2047 का आर्थिक स्वप्न: क्या भारत वास्तव में विश्व की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की दिशा में है, या यह केवल राजनीतिक कल्पना है?

 लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला


2047 का आर्थिक स्वप्न: क्या भारत वास्तव में विश्व की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की दिशा में है, या यह केवल राजनीतिक कल्पना है?

भारतीय राजनीति में बड़े लक्ष्य घोषित करना कोई नई बात नहीं है। प्रत्येक सरकार अपने कार्यकाल में भविष्य का एक आकर्षक सपना प्रस्तुत करती है। किंतु किसी भी लोकतंत्र में घोषणाओं की सफलता का मूल्यांकन उनके शब्दों से नहीं, बल्कि उनके पीछे मौजूद आँकड़ों, आर्थिक प्रवृत्तियों और वास्तविक उपलब्धियों से किया जाता है। इसी कसौटी पर आज "विकसित भारत 2047" और 30–35 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था के लक्ष्य को भी परखना आवश्यक है।


राजनीतिक भाषणों में यह लक्ष्य अत्यंत आकर्षक प्रतीत होता है। लेकिन प्रश्न यह है कि क्या वर्तमान आर्थिक गति वास्तव में उस मंजिल तक पहुँचने के लिए पर्याप्त है? या फिर यह लक्ष्य अभी वास्तविक आर्थिक क्षमता की तुलना में कहीं अधिक महत्वाकांक्षी है?


अर्थशास्त्र का सबसे बड़ा गुण यह है कि वह भावनाओं से प्रभावित नहीं होता। चुनावी भाषण, राष्ट्रवाद, जनभावनाएँ और राजनीतिक इच्छाशक्ति अपनी जगह महत्वपूर्ण हो सकते हैं, लेकिन अंततः अर्थव्यवस्था का आकार गणित, उत्पादकता, निवेश, पूँजी निर्माण, विनिर्माण, निर्यात, मुद्रा विनिमय दर और संस्थागत क्षमता से निर्धारित होता है। इसलिए किसी भी दावे का मूल्यांकन केवल एक प्रश्न से किया जाना चाहिए—क्या उपलब्ध आँकड़े उस दावे का समर्थन करते हैं?


विश्व बैंक और IMF के उपलब्ध आँकड़ों के अनुसार वर्तमान समय में भारत की अर्थव्यवस्था लगभग 4.15 ट्रिलियन डॉलर के आसपास है। चीन लगभग 20.8 ट्रिलियन डॉलर और अमेरिका लगभग 32.4 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था हैं। अर्थात भारत अभी भी चीन की तुलना में लगभग पाँच गुना और अमेरिका की तुलना में लगभग आठ गुना छोटी अर्थव्यवस्था है। यहीं से वास्तविक विश्लेषण प्रारम्भ होता है।


बहुत से राजनीतिक दावे यह मानकर किए जाते हैं कि यदि भारत आज विश्व की सबसे तेज़ी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्था है, तो 2047 तक वह स्वतः विश्व की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन जाएगा। लेकिन यह निष्कर्ष सांख्यिकीय दृष्टि से सही नहीं है।


आर्थिक आकार केवल प्रतिशत वृद्धि से निर्धारित नहीं होता, बल्कि प्रारम्भिक आधार (Base Effect) से भी निर्धारित होता है। यदि किसी देश की अर्थव्यवस्था पहले से बहुत बड़ी है, तो अपेक्षाकृत कम प्रतिशत वृद्धि भी उसे विशाल आर्थिक विस्तार प्रदान करती है। दूसरी ओर अपेक्षाकृत छोटी अर्थव्यवस्था को उसी अंतर को पाटने के लिए कहीं अधिक तेज़ और लगातार वृद्धि करनी पड़ती है।


इसी आधार पर यदि पिछले पाँच वर्षों की डॉलर-आधारित औसत वृद्धि दर को अगले 21 वर्षों तक स्थिर मान लिया जाए, तो परिणाम अत्यंत स्पष्ट दिखाई देते हैं।


यदि भारत लगभग 6 प्रतिशत की औसत डॉलर-आधारित वृद्धि बनाए रखता है, तो 2047 तक उसकी अर्थव्यवस्था लगभग 14 ट्रिलियन डॉलर के आसपास पहुँचेगी।


यदि चीन लगभग 3.2 प्रतिशत की औसत वृद्धि बनाए रखता है, तो उसकी अर्थव्यवस्था लगभग 40 ट्रिलियन डॉलर तक पहुँच सकती है।


यदि अमेरिका लगभग 6.5 प्रतिशत की औसत वृद्धि बनाए रखता है, तो उसकी अर्थव्यवस्था लगभग 120 ट्रिलियन डॉलर तक पहुँच सकती है।


अर्थात वर्तमान गति पर भारत निश्चित रूप से आगे बढ़ेगा, लेकिन अमेरिका और चीन से दूरी समाप्त नहीं होगी; कई मामलों में यह पूर्ण आकार के संदर्भ में और भी बड़ी दिखाई दे सकती है।


यहीं सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न उत्पन्न होता है। यदि सरकार 2047 तक 30 से 35 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था का लक्ष्य घोषित करती है, तो उसके लिए आवश्यक वार्षिक डॉलर-आधारित चक्रवृद्धि वृद्धि दर लगभग 10 प्रतिशत के आसपास होगी। अर्थात वर्तमान औसत प्रदर्शन से लगभग चार प्रतिशत अंक अधिक वृद्धि अगले दो दशकों तक लगातार बनाए रखनी होगी। सामान्य भाषा में इसका अर्थ यह है कि भारत को केवल तेज़ नहीं, बल्कि असाधारण गति से लगातार दौड़ना होगा।


