पेड़ माँ के नाम, मगर काटे मंच के लिए – ये कैसी दोहरी राजनीति?
लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला
पेड़ माँ के नाम, मगर काटे मंच के लिए – ये कैसी दोहरी राजनीति?प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने हाल ही में भावुक अपील की—
👉 “एक पेड़ माँ के नाम लगाइए।”
पूरा देश इस अभियान में शामिल हो रहा है, लोग अपनी माताओं की याद में पौधे लगा रहे हैं।
लेकिन सवाल उठता है :
22 अगस्त को बिहार के मगध विश्वविद्यालय में उनकी सभा की तैयारी के लिए सालों पुराने दर्जनों पेड़ काट दिए गए।
👉 विरोधाभास का जंगल
जनता से कहा जाता है : “पर्यावरण बचाइए, पेड़ लगाइए।”
खुद कहा जाता है : “हर माँ के नाम एक पौधा।”
मगर वास्तविकता ये है कि सत्ता के मंच और पंडाल की सजावट के लिए पेड़ों की बलि चढ़ा दी जाती है।
क्या यह सिर्फ विडंबना है या एक साफ दोहरी मानसिकता?
👉 माँ के नाम पौधा, पिता के नाम बलिदान?
अगर माँ के नाम पेड़ लगाया जा सकता है तो क्या पिता या धरती माँ के नाम एक पेड़ बचाना भी ज़रूरी नहीं था?
क्या यह जनसभाएँ इतनी पवित्र हैं कि उनकी खातिर पर्यावरण की बलि दी जाए?
👉 मीडिया की चुप्पी
किसी अखबार ने यह नहीं पूछा कि—
जो प्रधानमंत्री जनता से पेड़ लगाने की अपील करते हैं, वही अपनी सभा के लिए पेड़ काटने की अनुमति क्यों देते हैं?
आखिर पर्यावरण मंत्रालय, विश्वविद्यालय प्रशासन और स्थानीय प्रशासन इस पर मौन क्यों हैं?
👉 यह सिर्फ एक पेड़ का सवाल नहीं है।
👉 यह सवाल है राजनीति की ईमानदारी का।
👉 क्या नेता जनता से कुछ कहेंगे और खुद उसके उलट करेंगे?
👉 क्या माँ के नाम पौधा सिर्फ फोटो-ऑप है, और धरती माँ के नाम पेड़ काटना रियलिटी शो?
👉 यह मामला केवल बिहार चुनाव का नहीं है, बल्कि देश के लोकतंत्र और नेतृत्व की विश्वसनीयता का है।
जनता को तय करना होगा कि वह “पेड़ बचाओ” पर विश्वास करे या “पेड़ काटो, मंच सजाओ” पर।