*धर्म और ज्ञान के सूर्य थे मुफ़्ती-ए-आजम प्रोफेसर मुफ्ती शमसी तेहरानी का सातवां सालाना उर्स खानकाह फतेहगढ़ में कल होगा मुनक़्क़िद*
*धर्म और ज्ञान के सूर्य थे मुफ़्ती-ए-आजम प्रोफेसर मुफ्ती शमसी तेहरानी का सातवां सालाना उर्स खानकाह फतेहगढ़ में कल होगा मुनक़्क़िद*
रेहान ख़ान ब्यूरो चीफ फर्रुखाबाद 9452755077
भारत की धरती ने समय-समय पर ऐसे महान विद्वानों और सूफ़ी संतों को जन्म दिया है जिन्होंने दीन और दुनिया दोनों क्षेत्रों में महत्वपूर्ण सेवाएँ दीं। इन्हीं महान हस्तियों में मुफ़्ती-ए-आज़म राजस्थान हज़रत हाफ़िज़ मौलाना मुफ़्ती प्रोफेसर सैयद ज़ियाउद्दीन शम्सी तहरानी रहमतुल्लाह अलैह का नाम बड़े सम्मान के साथ लिया जाता है। आप एक महान आलिम, सूफ़ी, शिक्षक, लेखक, शायर और आध्यात्मिक मार्गदर्शक थे।
आपका जन्म 8 जून 1939 को राजस्थान के प्रसिद्ध शहर टोंक में एक सम्मानित सैयद परिवार में हुआ। बचपन में ही आपने क़ुरआन शरीफ़ हिफ़्ज़ किया और दीनी शिक्षा के साथ-साथ आधुनिक शिक्षा भी प्राप्त की। आगे चलकर आपने अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (एएमयू) से उच्च शिक्षा प्राप्त की और वहीं लंबे समय तक प्रोफेसर के रूप में अपनी सेवाएँ दीं।
हज़रत शम्सी तहरानी रहमतुल्लाह अलैह को कई भाषाओं का ज्ञान था। उर्दू, अरबी, फ़ारसी और अंग्रेज़ी सहित लगभग 14 भाषाओं पर आपको विशेष अधिकार प्राप्त था। फ़ारसी भाषा में आपकी गहरी विद्वता के कारण भारत सरकार ने आपको प्रतिष्ठित राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित किया।
आपको "मुफ़्ती-ए-आज़म राजस्थान" का सम्मान प्राप्त हुआ। आपने शिक्षा, लेखन, शोध, तसव्वुफ़ और समाज सुधार के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य किए। आपकी प्रसिद्ध पुस्तकों में "ख़्वाजा-ए-ख़्वाजगान", "कलाम-ए-इक़बाल का तहक़ीक़ी मुताला", "बौद्ध धर्म का प्रभाव विश्व के देशों पर", "ज़िक्र-ए-सय्यदैन" तथा "शरह-ए-गुलदस्ता-ए-दानिश" शामिल हैं।
*हज़रत प्रोफेसर मुफ़्ती ज़ियाउद्दीन शम्सी तहरानी की विरासत और सिलसिला-ए-फ़ैज़*
हज़रत प्रोफेसर मुफ़्ती ज़ियाउद्दीन शम्सी तहरानी रहमतुल्लाह अलैह एक ऐसे महान और बहुमुखी व्यक्तित्व थे, जिनकी मिसाल सदियों में कभी-कभार ही देखने को मिलती है। आपने आला हज़रत मुफ़्ती शाह मज़हरुल्लाह देहलवी रहमतुल्लाह अलैह की खानकाह नक्शबंदिया मज़हरिया से आध्यात्मिक फ़ैज़ प्राप्त किया और इल्म व रूहानियत की जो शमा रोशन की, उसे आपके जानशीन हज़रत शाह मोहब्बत शाह फतेहगढ़ ने पूरी लगन और ख़ुलूस के साथ आगे बढ़ाया।
बाद में हज़रत शाह मोहब्बत शाह साहब ने अपने नवासे हज़रत शाह मोहम्मद वसीम उर्फ़ मोहम्मद मियाँ साहब को अपना जानशीन और सज्जादा नशीन नियुक्त किया। आज भरगैन, फतेहगढ़ और देश के विभिन्न इलाक़ों में लोग हज़रत शम्सी तहरानी साहब की दीनी और दुनियावी सेवाओं को सम्मान के साथ याद करते हैं। उनका जीवन धार्मिक और आधुनिक शिक्षा के सुंदर समन्वय का एक आदर्श उदाहरण था।
