नई दिल्ली: पर्दे के पीछे की राजनीति और मीडिया का तमाशा
पर्दे के पीछे की राजनीति और मीडिया का तमाशा
हम सब रोज़ टीवी खोलते हैं—देखते हैं एंकर गला फाड़कर चीख रहे हैं, पैनलिस्ट एक-दूसरे की जान लेने पर उतारू हैं, और स्क्रीन पर “BREAKING NEWS” ऐसे चमकती है जैसे देश का भविष्य उसी क्षण तय होने वाला हो। पर सच ये है कि यह सब एक नाटक है—सत्ता का रचा हुआ नाटक, और मीडिया उसका सबसे वफादार जोकर।
नकली बहस, असली खेल
जो राजनीति हमें दिखाई जाती है, वह केवल पटकथा है। पक्ष-विपक्ष स्टूडियो में दुश्मन और संसद में अभिनेता लगते हैं, लेकिन सत्ता के बंद कमरों में सब मिलकर सौदा लिखते हैं। जब असल सवाल उठने चाहिए—बेरोज़गारी, शिक्षा, महँगाई, स्वास्थ्य—तो मीडिया बहस करवाता है “कौन बड़ा देशभक्त?” या “किसने मंदिर- मस्जिद का अपमान किया?”
असल मुद्दे दबा दिए जाते हैं, और जनता को धर्म, जाति और राष्ट्रवाद की अफीम पिला दी जाती है।
मीडिया: चौथा स्तंभ या दरबारी ढोल?
जिसे लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता था, वह अब सत्ता का पेड प्रोपगैंडा बन चुका है। एंकर सवाल नहीं पूछते, आदेश पढ़ते हैं। कैमरे भ्रष्टाचार पर नहीं घूमते, बल्कि प्रधानमंत्री की मुस्कान और मुख्यमंत्री की रैली पर फोकस करते हैं। और हाँ—अगर आप बेरोज़गारी पर सवाल पूछेंगे, तो वही मीडिया आपको “देशद्रोही” करार देगा।
जनता को गुमराह करने की कला
जब किसी बड़े घोटाले की गंध आती है, अचानक मीडिया को “पाकिस्तानी खतरा” दिखने लगता है।
जब सरकार की नीतियाँ फेल होती हैं, स्टूडियो में बहस छिड़ जाती है कि “कौन सा नेता कितना राष्ट्रभक्त है।”
किसान आत्महत्या करे, नौजवान नौकरी के लिए सड़कों पर भटके—ये खबरें पन्नों के कोनों में दबा दी जाती हैं। लेकिन किसी फिल्म स्टार की शादी या क्रिकेटर का विवाद—ये “राष्ट्रीय संकट” बनकर हफ्तों हेडलाइन बनते हैं।
असली राजनीति कहाँ है?
असली राजनीति कॉरपोरेट बोर्डरूम्स और सत्ता के गुप्त सौदों में तय होती है। वहाँ जनता सिर्फ एक मोहरा है। मीडिया उस खेल का पर्दादार है, जो हमें दिखाता है वही जो सत्ता चाहती है। जनता के टैक्स के पैसों से पलने वाले चैनल जनता से ही सच छुपाते हैं।
नतीजा
ये लोकतंत्र नहीं, लोकतंत्र का नाटक है। जनता की भूमिका? बस तालियाँ बजाना और टीवी पर लड़ाई देखकर यह मान लेना कि “बहुत कुछ हो रहा है।” लेकिन असली सवाल, असली जंग, असली जवाबदेही? वह पर्दे के पीछे दफ़न कर दी जाती है।