सीमाएँ भाषणों से नहीं, शक्ति से सुरक्षित होती हैं

लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला


सीमाएँ भाषणों से नहीं, शक्ति से सुरक्षित होती हैं

"हिमालय में चीन की हर नई सड़क भारत से एक नया प्रश्न पूछ रही है"

राष्ट्रवाद का सबसे बड़ा परीक्षण चुनावी मंचों पर नहीं, बल्कि उन दुर्गम पहाड़ों पर होता है जहाँ सैनिक माइनस तापमान में देश की सीमाओं की रक्षा करते हैं। संसद में दिए गए भाषण, चुनावी सभाओं के नारे और सोशल मीडिया पर गूँजती देशभक्ति तब तक अधूरी हैं, जब तक वे सीमा पर भारत की वास्तविक सामरिक स्थिति में परिवर्तित न हों।

भारत-चीन सीमा पर सामने आई नवीनतम उपग्रह तस्वीरों ने एक बार फिर उस कठोर यथार्थ को सामने ला खड़ा किया है, जिसे राजनीतिक विमर्श अक्सर सरल नारों में बदल देता है। यदि किसी ऐसे क्षेत्र में, जिस पर भारत अपना वैधानिक दावा करता है, चीन लगातार सड़कें, पुल, सैन्य अवसंरचना और रसद नेटवर्क विकसित कर रहा है, तो यह केवल निर्माण गतिविधि नहीं है; यह भू-राजनीतिक संदेश है। अंतरराष्ट्रीय राजनीति में सड़कें केवल कंक्रीट की पट्टियाँ नहीं होतीं, वे संप्रभुता के दावों को व्यावहारिक शक्ति में बदलने का माध्यम होती हैं। यही वह बिंदु है जहाँ भारत को भावनात्मक राष्ट्रवाद और रणनीतिक राष्ट्रहित के बीच अंतर समझना होगा।


अंतरराष्ट्रीय कानून में कानूनी दावा (Legal Claim) और प्रभावी नियंत्रण (Effective Control) दो अलग-अलग अवधारणाएँ हैं। कोई राष्ट्र किसी क्षेत्र पर अपना वैधानिक दावा दशकों तक बनाए रख सकता है, किंतु यदि उस क्षेत्र में दूसरे देश की प्रशासनिक, सैन्य और अवसंरचनात्मक उपस्थिति लगातार सुदृढ़ होती जाए, तो समय के साथ ज़मीनी वास्तविकताएँ बदलने लगती हैं। इतिहास गवाह है कि अनेक सीमा-विवाद अंततः केवल संधियों से नहीं, बल्कि लंबे समय तक स्थापित प्रभावी नियंत्रण से भी प्रभावित हुए हैं।


भारत आज भी पूरे अरुणाचल प्रदेश को अपना अभिन्न और अविभाज्य अंग मानता है। यह भारत की घोषित और वैध नीति है। किंतु प्रश्न यह है कि क्या केवल कूटनीतिक विरोध दर्ज कराना पर्याप्त होगा, यदि दूसरी ओर प्रतिद्वंद्वी अपनी स्थिति को निरंतर अधिक मजबूत करता रहे? यही वह असुविधाजनक प्रश्न है जिससे देश को विमुख नहीं होना चाहिए।


1962 की पराजय केवल सैन्य विफलता नहीं थी; वह राजनीतिक आकलन, सामरिक तैयारी और खुफिया मूल्यांकन की सामूहिक विफलता भी थी। उस युद्ध से भारत ने अनेक महत्वपूर्ण सबक सीखे। उसके बाद सीमावर्ती सड़कें बनीं, पर्वतीय सेना का विस्तार हुआ, वायुसेना और रसद क्षमता में सुधार हुआ तथा पिछले एक दशक में सीमा अवसंरचना के विकास की गति भी बढ़ी है। यह सकारात्मक परिवर्तन है और इसे स्वीकार किया जाना चाहिए, लेकिन क्या यह पर्याप्त है? यही वह प्रश्न है जिसका उत्तर सरकार को केवल आश्वासनों से नहीं, बल्कि तथ्यों से देना होगा।


वर्ष 2020 की गलवान घाटी की हिंसक झड़प ने यह भ्रम समाप्त कर दिया कि भारत-चीन सीमा पर केवल शांति समझौते ही पर्याप्त हैं। दोनों देशों के बीच अनेक सीमा-समझौते होने के बावजूद तनाव उत्पन्न हुआ, सैनिक मारे गए और उसके बाद दोनों पक्षों ने व्यापक सैन्य तैनाती बढ़ाई। इसका अर्थ स्पष्ट है—कूटनीति आवश्यक है, किंतु कूटनीति तभी प्रभावी होती है जब उसके पीछे विश्वसनीय राष्ट्रीय शक्ति खड़ी हो।


चीन पिछले दो दशकों से तिब्बत में जिस गति से सड़कें, सुरंगें, रेलमार्ग, हवाई अड्डे, मिसाइल तैनाती, फाइबर नेटवर्क और तथाकथित सीमा-गाँव विकसित कर रहा है, वह किसी आकस्मिक विकास-योजना का हिस्सा नहीं है। यह एक दीर्घकालिक भू-राजनीतिक रणनीति है, जिसमें अवसंरचना स्वयं राष्ट्रीय सुरक्षा का हथियार बन जाती है।


