कुत्तों के लिए राहत, नागरिकों के लिए उपेक्षा : लोकतंत्र के घाव और मीडिया की सुर्खियाँ

 लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला 

कुत्तों के लिए राहत, नागरिकों के लिए उपेक्षा : लोकतंत्र के घाव और मीडिया की सुर्खियाँ

भारत के अखबारों का पहला पन्ना कल एक बार फिर चौंकाने वाला था। कहीं कुत्तों की रिहाई की राहत छपी थी, कहीं मतदाता सूची से बाहर हुए नागरिकों को वापस शामिल करने के लिए फॉर्म-फॉर्म का झंझट। कहीं प्रधानमंत्री का भाषण, कहीं घुसपैठियों का डर। लेकिन सवाल यह है कि लोकतंत्र की सबसे गंभीर बीमारी – मताधिकार की चोरी – सुर्खियों से गायब क्यों है?

👉 राहत की प्राथमिकता : इंसान बाद में, कुत्ते पहले

 सुप्रीम कोर्ट ने आदेश बदला और आवारा कुत्तों को छोड़ने का रास्ता निकाल दिया।

 नगर निगमों ने तुरंत अनुपालन शुरू कर दिया।

परंतु मानवाधिकारों और नागरिक अधिकारों के उल्लंघन पर न अदालतों की उतनी तत्परता दिखती है, न अखबारों के पहले पन्ने पर उतनी चिंता झलकती है।

क्या यह विडंबना नहीं है कि उमर खालिद साढ़े चार साल से बिना दोष सिद्धि जेल में हैं, सिद्दीक कप्पन और डॉ. कफील खान जैसे लोग सालों तक जमानत के लिए भटकते रहे, लेकिन उनकी तकलीफ सुर्खियाँ नहीं बनीं?

👉 वोट चोरी और आयोग की सफाई

चुनाव आयोग पर आरोप है कि बिहार के एसआईआर (विशेष पुनरीक्षण) के दौरान लाखों नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए।

आम नागरिकों को पावती नहीं दी गई।

 राजनीतिक दलों (जैसे सीपीआई-एमएल) की शिकायतें नकार दी गईं, पावती होने के बावजूद कहा गया – शिकायत मिली ही नहीं।

सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचने पर अदालत ने कहा – पार्टियाँ सहयोग करें, आधार से पहचान कर नाम जोड़े जाएँ।

सवाल है : जिन्हें गलत हटाया गया, उन्हें वापस शामिल करने के लिए नागरिकों को दोबारा फॉर्म क्यों भरना चाहिए? क्या आयोग की गलती का बोझ जनता उठाएगी? और इससे भी बड़ा सवाल – मीडिया यह क्यों नहीं पूछता?

👉 मीडिया का एजेंडा और जनता की चुप्पी

कल के अखबारों की सुर्खियों पर नज़र डालें—

अमर उजाला : कुत्तों पर राहत, लेकिन वोट चोरी पर गहरी चुप्पी।

 नवोदय टाइम्स : मोदी का घुसपैठियों पर बयान बड़े अक्षरों में, लेकिन घुसपैठ रोकने की जिम्मेदारी पर कोई सवाल नहीं।

हिन्दुस्तान टाइम्स और इंडियन एक्सप्रेस : कोर्ट के आदेश तो हैं, पर चुनाव आयोग की नाकामी पर कोई आक्रामक पड़ताल नहीं।

टेलीग्राफ ने इसे “दबे-कुचले उपेक्षितों का दिन” कहा – यह शायद अकेली ईमानदार हेडलाइन थी।

अर्थ यह हुआ कि लोकतंत्र का मूल संकट – मताधिकार की चोरी – खबर तो है, पर सुर्खी नहीं।

👉 असली खतरा : हेडलाइन मैनेजमेंट

आज का दौर हेडलाइन मैनेजमेंट का दौर है।

 खबर कुछ और होती है, पर सुर्खियाँ कुछ और बनाई जाती हैं।

 सत्ता पक्ष की सुविधाजनक भाषा अखबारों के पहले पन्ने पर जगह पाती है।

विपक्ष की शिकायतें, जनता की तकलीफें, और लोकतंत्र की असली बीमारी – अंदर के पन्नों में दबी रह जाती हैं।


लोकतंत्र की नींव नागरिक का मताधिकार है। जब यही अधिकार व्यवस्थित तरीके से छीना जाए और मीडिया उसे सुर्खियों से गायब कर दे, तो यह केवल आयोग की नाकामी नहीं, समाज की संवेदनहीनता भी है।

कुत्तों की राहत पर उछल पड़ने वाला देश अपने ही नागरिकों की लूटती हुई पहचान और अधिकार पर खामोश क्यों है?


यह सवाल सिर्फ सत्ता या आयोग से नहीं, बल्कि मीडिया और हम सब से है।

अगर जवाब आज नहीं मिला, तो कल शायद हमें अखबारों में सिर्फ कुत्तों की रिहाई और घुसपैठ का डर पढ़ने की आदत पड़ जाएगी – और लोकतंत्र चुपचाप हमसे छिन जाएगा।