*सिलसिला-ए-फ़ैज़*
हज़रत प्रो. मुफ़्ती ज़ियाउद्दीन शम्सी तहरानी रहमतुल्लाह अलैह का संबंध सिलसिला -ए- नक्शबंदिया मुजद्दिदिया मज़हरिया, चिश्तिया और कादरिया से था। यह आध्यात्मिक सिलसिला हज़रत इमाम रब्बानी मुजद्दिद अल्फ़-ए-सानी शेख़ अहमद फ़ारूक़ी सरहिन्दी रहमतुल्लाह अलैह से चला जोकि आपके अहले खानदान के कई महान सूफ़ी संतों के माध्यम से आगे बढ़ता हुआ हज़रत बुज़ुर्गों से होता हुआ हज़रत मुफ्ती शाह रुक्नुद्दीन अलवरी रहमतुल्लाह अलैह तक पहुँचा।
इस सिलसिले के प्रमुख बुज़ुर्गों में शामिल हैं—
* हज़रत इमाम रब्बानी मुजद्दिद अल्फ़-ए-सानी शैख़ अहमद फ़ारूक़ी सरहिन्दी कुद्स सिरोहु अलअज़ीज़
* हज़रत ख़्वाजा मोहम्मद मासूम कुद्स सिरोहु अलअज़ीज़
* हज़रत ख़्वाजा मोहम्मद सिबग़तुल्लाह कुद्स सिरोहु अलअज़ीज़
* हज़रत ख़्वाजा शाह मोहम्मद इस्माईल कुद्स सिरोहु अलअज़ीज़
* हज़रत ख़्वाजा शाह ग़ुलाम मोहम्मद मासूम कुद्स सिरोहु अलअज़ीज़
* हज़रत हाजी क़य्यूम जहाँ शाह सफ़ीउल्लाह कुद्स सिरोहु अलअज़ीज़
* हज़रत हाजी शाह अब्दुल बाक़ी कुद्स सिरोहु अलअज़ीज़
* हज़रत हाजी शाह अता-ए-मासूम कुद्स सिरोहु अलअज़ीज़
* हज़रत हाजी शाह ख़्वाजा ज़िया-ए-मासूम कुद्स सिरोहु अलअज़ीज़
* हज़रत शाह मुफ़्ती रुक्नुद्दीन अलवरी रहमतुल्लाह अलैह
हज़रत शाह रुक्नुद्दीन अलवरी रहमतुल्लाह अलैह अपने समय के महान सूफ़ी संत थे। उन्होंने लोगों को अल्लाह की पहचान, आध्यात्मिकता और नेक जीवन का संदेश दिया। उनकी शिक्षा और आध्यात्मिक मार्गदर्शन से अनेक लोगों ने लाभ प्राप्त किया।
किताब जिया ए मासूम लिखा है कि हज के दरमियान हरम शरीफ़ में हज़रत शाह रुक्नुद्दीन अलवरी को हज़रत ख्वाजा जिया ए मासूम कुदुस सिरोहु अलअज़ीज़ ने यह कहते हुए मुझे हरम शरीफ का इशारा हुआ है आध्यात्मिक अनुमति और फ़ैज़ प्रदान कर और जो कुछ उन्हें अपने बुज़ुर्गों से मिला है, वह सब उन्हें सौंप रहे हैं। इसी क्रम में उन्हें नक्शबंदिया, क़ादरिया और चिश्तिया सिलसिलों की इजाज़त के साथ-साथ इमाम रब्बानी से प्राप्त विशेष "निस्बत-ए- ओवैसिया" भी प्रदान की गई।
बाद में यह आध्यात्मिक विरासत हज़रत शाह मुफ़्ती मज़हरुल्लाह देहलवी रहमतुल्लाह अलैह (पूर्व शाही इमाम, दिल्ली) तक पहुँची। उन्होंने दिल्ली की ऐतिहासिक फ़तेहपुरी मस्जिद को इस सिलसिले का केंद्र बनाया, जहाँ से शरियत और तसव्वुफ़ का संदेश पूरे देश में फैलता रहा।
इल्म और रूहानियत का संगम
आला हज़रत मुफ़्ती ए आज़म शाह मुहम्मद मज़हरुल्लाह देहलवी अलैहि रहमा ने इस महान आध्यात्मिक विरासत का उत्तराधिकारी अपने शागिर्द और ख़लीफ़ा हज़रत प्रोफेसर मुफ़्ती ज़ियाउद्दीन शम्सी तहरानी रहमतुल्लाह अलैह को बनाया।
