मोबाइल की लत और मूक अवसाद: भारत के मानसिक स्वास्थ्य पर मंडराता अदृश्य राष्ट्रीय संकट

लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला 


मोबाइल की लत और मूक अवसाद: भारत के मानसिक स्वास्थ्य पर मंडराता अदृश्य राष्ट्रीय संकट

भारत आज विश्व की सबसे युवा आबादी वाला देश है, पर दुर्भाग्य से यह वही पीढ़ी है जो डिजिटल डिपेंडेंसी के कारण एक ऐसे मानसिक संकट में धकेली जा रही है, जिसे हम न तो पूरी तरह समझ पा रहे हैं और न स्वीकार कर रहे हैं। इंदौर के एमजीएम मेडिकल कॉलेज की ओर से 500 लोगों पर किए गए अध्ययन के निष्कर्ष इस अदृश्य संकट को बेहद स्पष्ट रूप से उजागर करते हैं—

* 73% लोग मोबाइल की लत (Digital Dependency) से पीड़ित,

और

* 80% प्रतिभागी मूक अवसाद (Silent Depression) से ग्रस्त पाए गए।


यह केवल एक चिकित्सा अध्ययन नहीं, "एक चेतावनी है — उस आने वाले मानसिक स्वास्थ्य आपातकाल की, जिसे हम अनदेखा कर रहे हैं।"


# डिजिटल डिपेंडेंसी: नशा, लेकिन आधुनिक रूप में


मोबाइल फोन का अत्यधिक उपयोग अब आदत नहीं, मस्तिष्क की रिवार्ड प्रणाली पर आधारित एक डिजिटल नशा बन चुका है। डोपामाइन का अस्थायी उत्तेजन दिमाग को बार-बार स्क्रीन की तरफ खींचता है— वैसी ही प्रक्रिया जो किसी भी नशे में देखी जाती है। लेकिन अंतर यह है कि यह नशा समाज द्वारा स्वीकृत है, और यही इसे अधिक खतरनाक बनाता है।


भारत में स्मार्टफोन और इंटरनेट के विस्फोटक प्रसार— कम डेटा लागत, 24×7 ऑनलाइन संस्कृति, सोशल मीडिया क्रांति और रील्स-एरा— ने हमारे मस्तिष्क को निरंतर उत्तेजित, लेकिन भीतर से खाली करते रहने वाली चक्रीय अवस्था में पहुंचा दिया है।


# मूक अवसाद (Silent Depression): आधुनिक मन का छिपा हुआ रोदन


अध्ययन का सबसे भयावह पक्ष यही है— "अधिकांश लोग अवसाद से पीड़ित हैं, लेकिन उन्हें इसका एहसास ही नहीं।"


Silent Depression के प्रमुख संकेत:


* निरंतर मानसिक थकान

* आनंद की कमी

* खालीपन

* कार्य-रुचि में गिरावट

* चिड़चिड़ापन

* एकांत की चाह, पर अकेलापन बढ़ना


यह अवसाद बाहर से सामान्य दिखने वाले व्यक्तियों में भी गहरा बैठ जाता है। मोबाइल एक पल के लिए मन को विचलित कर अवसाद को ढक देता है, पर भीतर वह अवसाद और मजबूत होता जाता है।


# भारत का मोबाइल पर अत्यधिक निर्भर समाज


डिजिटल इंडिया के आर्थिक और सामाजिक लाभ निर्विवाद हैं, लेकिन इसके साथ उभरा डिजिटल ओवरडोज अब राष्ट्रीय स्वास्थ्य चुनौती बनता जा रहा है।


# औसतन 7 घंटे स्क्रीन टाइम — पर क्या हासिल?


अध्ययन दिखाता है कि लोग प्रतिदिन 6-8 घंटे स्क्रीन पर बिताते हैं, लेकिन इस समय का अधिकांश हिस्सा


* रील्स,

* शरीर-मन पर बोझ बढ़ाने वाली अनियंत्रित स्क्रॉलिंग,

* विवादित वीडियो,

* फेक न्यूज,

* ऑनलाइन तुलना,

  में खत्म हो जाता है।


यह मानसिक ऊर्जा को नष्ट करता है, प्रेरणा को खाता है, और अंततः अवसाद को जन्म देता है।


# नोमोफोबिया — मोबाइल न हो, तो घबराहट


यह नया मनोवैज्ञानिक रोग है— No Mobile Phobia.


