प्रशासनिक शुचिता और जन-केंद्रित शासन का नया मॉडल
लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला
प्रशासनिक शुचिता और जन-केंद्रित शासन का नया मॉडल
## औपनिवेशिक ढांचे पर प्रहार
दशकों से भारतीय प्रशासनिक तंत्र में कुछ ऐसी व्यवस्थाएं 'दीमक' की तरह घर कर गई थीं, जिनका आधार जनता की सेवा नहीं बल्कि उनका आर्थिक दोहन था। उत्तर प्रदेश के बिजली विभाग में 'एस्टीमेट प्रणाली' इसका सबसे क्रूर उदाहरण थी। योगी सरकार द्वारा इस व्यवस्था को समाप्त कर ₹7,500 की फ्लैट फीस निर्धारित करना केवल एक वित्तीय निर्णय नहीं, बल्कि 'इंस्पेक्टर राज' की ताबूत में आखिरी कील ठोकने जैसा है।
1. प्रशासनिक दृष्टिकोण: विवेकाधिकार का विलोपन (Abolition of Discretionary Power)
प्रशासनिक सुधार का स्वर्णिम सिद्धांत है— "जहाँ विवेकाधिकार (Discretion) होता है, वहीं भ्रष्टाचार पनपता है।"
प्रक्रिया का सरलीकरण: पहले एक कनिष्ठ अभियंता (JE) तय करता था कि खंभा कहाँ लगेगा और तार की लंबाई कितनी होगी। इस 'तकनीकी एस्टीमेट' की आड़ में भ्रष्टाचार का एक बड़ा संजाल खड़ा था।
अकाउंटेबिलिटी (जवाबदेही): फ्लैट रेट होने से अब बाबू या अधिकारी यह नहीं कह सकते कि "फाइल तकनीकी कारणों से रुकी है।" इससे 'इज ऑफ लिविंग' के इंडेक्स में सुधार होगा और सरकारी तंत्र में पारदर्शिता आएगी।
2. विधिक दृष्टिकोण: विधि का शासन बनाम विवेकाधीन लूट
विधिक रूप से, यह कदम 'प्रिवेंशन ऑफ करप्शन एक्ट' के उद्देश्यों को धरातल पर उतारता है।
मानकीकरण (Standardization): कानून की नजर में सभी नागरिक समान हैं। जब शुल्क मानक (Standard) हो जाता है, तो कानून लागू करना आसान होता है।
विधिक सुरक्षा: अब यदि कोई कर्मचारी अतिरिक्त धन की मांग करता है, तो उपभोक्ता के पास एक स्पष्ट विधिक आधार (Flat Rate Order) है जिसके आधार पर वह लोकायुक्त या विजिलेंस में शिकायत कर सकता है। यह 'रूल ऑफ लॉ' को मजबूत करता है।
3. संवैधानिक दृष्टिकोण: सामाजिक न्याय और अनुच्छेद 21
संविधान के नजरिए से बिजली अब केवल एक सुविधा नहीं, बल्कि अनुच्छेद 21 (जीवन का अधिकार) के अंतर्गत एक गरिमामय जीवन की अनिवार्य शर्त है।
अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार): पहले 'एस्टीमेट' व्यक्ति की जेब देखकर बनाया जाता था। अमीर के लिए अलग 'मैनेजमेंट' और गरीब के लिए भारी भरकम बिल। फ्लैट रेट व्यवस्था ने 'समानता' के संवैधानिक मूल्य को बहाल किया है।
कल्याणकारी राज्य (Welfare State): राज्य का कर्तव्य है कि वह बुनियादी सुविधाएं बिना किसी बाधा के नागरिकों तक पहुंचाए। यह निर्णय नीति निर्देशक तत्वों (DPSP) की भावना के अनुरूप है।
4. सामाजिक दृष्टिकोण: विश्वास की बहाली
समाज और सरकार के बीच सबसे बड़ी खाई 'अविश्वास' की होती है।
भ्रष्टाचार का मनोवैज्ञानिक अंत: जब एक आम आदमी को बिजली कनेक्शन के लिए दफ्तरों के चक्कर नहीं काटने पड़ते, तो उसका लोकतंत्र और सरकार पर भरोसा बढ़ता है।
अंतिम पायदान का व्यक्ति: यह सुधार विशेष रूप से उस ग्रामीण नागरिक के लिए है जिसकी आवाज लखनऊ के सचिवालय तक नहीं पहुँचती थी, लेकिन जिसका शोषण स्थानीय स्तर पर 'एस्टीमेट' के नाम पर होता था।
## तुलनात्मक विश्लेषण: पुरानी बनाम नई व्यवस्था
# पुरानी एस्टीमेट व्यवस्था लागत - अनिश्चित (हजारों से लाखों तक)
शक्ति का केंद्र - JE/SDO का व्यक्तिगत निर्णय
भ्रष्टाचार की गुंजाइश - अत्यधिक (तकनीकी पेच फंसाकर)
समय सीमा - हफ़्तों या महीनों का इंतजार
# नई फ्लैट रेट व्यवस्था |
लागत - ₹7,500 (300 मीटर तक) |
शक्ति का केंद्र - सरकारी नीति और नियम |
भ्रष्टाचार की गुंजाइश - शून्य (निश्चित फीस के कारण) |
समय सीमा - तत्काल और पारदर्शी प्रक्रिया |
## राष्ट्रीय स्तर पर अनुकरण की आवश्यकता
उत्तर प्रदेश का यह 'यूपी मॉडल' अब राष्ट्रीय चर्चा का विषय होना चाहिए। अन्य राज्यों को भी बिजली, नगर निगम और राजस्व जैसे विभागों में जहाँ 'एस्टीमेट' या 'असेसमेंट' के नाम पर भ्रष्टाचार होता है, वहाँ इसी तरह के फ्लैट-रेट और ऑटो-अप्रूवल मॉडल को अपनाना चाहिए। भ्रष्टाचार की जड़ों में 'मट्ठा' डालना ही सुशासन (Good Governance) का एकमात्र मार्ग है।