हज़रत शम्सी तहरानी साहब ने आधुनिक शिक्षा और धार्मिक ज्ञान दोनों को साथ लेकर चलने का आदर्श प्रस्तुत किया। एक ओर वे विश्वविद्यालय में प्रोफेसर थे और दूसरी ओर इस्लामी क़ानून के विशेषज्ञ मुफ़्ती भी। उनका पूरा जीवन सुन्नत की पैरवी, इश्क़-ए-रसूल ﷺ और मानव सेवा का प्रतीक था।
हज़रत प्रोफेसर मुफ़्ती ज़ियाउद्दीन शम्सी तहरानी रहमतुल्लाह अलैह के प्रमुख ख़लीफ़ा और जानशीन हज़रत ख्वाजा मोहब्बत शाह अलैहि रहमा थे, जो फतेहगढ़ स्थित दरगाह हज़रत मख़दूम शाह सय्यद शहाबुद्दीन औलिया चिश्ती के सज्जादा नशीन रहे।
उन्होंने अपने मुर्शिद के मिशन को आगे बढ़ाया और खानकाह के माध्यम से लोगों की धार्मिक, आध्यात्मिक और सामाजिक मार्गदर्शन की सेवा जारी रखी।
*हज़रत ख्वाजा मोहब्बत शाह अलैहि रहमा को जानशीनी और ख़िलाफ़त और बना आध्यात्मिक सिलसिलो फतेहगढ़ बना मसकन*
आपके प्रमुख ख़लीफ़ा और जानशीन हज़रत ख़्वाजा मोहम्मद शरीफ़ उर्फ़ मोहब्बत शाह अलैहि रहमा थे। आपने उनकी आध्यात्मिक योग्यता, सेवा और समर्पण को देखकर उन्हें ख़िलाफ़त और इजाज़त प्रदान की तथा "मोहब्बत शाह" का ख़िताब अता फ़रमाया।
हज़रत ख्वाजा मोहब्बत शाह अलैहि रहमा ने फ़तेहगढ़ को अपना केंद्र बनाया और वहाँ से दीन, तसव्वुफ़ और इंसानियत की सेवा का कार्य जारी रखा। उन्होंने अपने जीवनकाल में ही हज़रत पीरज़ादा शाह मोहम्मद वसीम उर्फ़ मोहम्मद मियाँ साबरी मुजद्दिदी मज़हरी को अपना जानशीन और दरगाह हज़रत मखदूम शाह सय्यद शहाबुद्दीन औलिया का सज्जादा नशीन भी नियुक्त किया।
खानकाह फतेहगढ़ के सज्जादा नशीन व जानशीन ए हुज़ूर मोहब्बत शाह पीरजादा शाह मुहम्मद वसीम उर्फ मुहम्मद मियां चिश्ती साबरी मुजद्दीदी अपने बुज़ुर्गों की तालीमात पर चलते हुए दीन-ए-इस्लाम की ख़िदमत, समाज की इस्लाह और नौजवानों की दीन की सही जानकारी देने का काम कर रहे हैं। उनकी सरपरस्ती में ख़ानकाह आज भी मुहब्बत, अमन और रूहानी फ़ैज़ का एक अहम मरकज़ बनी हुई है, जहाँ दूर-दूर से लोग फ़ैज़ हासिल करने आते हैं।
*शायरी और सूफ़ियाना कलाम*
हज़रत शम्सी तहरानी रहमतुल्लाह अलैह एक बेहतरीन शायर भी थे। "शम्सी" आपका तख़ल्लुस था। आपका सूफ़ियाना कलाम आज भी लोगों में लोकप्रिय है और ख़ास तौर पर औलिया-ए-किराम तथा ख़्वाजा ग़रीब नवाज़ से आपकी मुहब्बत उसमें झलकती है।
*विसाल और यादगार सेवाएँ*
18 अगस्त 2019 को यह महान विद्वान, सूफ़ी और शिक्षक इस दुनिया से पर्दा फ़रमा गए। आपका मज़ार मुबारक टोंक (राजस्थान) में स्थित है जहाँ बड़ी संख्या में लोग हाज़िरी देते हैं।
हज़रत प्रो. मुफ़्ती सैयद ज़ियाउद्दीन शम्सी तहरानी रहमतुल्लाह अलैह ने अपनी पूरी ज़िंदगी इल्म, अमल, तसव्वुफ़ और इंसानियत की सेवा में गुज़ारी। आपकी ज़िंदगी इस बात का सुंदर उदाहरण है कि दीन और आधुनिक शिक्षा साथ-साथ चल सकती हैं। आज भी आपकी इल्मी और रूहानी सेवाएँ लोगों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनी हुई हैं।
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फर्रुखाबाद फतेहगढ़