तलाक़-ए-हसन, संवैधानिकता और बदलता सामाजिक न्याय

 लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला 


तलाक़-ए-हसन, संवैधानिकता और बदलता सामाजिक न्याय

भारत की संवैधानिक यात्रा हमेशा से दो मूल ध्रुवों पर टिकी रही है—मौलिक अधिकार और सांस्कृतिक/धार्मिक बहुलता। इन दोनों के बीच संतुलन बनाए रखना भारतीय न्यायपालिका के लिए हमेशा एक चुनौती रहा है। व्यक्तिगत विधि-व्यवस्था (Personal Law) का प्रश्न इसी संवैधानिक दुविधा को बार-बार उजागर करता है—विशेषकर तब जब यह विवाह, तलाक़ और लैंगिक समानता जैसे निजी लेकिन सामूहिक प्रभाव वाले विषयों से जुड़ता है।

तलाक़-ए-हसन पर सुप्रीम कोर्ट की हालिया टिप्पणी इसी लंबे विमर्श का एक नया अध्याय है। यह मुद्दा केवल धर्म या परंपरा का नहीं—बल्कि महिला गरिमा, कानूनी प्रक्रिया, समानता और व्यक्ति-स्वायत्तता का प्रश्न है।

🔹 इतिहास और विधिक संदर्भ

2017 में शायरा बानो बनाम भारत सरकार मामले में सुप्रीम कोर्ट ने तलाक़-ए-बिद्दत (तीन तलाक़) को असंवैधानिक ठहराया था। अदालत ने स्पष्ट कहा था— “मनमाने ढंग से दिए गए तलाक़ का कोई स्थान आधुनिक संवैधानिक समाज में नहीं है।”

इस निर्णय के बाद उम्मीद थी कि मुस्लिम तलाक़ व्यवस्था में सुधार और मानकीकरण की दिशा शुरू होगी। लेकिन अब तलाक़-ए-हसन पर कानूनी सवाल उठना यह दर्शाता है कि समस्या केवल तरीक़े में नहीं, बल्कि कानूनी असमानता और प्रक्रिया-विहीनता में निहित है।

🔹 तलाक़-ए-हसन: सिद्धांत और व्यवहार

सैद्धांतिक रूप से तलाक़-ए-हसन एक विचारशील, पुनर्समीक्षा-आधारित प्रक्रिया मानी जाती है— तीन महीनों में एक-एक बार “तलाक़” बोलना, साथ-रहना लेकिन संबंध न बनाना, और प्रत्येक चरण पर मेल-मिलाप की संभावना खुली रखना।

विद्वानों के अनुसार यह जल्दबाज़ी रोकने का धार्मिक-नैतिक तंत्र है। लेकिन वास्तविकता में यह आदर्श मॉडल आज जिस रूप में व्यवहार में है, वह समय, समाज और टेक्नोलॉजी के दबाव में विकृत होता जा रहा है:

* तलाक़ वकीलों के माध्यम से भेजे जा रहे हैं

* नोटिसों पर पति के हस्ताक्षर नहीं

* कई मामलों में तीन महीने की प्रक्रिया 3 मिनट में बदल जाती है

* महिलाएँ मानसिक, आर्थिक और सामाजिक असुरक्षा में रह जाती हैं

यही विकृति न्यायपालिका की चिंता का स्रोत है।

🔹 विधिक प्रश्न: क्या यह संविधान की कसौटी पर खरा?

सुप्रीम कोर्ट के सामने मुख्य प्रश्न यह नहीं है कि तलाक़-ए-हसन धार्मिक रूप से मान्य है या नहीं, बल्कि यह है कि— “क्या कोई भी धार्मिक प्रथा संविधान के तहत समानता (अनु. 14), गरिमा (अनु. 21), और लैंगिक न्याय को नुकसान पहुँचाते हुए लागू रह सकती है?”

भारत के संविधान ने धर्म की स्वतंत्रता (अनु. 25) को मान्यता दी है, लेकिन यह अधिकार सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य व अन्य मौलिक अधिकारों के अधीन है।

अर्थात— यदि कोई प्रथा मूलभूत मानवाधिकारों का उल्लंघन करती है, तो वह धार्मिक स्वतंत्रता के नाम पर संरक्षित नहीं रह सकती।

🔹 समाजशास्त्रीय परिप्रेक्ष्य: तलाक़, पितृसत्ता और शक्ति संतुलन

तलाक़-ए-हसन पर विवाद केवल धर्म और कानून का नहीं, बल्कि सत्ता संरचना का प्रश्न है।

अधिकांश मोड में:

* तलाक़ का अधिकार पुरुष-केन्द्रित

* निर्णय-प्रक्रिया एकपक्षीय

* महिला आर्थिक रूप से निर्भर

* दस्तावेज़ीकरण अस्पष्ट

* समुदाय आधारित दबाव ज़्यादा

समाजशास्त्र हमें बताता है कि जहाँ कोई प्रक्रिया कानूनी रूप से असमान अधिकार वितरण पर आधारित हो, वहाँ वह केवल सांस्कृतिक नहीं—बल्कि पितृसत्तात्मक शक्ति संरचना का औजार बन जाती है।

🔹 व्यक्तिगत विधि बनाम समान नागरिकता

तलाक़-ए-हसन विवाद एक बड़े प्रश्न की ओर संकेत करता है—

👉 क्या भारत को Uniform Civil Code (समान नागरिक संहिता) की ओर बढ़ना चाहिए?

या

👉 क्या समुदाय-आधारित व्यक्तिगत विधियों का आंतरिक सुधार ही बेहतर मार्ग है?

कई विद्वानों का तर्क है कि: "सुधार भीतर से आए तो सामाजिक स्वीकार्यता अधिक होती है, जबकि बाहरी थोपे गए क़ानून प्रतिरोध और ध्रुवीकरण पैदा करते हैं।"

🔹 आगे का रास्ता: न्यायपालिका और समुदाय की साझी भूमिका

इस विषय में सर्वोच्च न्यायपालिका की भूमिका निर्णयकर्ता की नहीं, बल्कि संवाद-प्रेरक की प्रतीत होती है। अदालत ने केवल यही पूछा है:

* क्या यह प्रक्रिया पारदर्शी और निष्पक्ष है?

* क्या महिला को समान अधिकार और सुरक्षा प्राप्त है?

* क्या तलाक़ मानव गरिमा और प्रक्रिया-न्याय (due process) के साथ मिलता है?

अब यह जिम्मेदारी—

✔ मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड,

✔ महिला अधिकार समुदाय,

✔ और विधि आयोग

की है कि वे एक ऐसा मॉडल विकसित करें जिसमें:

* दस्तावेज़ीकरण अनिवार्य हो

* महिला-सुरक्षा की गारंटी हो

* आर्थिक और अभिभावक अधिकार संरक्षित हों

* और तलाक़ केवल संवाद विफल होने की अंतिम स्थिति में हो

## तलाक़-ए-हसन केवल एक धार्मिक प्रथा नहीं—एक आईना है

यह बहस हमें याद दिलाती है कि— "कानून केवल न्याय का साधन नहीं, बल्कि समाज के बदलते नैतिक मूल्यों का प्रतिबिंब भी है।"

भारत में तलाक़-ए-हसन पर चर्चा केवल मुस्लिम समाज का मुद्दा नहीं— यह उन सभी महिलाओं का प्रश्न है, जो विवाह संस्था में समानता, सम्मान और कानूनी सुरक्षा चाहती हैं। एक लोकतांत्रिक समाज की पहचान यही है कि— परंपराएँ टिक सकती हैं, लेकिन अन्याय नहीं।