पत्रकार मसीहा नहीं—लोकतंत्र का आईना हैं
लखनऊ डेस्क प्रदीप shukla
पत्रकार मसीहा नहीं—लोकतंत्र का आईना हैं: पत्रकारिता और राजनीति की धुंधली होती रेखाओं पर गंभीर चेतावनी
भारत हो या दुनिया—हर समाज में ऐसे पत्रकार होते हैं जो सत्ता से कठिन, असुविधाजनक, अप्रिय सवाल पूछते हैं। यही उनका धर्म है। लेकिन समस्या यह है कि दर्शक और पाठक अक्सर ऐसे पत्रकारों को एक तरह का ‘उद्धारक’—‘मसीहा’—मान बैठते हैं। उनसे उम्मीद की जाती है कि वे न सिर्फ सच उजागर करें, बल्कि उन राजनेताओं की कुर्सियों को भी हिलाएं और उनकी जगह स्वयं राजनीतिक समाधान प्रस्तुत करें।
यही सबसे बड़ा भ्रम है। पत्रकार का काम राजनीतिक समाधानों का निर्माण नहीं, बल्कि वस्तुस्थिति का आईना समाज के सामने रखना है। वह लोकतंत्र के लिए जरूरी ‘सूचनात्मक ऑक्सीजन’ उपलब्ध कराता है; राजनीतिज्ञ या एक्टिविस्ट की भूमिका नहीं निभाता।
## पत्रकार और विपक्ष—दोनों सत्ता से सवाल पूछते हैं, पर भूमिकाएँ भिन्न हैं
अक्सर कहा जाता है कि सत्ता से सवाल पूछना विपक्ष का भी काम है। यह सही है, लेकिन विपक्ष और पत्रकार के तौर-तरीकों में मौलिक अंतर है:
* विपक्ष – जनता का राजनीतिक प्रतिनिधि, विकल्प देने वाला, समाधान प्रस्तुत करने वाला, सत्ता प्राप्त करने की इच्छा रखने वाला।
* पत्रकार – सार्वजनिक हित में सूचना देने वाला, सत्ता को जवाबदेह बनाने वाला, बिना किसी राजनीतिक हित के सच्चाई खोलने वाला।
दोनों की सीमाएँ अलग हैं और इन सीमाओं का टूटना लोकतंत्र के लिए खतरा पैदा करता है। आज भारत सहित दुनिया भर में इस रेखा को धुंधला करने की खतरनाक प्रवृत्ति बढ़ रही है।
## विश्व पत्रकारिता के दिग्गजों की चेतावनी: एक्टिविज्म और पत्रकारिता अलग नावें हैं
# वाल्टर क्रोनकाइट – अमेरिका के सबसे विश्वसनीय एंकर
उन्होंने कहा था: “Objective journalism and an opinion column are about as similar as the Bible and Playboy magazine.”
और चेतावनी दी थी कि यदि पत्रकार किसी विचारधारा का डोगमैटिक प्रचारक बन जाए, तो उसकी पत्रकारिता खत्म हो जाती है।
वियतनाम युद्ध पर व्यक्तिगत राय देने के बावजूद वे सख्त पेशेवर नैतिकता के पक्षधर रहे।
# एडवर्ड आर. मरो – मैकार्थीवाद को चुनौती देने वाले पत्रकार
उनका मूल मंत्र था: “To be believable, we must be credible; to be credible, we must be truthful.”
उनकी रिपोर्टिंग ने मैकार्थी की दमनकारी राजनीति को चुनौती दी, पर वे हमेशा सच्चाई पर आधारित रहे—किसी ‘राजनीतिक पक्ष’ के औपचारिक एक्टिविस्ट नहीं बने।
उन्होंने कहा था कि मीडिया सिर्फ मनोरंजन का डब्बा न बने—सत्ता से सवाल करने का मंच बने।
# क्रिस्टियाने अमानपुर – “Truthful, not neutral”
बोस्निया नरसंहार रिपोर्टिंग के समय उन पर एक्टिविस्ट होने का आरोप लगा। उन्होंने कहा: “We have to be truthful, not neutral.”
यानी: जब एक पक्ष स्पष्ट रूप से नरसंहार कर रहा हो, तब ‘दोनों पक्ष बराबर’ कहना सत्य के साथ अन्याय है।
परंतु अमानपुर ने यह रेखा कभी पार नहीं की कि पत्रकार राजनीतिक पक्षकार बन जाए।
ग़ाज़ा के संदर्भ में पश्चिमी मीडिया का दोहरा मापदंड स्वयं इस सिद्धांत की सीमाओं का उदाहरण है।
## SPJ कोड ऑफ एथिक्स: पत्रकारिता की रीढ़
अमेरिका के सबसे प्रभावी आचार संहिता में साफ कहा गया है:
* Act Independently – पत्रकार किसी भी राजनीतिक हित, समूह या शक्ति केंद्र से स्वतंत्र रहे।
* Avoid conflicts of interest – राजनीतिक संलिप्तता, पद, फायदे, रिश्वत—सबसे दूरी।
पत्रकारिता तभी चौथा स्तंभ रह सकती है जब वह किसी भी शक्ति के प्रति निष्ठाहीन रहे—सिर्फ जनता के प्रति जवाबदेह।
## जो राजनीति में गए, उन्होंने पत्रकारिता का चोला उतारा
दुनिया भर से उदाहरण:
* बोरिस जॉनसन – पत्रकार थे, राजनीति में आने से पहले पेशा छोड़ा।
* निकोलस क्रिस्टोफ (NYT) – राजनीति में उतरने से पहले इस्तीफा दिया।
* भारत में भी कुछ पत्रकारों ने यही रास्ता अपनाया, हालांकि कईयों ने दोनों भूमिकाएँ मिलाकर विश्वसनीयता को धुंधला कर दिया।
पत्रकारिता और राजनीति का सम्मिलन जनता में भ्रम और भरोसे के संकट को जन्म देता है।
## “पत्रकार मसीहा नहीं—साक्षी हैं”
हमारे समाज में आज तनाव, ध्रुवीकरण और अविश्वास बढ़ गया है। हर चुनाव सामाजिक ताने-बाने में नई दरारें खोल देता है। ऐसे समय में लोग पत्रकारों से अपेक्षा करने लगते हैं कि वे न सिर्फ सच दिखाएँ बल्कि उनकी लड़ाई स्वयं लड़ें।
यह एक खतरनाक प्रवृत्ति है। पत्रकार को जनता से स्पष्ट कहना चाहिए: “मेरा काम आपको वह जानकारी देना है जिसे आप तक पहुँचने से रोकने की कोशिश की जा रही है। समाधान देना नहीं। समाधान के लिए आप वोट दें, आंदोलन करें, राजनीति में आएं—पर मुझे रिपोर्टर रहने दें।”
क्रोनकाइट के शब्दों में: "पत्रकार गवाह हैं—न्यायाधीश या जल्लाद नहीं।"
## यदि पत्रकार मसीहा बनने लगें, तो पत्रकारिता मर जाएगी
लोकतंत्र का चौथा स्तंभ तभी मजबूत रहता है जब वह राजनीतिक अखाड़े में उतरने से इनकार करता है। पत्रकार को मसीहा की भूमिका में धकेलना—और पत्रकार द्वारा उस भूमिका को स्वीकार करना—दोनों ही लोकतंत्र के लिए खतरनाक हैं।
पत्रकारिता की असली ताकत उसकी स्वतंत्रता, निष्ठा और सत्य के प्रति प्रतिबद्धता में है—न कि राजनीतिक बदलाव लाने की महत्वाकांक्षा में।
