पेपर लीक, दमन और जन-असंतोष: सत्ता की देरी का खामियाज़ा
लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला
पेपर लीक, दमन और जन-असंतोष: सत्ता की देरी का खामियाज़ा
कभी-कभी एक सरकार की सबसे बड़ी भूल यह नहीं होती कि वह कोई गलत कदम उठा ले; सबसे बड़ी भूल यह होती है कि वह समय रहते सच को पहचानने से इनकार कर दे। पेपर लीक के संकट पर यदि शुरुआत में ही कठोर, पारदर्शी और विश्वसनीय कार्रवाई हुई होती, तो संभव था कि आज देश का यह सार्वजनिक रोष इतना व्यापक, इतना गहरा और इतना बहुस्तरीय न बनता। लेकिन जब प्रश्नपत्रों की विश्वसनीयता टूटती रही, जब युवाओं का विश्वास खंडित होता गया, और जब सत्ता ने असंतोष को सुनने के बजाय उसे टालने की आदत बना ली, तब जंतर-मंतर पर उमड़ा आक्रोश केवल एक परीक्षा-विवाद नहीं रह गया। वह शासन के पूरे चरित्र पर उठता हुआ प्रश्न बन गया।
20 जुलाई को दिल्ली के जंतर-मंतर पर हुए प्रदर्शन के दौरान जिस तरह लाठीचार्ज और आंसू गैस के इस्तेमाल की खबरें आईं, उसने इस आंदोलन की प्रकृति ही बदल दी। अब यह केवल धर्मेन्द्र प्रधान के इस्तीफ़े, पेपर लीक या परीक्षा सुधार का मुद्दा नहीं रहा। यह उस व्यापक असंतोष का रूप ले चुका है जो देश में जमती हुई असहजता, बढ़ती हताशा, शिक्षा के निजीकरण, बेरोज़गारी, संस्थागत अविश्वास और सार्वजनिक जीवन में फैलती कठोरता के विरुद्ध उबल रहा है। अदालत में पहुँची याचिका और दिल्ली हाईकोर्ट का यह निर्देश कि केंद्र और दिल्ली पुलिस चार सप्ताह के भीतर जवाब दाख़िल करें तथा संबंधित सीसीटीवी, वीडियो और अन्य रिकॉर्ड सुरक्षित रखे जाएँ, यह दिखाता है कि अब यह मामला सिर्फ़ सड़क का नहीं, राज्य की जवाबदेही का भी है। अगली सुनवाई 11 सितंबर को होनी है, लेकिन जनता की अदालत में बहस उससे पहले ही शुरू हो चुकी है।
यह बहस इसलिए भी तीखी है क्योंकि जंतर-मंतर की छवियाँ अब केवल एक प्रदर्शन की नहीं रहीं। वे उस व्यापक पीढ़ीगत गुस्से की दृश्य भाषा बन गई हैं जो खुद को बार-बार ठगे जाने के बाद अब व्यंग्य, रचनात्मकता और प्रतिरोध के नए रूप खोज रही है। “हमारे पास जॉब नहीं है, आज भगा दो, कल फिर आएंगे” जैसे पोस्टर, तंज़ भरे नारों की नई शैली, हनुमान चालीसा के धुन पर व्यंग्यात्मक थिरकन, हाथ में तिरंगा लेकर खड़े युवक को उठाकर पटकने के बावजूद उसके द्वारा फिर तिरंगा लहराना—ये सब केवल सोशल मीडिया की सनसनी नहीं हैं। ये उस पीढ़ी की भाषा हैं जो अब डरकर चुप रहने के बजाय हँसते हुए, तंज़ करते हुए और अपनी उपस्थिति दर्ज कराते हुए प्रतिरोध कर रही है। यह वही पीढ़ी है जिसे लंबे समय तक अव्यवस्थित, मोबाइल-आसक्त, गैर-गंभीर कहकर खारिज किया गया। आज वही पीढ़ी राजनीतिक संकीर्णताओं, खोखले राष्ट्रवाद और दमनकारी भाषा को आईना दिखा रही है।
