कठिन है डगर संघर्ष की, पर द्वंद्व लड़ना ही होगा।
लखनऊ डेस्क प्रदीप shukla
कठिन है डगर संघर्ष की, पर द्वंद्व लड़ना ही होगा।
नयन को ज्योति न दीखे, न कोई राह का संबल,
स्वयं का दीप बन मुझको, स्वयं ही जलना ही होगा।
विषम हैं परिस्थितियाँ और बाधाओं का पहरा है,
उलझते पाँव काँटों में, घाव भी कुछ गहरा है।
मगर इस काल के मेले में, खोकर मौन रहूँ क्यों?
खोजनी राह अपनी, भटकाव छलना ही होगा।
मुझी में दोष के पर्वत, मुझी में वृत्तियाँ धुंधली,
मगर परिष्कार का साहस, बढ़ाना ही होगा।
बिखर कर रह गई मोती-सी ये अनमोल सी जीवन,
समेट कर धैर्य की डोरी, इसे फिर बुनना ही होगा।
भविष्यत क्या? विकल्प क्या? ये प्रश्न भी मेरे ही हैं,
समाधानों के उपवन को, मुझी को चुनना ही होगा।
परम की चेतना साक्षी, कर्म ही एकमात्र पथ है,
नियति के इस महा-रण में, मुझी को तपना ही होगा।
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नई दिल्ली
