महायात्रा का पाथेय: शवयात्रा में धान की लाई और सिक्के बिखेरने का आध्यात्मिक एवं दार्शनिक रहस्य

लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला

 


महायात्रा का पाथेय: शवयात्रा में धान की लाई और सिक्के बिखेरने का आध्यात्मिक एवं दार्शनिक रहस्य

सनातन संस्कृति में जीवन का अंत केवल एक भौतिक समाप्ति नहीं, बल्कि आत्मा की एक नई और महान यात्रा का प्रारंभ है। इसीलिए इसे 'अंतिम संस्कार' या 'शवयात्रा' के बजाय 'महायात्रा' कहा गया है। इस महायात्रा के दौरान मार्ग में धान की लाई (लाजा), खील, पुष्प और सिक्के बिखेरने की परंपरा न केवल छत्तीसगढ़ बल्कि संपूर्ण आर्यावर्त के विभिन्न अंचलों में सदियों से प्रचलित रही है। ऊपर से देखने पर यह केवल एक लोक-परंपरा या अंधविश्वास प्रतीत हो सकती है, परंतु जब हम इसके अंतस्तल में उतरते हैं, तो इसके पीछे अत्यंत गूढ़ धार्मिक, आध्यात्मिक और व्यावहारिक प्रमाण मिलते हैं

आइए, इस लोक-रीति के पीछे छिपे सनातन सत्य को शास्त्रों और दर्शन के चश्मे से समझें।


1. धार्मिक एवं शास्त्रीय प्रमाण: 'लाजा होम' और अंतिम आहुति


शास्त्रों में धान के लावे (लाई या खील) को अत्यंत पवित्र और उर्वरता का प्रतीक माना गया है। वैदिक वांग्मय में इसका संबंध 'लाजा होम' से है।


* विवाह से मृत्यु तक का चक्र: हिंदू धर्म में विवाह के समय अग्नि के फेरे लेते समय वधू 'लाजा होम' (धान की लाई की आहुति) करती है, जो नए जीवन की समृद्धि और खुशहाली की प्रार्थना है। ठीक इसी प्रकार, जब जीवन का अंत होता है, तो लोक-परंपरा में इसे जीव की अंतिम विदाई की 'अंतिम आहुति' माना जाता है।

* अन्न सूक्त और ऋण मुक्ति: तैत्तिरीय उपनिषद कहता है— 'अन्नं ब्रह्मेति व्यजानात' (अन्न ही ब्रह्म है)। मनुष्य जीवन भर जिस पृथ्वी के अन्न से पोषित होता है, विदा होते समय वह उसी अन्न (लाई के रूप में) को प्रकृति को सधन्यवाद वापस लौटाता है। यह प्रकृति और भूमि के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करने का एक मूक अनुष्ठान है।


2. दार्शनिक दृष्टिकोण: जीवन की निःसारता और वैराग्य का संदेश


शवयात्रा में सिक्के और लाई बिखेरने का सबसे बड़ा दार्शनिक संदेश मार्ग पर चलने वाले जीवित मनुष्यों के लिए होता है। यह एक जीवंत 'वेदांत दर्शन' है:


* सिकंदर का दर्शन और कबीर की साखी: संत कबीर कहते हैं— 'जब महतारी जरम दिया तब काहू न लाया माल, दो दिन की इह जिंदगानी मुट्ठी बंद के आया था हाथ पसारे चल दिया।' रास्ते में बिखरे सिक्के चिल्ला-चिल्ला कर कहते हैं कि जिस धन, कौड़ी और संपत्ति के लिए मनुष्य जीवन भर छल, कपट और संघर्ष करता रहा, अंत समय में वह कौड़ी भी उसके साथ नहीं जाती। वह अपनी ही अंतिम यात्रा में उस धन को पीछे छोड़ जाता है, जिसे बटोरने के लिए उसने अपनी आत्मा तक को दांव पर लगा दिया था।

* मोह भंग का मार्ग: जब पीछे चल रहे लोग उन सिक्कों को जमीन पर गिरते देखते हैं, तो उनके भीतर क्षणिक ही सही, लेकिन 'श्मशान वैराग्य' जागृत होता है कि संसार नश्वर है और माया यहीं छूट जानी है।


