क्या इंटरनेट हमारी अगली पीढ़ी का पालन-पोषणकर्ता बन चुका है?
लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला
क्या इंटरनेट हमारी अगली पीढ़ी का पालन-पोषणकर्ता बन चुका है?
हम सबने अपने बुजुर्गों को यह कहते अवश्य सुना है— “हमारे जमाने में हम ऐसे थे, इसलिए आज इतने मजबूत हैं… तुम लोग तो आजकल कुछ समझते ही नहीं।”
पहली बार सुनने पर ये बातें हास्यास्पद लगती हैं, लेकिन अगर आज के समय को ध्यान से देखा जाए तो सच कहें — वो गलत नहीं थे।
यह लेख उसी वर्ग के लिए है जिसमें सोशल मीडिया की 30-सेकेंड की रीलों में पूरी ज़िंदगी समेटने की अधीरता नहीं है, बल्कि अभी भी विचार पढ़ने और समझने की क्षमता बची हुई है।
## 90 के दशक का बच्चा बनाम स्क्रीन-जन्मी पीढ़ी
अगर आप 90’s या उससे पहले की पीढ़ी से हैं तो आप यह जानते हैं कि हम *कठोर परिस्थितियों में पले, सीमित साधनों में सीखें और जीवन जीना सीखें।
* फोन पर कॉल मिनटों में गिने जाते थे, भावनाओं में नहीं।
* इंटरनेट साइबर कैफे के कांच के केबिन में मिलता था, हथेली पर नहीं।
* खिलौने लकड़ी, मिट्टी और कल्पना में थे, YouTube algorithm में नहीं।
शायद इन्हीं सीमाओं ने हमें धैर्य, सामाजिकता, परिवार और अनुशासन सिखाया — वही सब कुछ जो आज की पीढ़ी तेजी से खो रही है।
## क्या अब बच्चों की असली परवरिश इंटरनेट कर रहा है?
बच्चे पहले अपने परिवार, संबंधों और वातावरण से सीखते थे — जैसे कुम्हार अपनी मिट्टी को आकार देता है। पर आज? मोबाइल स्क्रीन ही नया पालक बन चुकी है।
चेहरे पर शिकन वाली स्थिति यह है कि — मां-बाप मोबाइल की स्क्रीन देखते हैं और बच्चे मां-बाप को देखना भूल चुके हैं। बच्चों को चुप कराने का सबसे आसान तरीका बन चुका है— "बेबी वीडियो चालू करो और फोन हाथ में थमा दो।"
धीरे-धीरे वह फोन उनका:
* खेळ
* साथी
* शिक्षक
* और अंततः व्यक्तित्व गढ़ने वाला तत्व बन जाता है।
और जब इस लत की जड़ जम जाती है, तब शुरू होता है—
❌ चिड़चिड़ापन
❌ खाना बिना मोबाइल के अस्वीकार्य
❌ भाषा में आक्रामकता
❌ भावनाओं में असंतुलन
❌ ध्यान अवधि में खतरनाक कमी
यह सब सिर्फ व्यवहार नहीं — ये संकेत हैं कि पालन-पोषण अब मोबाइल कर रहा है, माता-पिता नहीं।
## टीनएज — जहां इंटरनेट चरित्र का निर्माता बन रहा है
14–20 वर्ष की उम्र जिज्ञासा और पहचान की खोज का चरण होती है। हमारी पीढ़ी ने भी सब जानना चाहा था, पर माध्यम सीमित थे — बातें फुसफुसाहट में होती थीं, ज्ञान धीमा था।
लेकिन आज?
इंटरनेट वह सब कुछ परोस देता है — बिना उम्र, बिना संदर्भ, बिना मार्गदर्शन के। सोशल मीडिया एल्गोरिद्म बच्चों के दिमाग से पूछता नहीं — "तुम्हें क्या चाहिए?" वह कहता है — "मैं बताऊंगा तुम क्या चाहो।"
इस प्रक्रिया में इंटरनेट:
* भाषा सिखाता है
* आचरण तय करता है
* नैतिकता बदलता है
* मूल्य गढ़ता है
* और अंततः व्यक्तित्व तैयार करता है
माता-पिता नहीं, फीड स्क्रॉल कर रही उंगलियां बच्चे को आकार दे रही हैं।
## क्या समाज भविष्य की दिशा खुद खो रहा है?
हम आज गर्व से कहते हैं — “Technology is revolution.”
पर क्या कभी यह प्रश्न पूछा?
❓ यह क्रांति हमारे बच्चों को इंसान बना रही है, या सिर्फ उपभोक्ता?
❓ क्या वह रिश्तों से ज्यादा स्क्रीन को महत्व देना सीख रहा है?
❓ क्या हम धीरे-धीरे मानवीय संस्कृति से डिजिटल संस्कृति में प्रविष्ट हो चुके हैं?
## हाथ में तकनीक होनी चाहिए — दिमाग में नहीं बसनी चाहिए
इंटरनेट एक उपकरण है — पालन-पोषणकर्ता नहीं। समय आ गया है कि हम यह तय करें:
➡ क्या हम अपने बच्चों को इंटरनेट के हवाले सौंप देंगे?
➡ या एक पीढ़ी ऐसी खड़ी करेंगे जो तकनीक का उपयोग करे, तकनीक का गुलाम न बने?
## और अब, यह प्रश्न आपके लिए —
📍 "क्या इस इंटरनेट-आधारित परवरिश में तैयार हो रहा समाज, वैसा समाज है जिसे आप भविष्य में देखना चाहते हैं?"
अगर इस प्रश्न का उत्तर आसान नहीं मिल रहा — तो समझिए, यही कारण है कि यह लेख लिखा गया।
