नई दिल्ली: नेता अमर, जनता बेबस — और मीडिया खामोश क्यों?

लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला

नेता अमर, जनता बेबस — और मीडिया खामोश क्यों?

भारत में लोकतंत्र का सबसे बड़ा मज़ाक यही है कि जहाँ एक साधारण कर्मचारी 60 या 62 साल की उम्र में “अवकाश प्राप्त” कर दिया जाता है, वहीं प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री, सांसद, विधायक, पार्षद — सबके लिए कोई सेवानिवृत्ति आयु नहीं। चाहे 70 हो या 80 साल, यदि सत्ता का खेल चलता रहा तो कुर्सी भी चलती रहती है।

और यह असमानता यहीं खत्म नहीं होती।

सरकारी कर्मचारी की पुरानी पेंशन योजना (OPS) खत्म कर दी गई। अब वह नई पेंशन योजना (NPS) के भरोसे है, जिसमें उसका भविष्य बाज़ार के उतार-चढ़ाव पर टिका है। लेकिन नेता? केवल पाँच साल विधायक या सांसद रहने के बाद भी उन्हें आजीवन पेंशन, मुफ़्त आवास, सुरक्षा, चिकित्सा और यात्रा सुविधाएँ मिलती रहती हैं।

 दोहरे मापदंड की राजनीति

 कर्मचारियों के लिए तर्क — “राजकोषीय बोझ ज़्यादा है।”

 नेताओं के लिए सुविधा — “जनसेवा का सम्मान।”

क्या यह लोकतंत्र है या विशेषाधिकारों का साम्राज्य?


यहाँ सबसे गंभीर भूमिका मीडिया की है।

 वही मीडिया जो हर रैली में प्रधानमंत्री की “त्याग और तपस्या” की कहानी सुनाता है।

 वही मीडिया जो कर्मचारियों की OPS की मांग को “लोकलुभावन” बताकर खारिज कर देता है।

 वही मीडिया जो हर साल नेताओं के वेतन-भत्तों पर चर्चा करना भूल जाता है।

जनता से सवाल पूछने वाला मीडिया, नेताओं से सवाल क्यों नहीं पूछता कि—

👉 जब कर्मचारी 60 की उम्र में रिटायर हो सकता है तो नेता क्यों नहीं?

👉 जब OPS बंद हो सकती है तो नेताओं की आजीवन पेंशन क्यों जारी है?

सच यह है कि कॉर्पोरेट विज्ञापनों और सत्ता के संरक्षण पर पलने वाला मीडिया इस मुद्दे को उठाने की हिम्मत ही नहीं करता।

 लोकतंत्र का भ्रम, विशेषाधिकार का खेल

हमारे यहाँ लोकतंत्र का अर्थ नेताओं ने अपने लिए “अविरत विशेषाधिकार” बना लिया है।

जनता के लिए :

 जल्दी रिटायरमेंट,

अनिश्चित पेंशन,

 महंगाई का बोझ।


नेताओं के लिए :

 आजीवन पद,

आजीवन पेंशन,

 आजीवन सुविधाएँ।

यह सवाल सिर्फ कर्मचारियों का नहीं, बल्कि पूरे लोकतंत्र का है। जब जनता को त्याग और बलिदान का पाठ पढ़ाया जाता है, तो नेताओं पर वही नियम क्यों लागू नहीं होते?

👉 और सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब मीडिया इस दोहरे खेल पर चुप रहता है, तो क्या वह लोकतंत्र का चौथा स्तंभ है या सत्ता का प्रचार स्तंभ?