सत्ता के लिए यह दृश्य असुविधाजनक है। वर्षों तक राजनीति ने धर्म, जाति, राष्ट्रवाद और भावनात्मक ध्रुवीकरण के जिन औजारों से जनमत को बाँधने की कोशिश की, आज वही औजार नये प्रतिरोध की हँसी में खोखले साबित हो रहे हैं। यह नयी पीढ़ी न तो पहले जैसी है, न उसी भाषा में बात करती है, न उसी डर से संचालित होती है। वह जानती है कि कब किस नैरेटिव को पलटना है, कब किस प्रतीक को व्यंग्य में बदलना है, और कब किस शक्ति को उसकी जगह दिखानी है। यही कारण है कि भाजपा का आईटी सेल और उसका प्रचारतंत्र असमंजस में दिखाई देता है। कोई कितना भी “कंट्रोल्ड नैरेटिव” चलाए, जब सड़क पर लोग अपने तरीके से बोलना सीख जाते हैं, तो प्रचार की दीवारें दरकने लगती हैं।
लेकिन इस पूरे आंदोलन को केवल रचनात्मक विद्रोह कहकर उसकी राजनीतिक जटिलता से आँख नहीं मूँदी जा सकती। विपक्षी दलों, छात्र संगठनों और अलग-अलग नेताओं की उपस्थिति ने इस आंदोलन को दृश्यता अवश्य दी, परंतु यही दृश्यता कभी-कभी इसके स्वरूप पर प्रश्न भी खड़े करती है। सोनम वांगचुक की पत्नी का राहुल गांधी की प्रधानमंत्री आवास के बाहर धरने पर आलोचनात्मक बयान हो या अन्य राजनीतिक दलों की दूरी—ये सब इस बात का संकेत हैं कि आंदोलन के भीतर भी विचारधारात्मक तनाव मौजूद हैं। फिर भी इससे मूल प्रश्न कम नहीं होता: क्या छात्रों के उठाए गए सवाल इतने कमजोर हैं कि उन्हें राजनीतिक नेतृत्व की वैधता के विवाद में दबा दिया जाए? उत्तर स्पष्ट है—नहीं। पेपर लीक, परीक्षा सुरक्षा, भर्ती की विश्वसनीयता और शिक्षा-तंत्र की पारदर्शिता ऐसे मुद्दे हैं जिन पर सत्ता, विपक्ष, संस्थान और समाज—सभी को एक साथ जवाब देना चाहिए।
गुरुवार को संसद में विपक्षी सांसदों का एकजुट होकर धर्मेन्द्र प्रधान के इस्तीफ़े की मांग करना यह बताता है कि यह प्रश्न अब विधायी बहस में भी प्रवेश कर चुका है। सरकार का बचाव स्वाभाविक है; हर सत्ता अपने संकट को पहले “राजनीतिक विरोध” कहकर छोटा करना चाहती है। परंतु जब शिक्षा का प्रश्न राजनीति बनकर नहीं, जीवन-मरण का प्रश्न बनकर सामने आए, तब “यह राजनीति है” कहना समस्या का उत्तर नहीं होता। पवन खेड़ा की यह बात कि जब सरकार धर्म का राजनीतिकरण कर सकती है, तो शिक्षा सुधार के मुद्दे का राजनीतिकरण क्यों नहीं हो सकता—वह इस तर्क के भीतर छिपी विडंबना को उजागर करती है। सच यह है कि शिक्षा कभी राजनीतिक बहस से बाहर नहीं रही; प्रश्न यह है कि क्या राजनीति उसे सुधारने के लिए हो रही है या केवल संभालने के लिए।
प्रधानमंत्री के उस ट्वीट को भी इसी सन्दर्भ में देखना चाहिए जिसमें उन्होंने पेपर लीक के दोषियों को कठोर दंड देने और फास्ट-ट्रैक अदालतों के गठन की बात कही। यह कदम स्वयं में गलत नहीं है, लेकिन देरी के कारण इसके राजनीतिक आशय पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है। जब संकट के प्रारंभ में ऐसी तत्परता दिखाई नहीं गई, जब छात्र महीनों से सड़क पर थे, जब आंदोलन ने राष्ट्रीय रूप ले लिया, तब आया यह बयान लोगों को संकट-प्रबंधन के बजाय संकट-प्रतिक्रिया जैसा अधिक लगता है। सत्ता की विश्वसनीयता केवल घोषणा से नहीं बनती; वह समय पर की गई कार्रवाई से बनती है। यदि सरकार मई में, शिकायतों के आरंभिक चरण में, ऐसी कठोरता दिखाती, तो आज उसके इरादों पर प्रश्न कम उठते। अब प्रश्न यह है कि क्या यह कदम वास्तविक सुधार की दिशा है या बढ़ते राजनीतिक दबाव का उत्तर?