भारत ने भी अपनी ओर सीमा अवसंरचना को तेज़ किया है, किंतु प्रश्न केवल निर्माण की संख्या का नहीं, बल्कि रणनीतिक गति, समन्वय और दीर्घकालिक दृष्टि का है। राष्ट्रहित का अर्थ युद्धोन्माद नहीं होता।

भारत और चीन दोनों परमाणु शक्ति संपन्न राष्ट्र हैं। किसी भी बड़े युद्ध की कीमत केवल सैनिक नहीं, बल्कि पूरी अर्थव्यवस्था, क्षेत्रीय स्थिरता और वैश्विक आपूर्ति शृंखलाएँ चुकाएँगी। इसलिए युद्ध से बचना परिपक्व नेतृत्व का संकेत है, कमजोरी का नहीं, किन्तु संयम और निष्क्रियता भी समानार्थी शब्द नहीं हैं।

रणनीतिक धैर्य तभी प्रभावी होता है जब उसके साथ समानांतर रूप से राष्ट्रीय शक्ति का निरंतर विस्तार हो—सीमावर्ती अवसंरचना, रक्षा उत्पादन, कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित निगरानी, अंतरिक्ष क्षमता, साइबर सुरक्षा, रसद नेटवर्क, समुद्री शक्ति, आर्थिक लचीलापन और तकनीकी आत्मनिर्भरता। यदि संयम के साथ शक्ति न बढ़े, तो समय प्रतिद्वंद्वी के पक्ष में काम करने लगता है।

लोकतंत्र में एक और प्रश्न भी उतना ही महत्वपूर्ण है—पारदर्शिता।

क्या देश को यह जानने का अधिकार नहीं कि किन क्षेत्रों में भारतीय सैनिक पूर्ववत गश्त कर पा रहे हैं और किन क्षेत्रों में परिस्थितियाँ बदली हैं? क्या बफर ज़ोन की वास्तविक स्थिति, गश्त के अधिकार और सैन्य तैनाती के व्यापक स्वरूप पर संसद तथा राष्ट्र को समय-समय पर विश्वास में नहीं लिया जाना चाहिए? राष्ट्रीय सुरक्षा का अर्थ सम्पूर्ण गोपनीयता नहीं है। गोपनीयता केवल सामरिक सूचनाओं तक सीमित होनी चाहिए; राष्ट्रीय नीति पर लोकतांत्रिक विमर्श उसका विकल्प नहीं हो सकता। एक आत्मविश्वासी लोकतंत्र कठिन प्रश्नों से नहीं डरता। वह अपने नागरिकों पर विश्वास करता है और तथ्यों के आधार पर संवाद करता है।

आज भारत की चुनौती केवल चीन नहीं है। चुनौती यह भी है कि क्या हम अपनी विदेश नीति, रक्षा नीति, औद्योगिक नीति, प्रौद्योगिकी नीति और आर्थिक नीति को एकीकृत राष्ट्रीय सुरक्षा दृष्टिकोण में बदल पाए हैं? इक्कीसवीं सदी में युद्ध केवल सीमाओं पर नहीं लड़े जाते; वे सेमीकंडक्टर, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, दुर्लभ खनिज, समुद्री व्यापार मार्ग, साइबर नेटवर्क, उपग्रह प्रणालियों और वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं में भी लड़े जाते हैं।

इसीलिए सीमा पर बन रही हर चीनी सड़क भारत से केवल एक सामरिक नहीं, बल्कि एक राष्ट्रीय प्रश्न पूछ रही है— "क्या भारत अपनी संप्रभुता की रक्षा केवल ऐतिहासिक दावों से करेगा, या उन दावों को आर्थिक शक्ति, तकनीकी श्रेष्ठता, सैन्य तैयारी और कूटनीतिक प्रभाव में भी रूपांतरित करेगा?"

राष्ट्रवाद का वास्तविक अर्थ विरोधियों के विरुद्ध ऊँचे स्वर में बोलना नहीं, बल्कि राष्ट्र की सामर्थ्य को इतना ऊँचा उठाना है कि विरोधी स्वयं भारत की क्षमता का सम्मान करने को विवश हो जाएँ।

सीमाएँ नारों से सुरक्षित नहीं होतीं। सीमाएँ सुरक्षित होती हैं—दूरदर्शी नेतृत्व से, संस्थागत निरंतरता से, आर्थिक सामर्थ्य से, वैज्ञानिक नवाचार से, सैन्य तैयारी से, और सबसे बढ़कर उस राष्ट्रीय ईमानदारी से, जो जनता को यथार्थ बताने का साहस रखती है।

हिमालय आज भी मौन है। लेकिन उसकी चोटियों पर बनती हर नई सड़क भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा नीति से एक ही प्रश्न पूछ रही है- "क्या हम केवल इतिहास की सीमाओं की रक्षा कर रहे हैं, या भविष्य की भी?"