3. लोक-मान्यता और व्यावहारिक कारण: 'वैतरणी' और यम का मार्ग-कर (Toll Tax)


धार्मिक और पौराणिक कथाओं में यह विश्वास है कि मृत्यु के बाद जीवात्मा को यमलोक की यात्रा करनी होती है, जहाँ उसे 'वैतरणी' नदी पार करनी पड़ती है।


* पाथेय (रास्ते का खर्च): प्राचीन काल में किसी भी लंबी यात्रा पर निकलते समय यात्री को रास्ते के खर्च (पाथेय) के लिए धन और अन्न दिया जाता था। शवयात्रा में बिखेरे जाने वाले सिक्के और लाई प्रतीकात्मक रूप से उस मृत आत्मा का 'पाथेय' हैं, ताकि उसकी परलोक की यात्रा क्षुधा-मुक्त (भूख-मुक्त) और बाधारहित हो।

* भूतादि यज्ञ और जीव-दया: व्यावहारिक धरातल पर, सनातन धर्म पंचमहायज्ञों में से एक 'भूत यज्ञ' (अर्थात समस्त जीवों के प्रति दया) की बात करता है। शवयात्रा के पीछे चलने वाले पक्षी, चींटियाँ और अन्य जीव उस बिखरी हुई लाई को खाते हैं। तृप्त जीवों के मुख से निकली मूक आशीष उस दिवंगत आत्मा के परलोक के मार्ग को सुगम बनाती है।


4. चौखट पर सिक्का जड़ने का रहस्य: अंधविश्वास या स्मृतियों का विज्ञान?


आलेख में वर्णित ५० वर्ष पुराने सिक्के का संस्मरण अत्यंत मार्मिक है। शवयात्रा से गिरे सिक्के को उठाकर घर की चौखट पर लगाने के पीछे भी एक गहरा लोक-मनोविज्ञान काम करता है: 'मरणं मंगलं यत्र' — जहाँ मृत्यु भी मंगलमयी हो। सनातन दृष्टि मृत्यु को अशुभ नहीं मानती। जो व्यक्ति अपनी पूर्ण आयु जीकर, पोते-पड़पोतों को देखकर संसार से विदा होता है, उसकी शवयात्रा को 'कल्याणमयी' माना जाता है।


* बुजुर्गों का आशीर्वाद: माना जाता है कि पूर्णायु प्राप्त व्यक्ति की देह से छूकर गिरा सिक्का साक्षात् आशीर्वाद का रूप है। उसे चौखट पर लगाना उस बुजुर्ग की चेतना और स्मृतियों को घर में स्थान देना है।

* स्मृति का जीवंत प्रतीक: जैसा कि आपने स्वयं अनुभव किया, ५० वर्षों के बाद वह सिक्का अंधविश्वास से परे हटकर आपके बचपन, आपके गांव की माटी और उस अज्ञात दिवंगत आत्मा के प्रति एक अनूठा 'मेमोरियल' (स्मृति-चिह्न) बन गया। यही तो हमारी लोक-संस्कृति की सुंदरता है, जहाँ एक घिसा हुआ सिक्का भी इतिहास का कालखंड समेटे रहता है।


## लोक-परंपराएं समाज की जीवित धड़कन हैं

शवयात्रा में धान की लाई और सिक्के बिखेरना कोई अंधा टोटका नहीं, बल्कि कृतज्ञता, वैराग्य, जीव-दया और अंतिम विदाई के सत्कार का एक अनुपम संगम है। यह विदा होते हुए इंसान की तरफ से संसार को दिया गया आखिरी संदेश है— "लो संभालो अपनी माया, मैं तो अपने मूल घर (परमात्मा) को चला।"

आपकी यह चौखट और उस पर जड़ा वह घिसा हुआ सिक्का इस बात का जीवंत प्रमाण है कि हम भले ही आधुनिक टाइल्स के युग में जी रहे हों, लेकिन हमारी नींव आज भी उसी लोक-परंपरा की मिट्टी से जुड़ी है, जो हमें हमारे अतीत से अलग नहीं होने देती।