इतिहास बताता है कि किसी भी बड़े देश के लिए दो दशकों तक लगातार दो-अंकीय डॉलर-आधारित वृद्धि बनाए रखना अत्यंत कठिन कार्य है। इसके लिए केवल आर्थिक विस्तार पर्याप्त नहीं होता; मुद्रा का स्थायित्व, नियंत्रित मुद्रास्फीति, उच्च निवेश दर, निर्यात में तीव्र वृद्धि, श्रम उत्पादकता में सुधार, तकनीकी नवाचार, वैश्विक प्रतिस्पर्धा और राजनीतिक-प्रशासनिक स्थिरता भी समान रूप से आवश्यक होती है। यहीं भारत की वर्तमान चुनौतियाँ सामने आती हैं।


भारत का विनिर्माण क्षेत्र अभी भी सकल घरेलू उत्पाद में अपेक्षित योगदान नहीं दे पा रहा है। रोजगार का बड़ा हिस्सा अभी भी असंगठित क्षेत्र में है। श्रम उत्पादकता विकसित देशों की तुलना में काफी कम है। शिक्षा और स्वास्थ्य पर सार्वजनिक व्यय अभी भी कई प्रतिस्पर्धी अर्थव्यवस्थाओं से नीचे है। निर्यात संरचना अपेक्षित गति से उच्च मूल्यवर्धित विनिर्माण की ओर नहीं बढ़ी है। निजी निवेश में निरंतरता और अनुसंधान एवं विकास पर व्यय भी अभी सीमित है। इन परिस्थितियों में केवल GDP का लक्ष्य घोषित कर देना पर्याप्त नहीं होगा।


एक और महत्वपूर्ण तथ्य अक्सर राजनीतिक विमर्श से गायब रहता है। GDP का डॉलर मूल्य केवल घरेलू उत्पादन से निर्धारित नहीं होता। यदि रुपया डॉलर के मुकाबले लगातार कमजोर होता है, तो वास्तविक उत्पादन बढ़ने के बावजूद डॉलर में अर्थव्यवस्था का आकार अपेक्षित गति से नहीं बढ़ता। इसलिए "30–35 ट्रिलियन डॉलर" का लक्ष्य वास्तव में दोहरी चुनौती है—उच्च वास्तविक विकास दर और अपेक्षाकृत स्थिर विनिमय दर।


इसके अतिरिक्त वैश्विक परिदृश्य भी भारत के नियंत्रण में नहीं है। अमेरिका की ब्याज दरें, वैश्विक पूँजी प्रवाह, ऊर्जा की कीमतें, भू-राजनीतिक संघर्ष, व्यापार युद्ध, कृत्रिम बुद्धिमत्ता जैसी तकनीकी क्रांतियाँ तथा जलवायु परिवर्तन आने वाले दो दशकों की आर्थिक दिशा को प्रभावित करेंगे। इसलिए 2047 का कोई भी अनुमान निश्चित भविष्यवाणी नहीं, बल्कि कुछ मान्यताओं पर आधारित एक गणितीय प्रक्षेपण (Projection) मात्र है।


फिर भी यह प्रक्षेपण एक महत्वपूर्ण सत्य उजागर करता है—यदि वर्तमान औसत गति बनी रहती है, तो भारत का आर्थिक आकार अवश्य बढ़ेगा, लेकिन 30–35 ट्रिलियन डॉलर का लक्ष्य स्वतः प्राप्त नहीं होगा। उसके लिए मौजूदा प्रदर्शन से कहीं अधिक ऊँची और दीर्घकालिक वृद्धि दर आवश्यक होगी।


इसलिए राष्ट्रीय बहस का केन्द्र यह नहीं होना चाहिए कि लक्ष्य कितना भव्य सुनाई देता है; बल्कि यह होना चाहिए कि उस लक्ष्य तक पहुँचने की कार्ययोजना कितनी विश्वसनीय है। क्या हमारे निवेश, विनिर्माण, कृषि, शिक्षा, स्वास्थ्य, अनुसंधान, नवाचार, न्यायिक दक्षता, प्रशासनिक सुधार और रोजगार सृजन की गति उस लक्ष्य के अनुरूप है? यदि इन प्रश्नों का उत्तर सकारात्मक नहीं है, तो केवल घोषणाएँ आर्थिक वास्तविकता को नहीं बदल सकतीं।


लोकतंत्र में सपने देखना आवश्यक है, किंतु उससे भी अधिक आवश्यक है उन सपनों का गणित प्रस्तुत करना। क्योंकि अर्थव्यवस्था तालियों से नहीं, उत्पादकता से बढ़ती है; नारों से नहीं, निवेश से बढ़ती है; और घोषणाओं से नहीं, संस्थागत सुधारों से विकसित होती है।


"2047 का भारत निश्चित रूप से आज के भारत से अधिक समृद्ध हो सकता है। लेकिन क्या वह 30–35 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था होगा? इसका उत्तर राजनीतिक मंच पर नहीं, बल्कि विश्व बैंक, IMF, उत्पादकता के आँकड़ों, विनिमय दर, निवेश दर और आने वाले दो दशकों के वास्तविक आर्थिक प्रदर्शन में छिपा है। गणित स्पष्ट है—यदि लक्ष्य असाधारण है, तो वृद्धि भी असाधारण होनी चाहिए। केवल असाधारण दावे पर्याप्त नहीं हैं।"