“प्राकृतिक आपदाएँ या मानव निर्मित लापरवाहियाँ?”
लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला
प्राकृतिक आपदाएँ या मानव निर्मित लापरवाहियाँ?”लगातार हो रही मूसलाधार बारिश ने जम्मू से लेकर हिमाचल और पंजाब तक त्राहि-त्राहि मचा दी है। मंगलवार को वैष्णो देवी मंदिर मार्ग पर हुए भूस्खलन में 32 श्रद्धालुओं की मौत ने एक बार फिर यह प्रश्न उठाया है कि क्या हमारी व्यवस्थाएँ केवल आपदा के बाद “मुआयना और मुआवज़ा” तक ही सीमित रह गई हैं?
प्रश्न यह भी है कि जब सुबह से ही नए मार्ग पर यात्रा रोक दी गई थी तो पुराने मार्ग पर दोपहर तक श्रद्धालुओं को जाने की अनुमति क्यों दी गई? क्या यात्रियों की जान की कीमत पर प्रशासनिक लापरवाही और ढुलमुल निर्णय लिये जाते रहेंगे? यदि समय रहते कड़े निर्णय लिए जाते, तो शायद 32 लोग अकाल मृत्यु के शिकार न होते।
दरअसल, यह केवल एक घटना नहीं है। कुछ ही दिन पहले किश्तवाड़ के मचैल माता मंदिर के रास्ते में बादल फटने से 65 लोग मारे गए थे। हिमाचल प्रदेश के मंडी, कुल्लू, कांगड़ा और चंबा में बाढ़ और भूस्खलन ने जनजीवन अस्त-व्यस्त कर रखा है। पंजाब में नदियाँ उफान पर हैं और स्कूलों तक में बच्चे फंसे हैं। आंकड़े बताते हैं कि इस वर्ष जून से अगस्त के बीच केवल हिमाचल में ही 156 लोग अपनी जान गंवा चुके हैं और राज्य को अरबों रुपये का नुकसान हो चुका है।
क्या हर बार हमें यह मान लेना चाहिए कि “प्रकृति का प्रकोप” अटल है? सच तो यह है कि आज अधिकांश आपदाएँ केवल प्राकृतिक नहीं, बल्कि मानव निर्मित भी हैं। पहाड़ों का अंधाधुंध कटान, नदियों के तटबंधों पर अतिक्रमण, अवैज्ञानिक खनन और अव्यवस्थित पर्यटन मिलकर इस विनाश को आमंत्रित कर रहे हैं। सरकारें इन चेतावनियों को नजरअंदाज कर विकास के नाम पर केवल “तत्कालीन लाभ” गिनाती रहती हैं।
सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि इन आपदाओं की मार केवल आम नागरिक झेलता है। मंत्री, अधिकारी और निर्णय लेने वाले सुरक्षित परिसरों और हेलीकॉप्टरों में बाढ़ का मुआयना करते हैं, जबकि आम लोग अपने घर-बार उजड़ने और विस्थापन का दर्द झेलते हैं। राहत शिविरों में शरणार्थियों की तरह रहना पड़ता है, और संजोई हुई गृहस्थी देखते ही देखते मिट्टी में मिल जाती है।
आज यह समझना होगा कि प्रकृति हमें लगातार संकेत दे रही है—“रुको, संभलो, और दोहन बंद करो।” यदि हम अब भी नहीं चेते तो हर मानसून नई त्रासदी लेकर आएगा।
इसलिए ज़रूरत केवल राहत कार्यों की नहीं, बल्कि निवारक उपायों की है—
वैज्ञानिक दृष्टि से तीर्थ यात्राओं और ट्रैकिंग मार्गों का पुनर्मूल्यांकन,
पहाड़ी राज्यों में अंधाधुंध निर्माण पर नियंत्रण,
जलवायु-अनुकूल शहरी नियोजन,
और प्राकृतिक संसाधनों का संतुलित उपयोग।
यह अब समय है कि हम आपदाओं को केवल “भगवान की मर्ज़ी” कहकर टालना बंद करें। इन्हें मानव निर्मित अपराध मानकर जवाबदेही तय करनी होगी। तभी हम आने वाली पीढ़ियों को सुरक्षित और संतुलित भविष्य दे पाएंगे।