयोग जलवायु परिवर्तन (Climate Change) की दिशा में एक आत्मघाती कदम है। अंधाधुंध खनन और कारखानों से होने वाला जल और वायु प्रदूषण न केवल जैव-विविधता को नष्ट करेगा, बल्कि झारखंड की नदियों और पहाड़ों के अस्तित्व को भी संकट में डाल देगा। क्या हम एक ऐसे भविष्य की ओर बढ़ रहे हैं जहाँ खनिज तो होंगे, लेकिन पीने के लिए शुद्ध पानी और सांस लेने के लिए हवा नहीं?
4. जीवनशैली पर प्रहार: 'स्वराज' से 'परतंत्रता' तक
एक आम आदिवासी या ग्रामीण के लिए उसकी जीवनशैली 'प्रकृति' के साथ लयबद्ध है। भूमि छिनने से वह 'आत्मनिर्भरता' से 'बाजार पर निर्भरता' की ओर धकेला जा रहा है। सत्ता और कंपनियों का यह गठबंधन उसे यह समझाने की कोशिश कर रहा है कि 'धर्म' की रक्षा अधिक महत्वपूर्ण है, ताकि वह अपनी 'जमीन' की लूट को न देख सके। जैसा कि जनमानस में चर्चा है—धर्म एक साजिश बन जाता है जब वह भूख और हक की आवाज को दबाने का काम करने लगे।
## मुख्यधारा की मीडिया की चुप्पी: एक प्रश्नचिह्न
यह अत्यंत विचलित करने वाला है कि 30 लाख लोगों के विस्थापन जैसे संवेदनशील मुद्दे पर राष्ट्रीय मीडिया मौन है। इसके कई कारण स्पष्ट होते हैं:
करपोरेट विज्ञापन का दबाव: अधिकांश बड़े मीडिया घराने उन्हीं कॉरपोरेट समूहों द्वारा वित्तपोषित हैं जो इन अधिग्रहणों के पीछे हैं। अपने 'अन्नदाता' के खिलाफ खबरें दिखाना उनके व्यापारिक हितों के विरुद्ध है।
इमेज मैनेजमेंट की प्राथमिकता: सत्ता और शासन 'विकास' की एक चमकती हुई छवि बेचना चाहते हैं। विस्थापन और आंसू उस छवि को धूमिल करते हैं, इसलिए इन्हें 'देश के विकास के लिए आवश्यक बलिदान' बताकर दबा दिया जाता है।
टीआरपी और ध्रुवीकरण: मीडिया के लिए धर्म और सांप्रदायिक बहस टीआरपी बटोरने का आसान जरिया हैं। भूमि अधिग्रहण जैसे जटिल और जमीनी मुद्दों में वह 'तड़का' नहीं होता जो प्राइम टाइम की बहसों को रोचक बनाए।
झारखंड की यह सूची एक लोकतंत्र के लिए 'रेड अलर्ट' है। यदि न्याय व्यवस्था, कार्यपालिका और मीडिया अपराधियों को बचाने या संवेदनशील मुद्दों से मुंह मोड़ने का काम करेंगे, तो वह दिन दूर नहीं जब नागरिक का भरोसा तंत्र से पूरी तरह उठ जाएगा। समय की मांग है कि 'मीठी वाणी' और 'धर्म के छलावे' से बाहर निकलकर, जमीन की इस कड़वी सच्चाई के लिए 'मेहनती कर्म' और 'सत्य' के साथ खड़ा हुआ जाए।
झारखंड के आदिवासी समाज को आज तय करना होगा कि क्या वे प्रतीकों की लड़ाई में उलझे रहेंगे, या अपने अस्तित्व की आधारशिला—अपनी जमीन—को बचाने के लिए संगठित होंगे।
