क्यों अभी भी बिहार में नीतीश कुमार विकल्प-मुक्त बने हुए हैं?

 लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला 


क्यों अभी भी बिहार में नीतीश कुमार विकल्प-मुक्त बने हुए हैं?

— दसवीं बार मुख्यमंत्री पद की शपथ के पीछे राजनीतिक यथार्थ

गुरुवार को जब नीतीश कुमार ने 10वीं बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ली, तब यह समारोह पिछली नौ शपथों जैसा नहीं था। इस बार, शपथ के शब्दों के उच्चारण में उनकी स्पष्ट दिक्कत सामने आई — उम्र का असर अब राजनीतिक परदे पर भी दिखने लगा है। फिर भी, बिहार की राजनीति में उनकी प्रासंगिकता बनी हुई है। सवाल उठता है — अगर इतनी लंबी पारी और इतनी बार शपथ के बाद भी विकल्प नहीं दिख रहा, तो क्यों?


1. गठबंधन राजनीति का चक्र: अकेले नहीं चले जा सकते


* 2005 से निरंतर सत्ता में बने रहने वाला वह गठबंधन जिसमें नीतीश कुमार हैं, आज भी सक्रिय है।

* अकेले जनता दल (यूनाइटेड) – जेडीयू अपने दम पर सत्ता नहीं बना पा रही है, न ही – राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) और न ही भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी)।

* परिणामस्वरूप, नीतीश कुमार को यूपीए या एनडीए जैसे व्यापक गठबंधनों का हिस्सा बने रहना पड़ता है।


इस अर्थ में वह विकल्प-मुक्त नहीं बल्कि गठबंधन-सहायता से चले आ रहे हैं—और यह उन्हें बिहार में एक अनिवार्य व्यक्ति बनाता है।


2. जाति से क्लास तक की सामाजिक इंजीनियरिंग


* बिहार की राजनीति सदियों से जाति-प्रधान रही है। उस पर नीतीश कुमार ने ‘कास्ट-टो-क्लास’ का मॉडल पेश किया।

* कुर्मी (लगभग 2.87 %)-कोइरी जब मिलते हैं तो करीब 7 % वोट बैंक बनता है—फिर भी नीतीश कुमार ने सिर्फ इन तक सीमित न रहकर महादलित, अति पिछड़ा, महिलाएं को जोड़ने की दिशा में योजनाएं चलाईं।

* उदाहरण स्वरूप, जीविका दीदियों और महिलाओं के लिए साइकिल, पोशाक योजनाएं जिससे वोट-बेस पीढ़ी दर पीढ़ी समाहित हुआ।


इसी कारण आज जेडीयू का वोट शेयर लगभग 19 % से अधिक है—एक ऐसी संख्या जो अकेले कुर्मी-कोइरी समर्थक वोट से नहीं मिल सकती।


3. जहाँ विकास की गड़गड़ाहट है… वहाँ भी राजनीति की चिकित्सा


* 20 वर्षों से “सुशासन बाबू” की छवि वाले नीतीश कुमार के शासनकाल में भी बिहार विकास के संकेतकों में पिछड़ा रहा है—शिक्षा, प्रति-व्यक्ति आय, उद्योग, रोजगार सभी में दूसरे राज्यों से पीछे।

* फिर भी उन्हें विकल्प नहीं मिला—इसका कारण सिर्फ कथित विकास का प्रदर्शन नहीं, बल्कि उनकी योजनाएं-विचार-साधारण बातों का वोटर-अनुरूप रूप से उतर जाना है।


इस प्रकार, विकास-वचन और योजनाएं वोट विकल्प का स्थान ले चली हैं।


4. उम्र, बोलने की गति और नए दौर की चुनौतियाँ


* इस बार शपथ ग्रहण में उनका शब्दों का उच्चारण पहले जितना स्पष्ट नहीं था—यह उम्र का असर है और यह राजनीति में एक संकेत भी है।

* इसके बावजूद, जनता में उम्मीद बनी हुई है। उदाहरण के लिए — जीविका दीदियों गीता देवी और सरिता कुमारी जैसी महिलाएँ कह रही हैं: “हमारे लिए नीतीश कुमार ही करेंगें। हमने उन्हें वोट इसलिए दिया है।”

* यह भावना बताती है कि विकल्प-मुक्तता सिर्फ नेता-स्तर की नहीं, वोटर-स्तर की भी स्थिति है।


5. विकल्प की कमी नहीं, लेकिन विकल्प सक्रिय नहीं


* विकल्प = एक नया नेता, नई पार्टी या नई विचारधारा। बिहार में विकल्प गाँठ नहीं पाकर सक्रिय नहीं हो रहा।

* वरिष्ठ पत्रकार सुरूर अहमद का विश्लेषण महत्वपूर्ण है: “नीतीश कुमार मुख्यमंत्री हैं क्योंकि उनके नाम पर एनडीए गठबंधन को वोट मिला है… अगले साल कई राज्यों में चुनाव हैं और बीजेपी गलत मैसेज नहीं देना चाहेगी।”

* इसे इस तरह भी देखा जा सकता है: विकल्प मौजूद हैं, पर बीजेपी-जेडीयू गठबंधन इस विकल्प को अभी शुरू-आधार पर ही रोकता दिख रहा है।


## जब विकल्प का तय होना देर हो जाए… तब क्या होता है?


बिहार राजनीति में विकल्प-मुक्तता एक वास्तविक परिस्थिति बन चुकी है। यह विकल्प-शून्यता नहीं, बल्कि वोट-प्रक्रिया में स्थिरता और रणनीतिक संतुलन का परिणाम है।


अगर इस संतुलन को किसी नवीन नेता, नई पार्टी या नए विचार से हल किया जाना है तो


* विकल्प को केवल विरोध-नेता बनकर नहीं, निर्माण-नेता बनकर उतरना होगा।

* योजनाएं ईमानदारी से जनता तक पहुँचनी होंगी—वोट-वचन से आगे।

* और सबसे महत्‍वपूर्ण—संस्थान-विश्वास (e.g., चुनाव आयोग) कमजोर नहीं होना चाहिए।


तब तक, नीतीश कुमार जैसे सियासी बूते—असल में ‘विकल्प नहीं’ बल्कि ‘स्थिरता’ का प्रतीक बने रहेंगे; और यही बिहार की राजनीति की एक लंबी अवधि वाली अनकही कहानी है।