अध्ययन में लोग मोबाइल खोने, बंद हो जाने या नेटवर्क न मिलने पर घबराहट, बेचैनी, हृदयगति बढ़ना और तनाव से जूझते पाए गए।


मोबाइल अब उपकरण नहीं, सुरक्षा-भावना का स्रोत बन चुका है, जो मन को अस्थायी सहारा देता है, लेकिन मानसिक निर्भरता को बढ़ाता है।


# नींद: सबसे बड़ा शिकार


मोबाइल स्क्रीन की नीली रोशनी मेलाटोनिन को बाधित कर देती है।


भारत में:


* युवाओं में अनिद्रा तेजी से बढ़ रही है

* नींद की गुणवत्ता खराब

* सुबह थकान और दिनभर चिड़चिड़ापन

* पढ़ाई और कार्य-क्षमता में गिरावट


यह मूक अवसाद का सबसे प्रमुख कारण है।


# डिजिटल भारत में सामाजिक संबंधों की मृत्यु


परिवार में रहने के बावजूद लोग भावनात्मक रूप से अकेले होते जा रहे हैं। स्क्रीन के पीछे बिताया गया समय संवाद, सहानुभूति और निकटता को खत्म कर रहा है।


बच्चे माता-पिता की आंखों से ज़्यादा स्क्रीन से सीख रहे हैं। पति-पत्नी में संवाद कम, स्वाइपिंग और स्क्रॉलिंग ज्यादा है। परिवार एक ही कमरे में होते हुए भी मानसिक रूप से एक-दूसरे से मीलों दूर हैं।


# भारत के लिए यह क्यों एक राष्ट्रीय संकट है?


1. युवा मानसिक स्वास्थ्य पर सीधा प्रभाव — जनसांख्यिकीय लाभांश पर खतरा

2. कम होती एकाग्रता — शिक्षा, अनुसंधान, सृजनात्मकता और औद्योगिक उत्पादकता पर असर

3. वैयक्तिक अवसाद से सामाजिक हिंसा — बढ़ते रोडरेज, ऑनलाइन गुस्सा, सायबर बुलिंग

4. सामाजिक ताने-बाने का टूटना

5. आर्थिक नुकसान — मानसिक अवसाद से कार्यक्षमता घटने का करोड़ों का नुकसान


मोबाइल एक तकनीक नहीं रहा— "यह एक बीमारी बनकर हमारे समाज को धीमे-धीमे निगल रहा है।"


# क्या करें? — राष्ट्रीय स्तर पर समाधान


यह केवल व्यक्तिगत समस्या नहीं, एक पब्लिक हेल्थ इमरजेंसी बन चुका है।


1. डिजिटल वेलनेस को राष्ट्रीय नीति में शामिल किया जाए


स्कूलों, कार्यालयों और सरकारी संस्थानों में डिजिटल हेल्थ शिक्षण अनिवार्य हो।


2. युवाओं के लिए ‘Digital Detox Hour’ की अनिवार्यता


स्कूल-कॉलेजों में दिन में 1 घंटे मोबाइल-फ्री समय।


3. मीडिया साक्षरता और रील्स के एल्गोरिदम पर नियंत्रण


कंटेंट का नियमन और मानसिक स्वास्थ्य चेतावनी।


4. सरकारी स्वास्थ्य मिशनों में मानसिक स्वास्थ्य का विस्तार


जैसे TB, पोलियो आदि पर बड़े अभियान हुए— वैसे ही Digital Health Awareness Mission आवश्यक है।


5. परिवार-स्तर पर स्क्रीन नियम


* खाने की मेज पर मोबाइल निषेध

* बच्चों के लिए स्क्रीन लिमिट

* रात में चार्जिंग का स्थान अलग


# अंतिम प्रश्न — क्या हम अपनी स्क्रीन पर नियंत्रण रखेंगे, या स्क्रीन हमें नियंत्रित करेगी?


मोबाइल की लत आज भारत का सबसे बड़ा अदृश्य संकट है।

यह शरीर से नहीं,

मस्तिष्क से,

व्यवहार से,

भावनाओं से,

और रिश्तों से

हमारी ऊर्जा छीन रहा है।


जो खतरा अभी दिखाई नहीं दे रहा, कल वह भारत की पूरी पीढ़ी को मानसिक रूप से कमजोर कर सकता है। भारत ने कई संकटों पर विजय पाई है— गरीबी, बीमारियाँ, अशिक्षा। लेकिन आने वाली सबसे कठिन लड़ाई डिजिटल अति-निर्भरता के खिलाफ होगी। आज यह आवश्यक है कि हम "तकनीक के मालिक बनें, न कि उसके गुलाम।"