इसी बीच महाराष्ट्र, बिहार और अन्य राज्यों से भी जो दृश्य सामने आए हैं, वे बताते हैं कि यह असंतोष एक शहर या एक मंच तक सीमित नहीं है। कहीं पुलिस वैन का दरवाज़ा खोलकर किसी ने प्रतिरोध किया, कहीं एक लड़की ने वैन के सामने खड़े होकर उसे रोका, कहीं प्रदर्शनकारी पानी की बौछारों और बैरिकेड्स के सामने नाचते, गाते और हँसते दिखे। इन दृश्यों में केवल चंचलता नहीं, एक गहरी सामाजिक मनोदशा है—डर से बाहर निकलने की मनोदशा। यह समाज जो वर्षों से चुप रहने का अभ्यस्त था, अब अपनी भाषा खुद गढ़ रहा है। यह भाषा कई बार असंयमित हो सकती है, कई बार उग्र, कई बार व्यंग्यात्मक; परंतु इसकी मूल धारा को नकारना संभव नहीं। यह धारा बताती है कि लोग अब केवल सह रहे नहीं, मूल्यांकन कर रहे हैं। और जब मूल्यांकन शुरू होता है, तब सत्ता की भूलें अधिक स्पष्ट दिखने लगती हैं।
लेकिन किसी भी जनांदोलन की कसौटी केवल उसकी ऊर्जा नहीं होती; उसकी अनुशासनशीलता भी होती है। यदि भीतर असामाजिक तत्व घुसते हैं, यदि अराजकता का खतरा बढ़ता है, यदि सार्वजनिक संपत्ति या नागरिक सुरक्षा को क्षति पहुँचती है, तो आंदोलन को स्वयं अपनी नैतिक सीमा तय करनी होगी। यही लोकतांत्रिक परिपक्वता है। राज्य का दमन भी गलत है, और आंदोलन का अनुशासनहीन होना भी। लेकिन इन दोनों के बीच सबसे अधिक मार उसी नागरिक को पड़ती है जो केवल न्याय चाहता है—न अधिक, न कम।
इस पूरे प्रसंग का एक और बड़ा सबक यह है कि अदालतें अब केवल कानूनी नहीं, प्रतीकात्मक केंद्र भी बनती जा रही हैं। हाईकोर्ट का फुटेज सुरक्षित रखने का निर्देश इस बात का संकेत है कि न्यायिक प्रक्रिया केवल घटनाओं का रिकॉर्ड नहीं, सार्वजनिक भरोसे का पुनर्निर्माण भी करती है। अब यह साबित करना होगा कि जो हुआ, वह क्यों हुआ; किसने क्या आदेश दिया; किसने बल प्रयोग किया; और किस सीमा तक किया। यदि हिंसा हुई, तो उसे छिपाया नहीं जा सकता। यदि दावे झूठे हैं, तो उन्हें तथ्य से खारिज करना होगा। लोकतंत्र का सबसे बड़ा संकट तब पैदा होता है जब घटना और व्याख्या के बीच दूरी बढ़ती जाती है, और नागरिक को यह समझ नहीं आता कि सच किसके पक्ष में है।
अंततः, जंतर-मंतर का आंदोलन केवल पेपर लीक के खिलाफ़ नहीं है। वह उस ढाँचे के खिलाफ़ है जो युवाओं के सपनों को बार-बार स्थगित करता है, उनकी मेहनत को संदिग्ध बनाता है, और फिर उनसे संयम की उम्मीद करता है। यह आंदोलन उस सत्ता के खिलाफ़ है जो विरोध को अपनी कमजोरी मानती है और अपने हर उत्तर को शत्रुता में बदल देती है। यह आंदोलन इस बात की घोषणा है कि अब जनता केवल सुनने वाली नहीं रही; वह देख रही है, तुलना कर रही है, हँस रही है, प्रश्न कर रही है और ज़रूरत पड़ने पर सड़क पर उतर रही है।
मोदी सरकार के लिए यह संकट केवल राजनीतिक नहीं, नैतिक भी है। क्योंकि अब प्रश्न यह नहीं है कि विपक्ष कितना आक्रामक है; प्रश्न यह है कि शासन ने अपने युवाओं के विश्वास को कितना बचाया। और यह विश्वसनीयता केवल दंड की घोषणा से नहीं लौटेगी। इसके लिए पारदर्शिता चाहिए, संवेदनशीलता चाहिए, जवाबदेही चाहिए और सबसे अधिक—समय पर सही निर्णय लेने का साहस चाहिए।
"जब पेपर लीक से उपजे आक्रोश को दमन से जवाब मिलता है, तब वह आक्रोश केवल परीक्षा का नहीं रहता; वह पूरे शासन की परीक्षा बन जाता है।"
