प्रतीक, संतुलन और संप्रभुता: पश्चिम एशिया में भारत की कूटनीतिक कसौटी
लखनऊ डेस्क प्रदीप shukla
प्रतीक, संतुलन और संप्रभुता: पश्चिम एशिया में भारत की कूटनीतिक कसौटी
"विदेश नीति में समय, शब्द और संकेत — तीनों नीति के बराबर शक्तिशाली होते हैं।"
पश्चिम एशिया एक बार फिर अस्थिरता के उस मोड़ पर खड़ा दिखाई देता है जहाँ सैन्य जमावड़े, कूटनीतिक चेतावनियाँ और शक्ति-संतुलन की अनिश्चितताएँ एक साथ उपस्थित हैं। ईरान को लेकर अमेरिकी बयानबाज़ी और क्षेत्रीय तनाव के बीच भारत द्वारा अपने नागरिकों को सतर्क रहने अथवा प्रस्थान की सलाह देना एक स्वाभाविक एहतियाती कदम है। किंतु इसी समय भारत के प्रधानमंत्री की इज़रायल यात्रा और एक प्रस्तावित “हेक्सागोनल गठबंधन” की चर्चा ने विमर्श को केवल सामरिक नहीं, बल्कि गहरे कूटनीतिक और संप्रभुता-संबंधी प्रश्नों के केंद्र में ला खड़ा किया है।
विदेश नीति का यथार्थ अक्सर औपचारिक वक्तव्यों से अधिक प्रतीकों और संकेतों में निहित होता है। कौन-सा दौरा कब होता है, किन शब्दों में गठबंधनों का वर्णन किया जाता है, और किस संदर्भ में साझेदारियाँ घोषित होती हैं — ये सभी तत्व अंतरराष्ट्रीय राजनीति की सूक्ष्म भाषा का हिस्सा हैं।
## गठबंधन की भाषा और राजनीति
किसी भी भू-राजनीतिक ढाँचे को परिभाषित करने में प्रयुक्त शब्दावली स्वयं एक राजनीतिक संदेश बन जाती है। “हेक्सागोनल गठबंधन” जैसी अवधारणाएँ, जो क्षेत्रीय सुरक्षा सहयोग की बात करती हैं, स्वभावतः रणनीतिक संतुलन के दायरे में आती हैं। परंतु जब गठबंधनों की व्याख्या धार्मिक या वैचारिक ध्रुवीकरण की भाषा में होने लगे, तो उनका प्रभाव सुरक्षा से आगे बढ़कर धारणा-निर्माण और कूटनीतिक संवेदनशीलता तक पहुँच जाता है।
इज़रायल एक संप्रभु राष्ट्र है और उसकी रणनीतिक प्राथमिकताएँ उसके राष्ट्रीय हितों द्वारा संचालित होती हैं। किंतु भारत जैसे बहु-संतुलन की नीति अपनाने वाले देश के लिए किसी भी ढाँचे में सहभागिता केवल सामरिक निर्णय नहीं, बल्कि व्यापक वैश्विक संकेत बन जाती है।
भारत की विदेश नीति का ऐतिहासिक बल इसी संतुलन में रहा है — इज़रायल के साथ गहरा रक्षा सहयोग, खाड़ी देशों के साथ ऊर्जा और प्रवासी संबंध, तथा ईरान के साथ सामरिक-आर्थिक जुड़ाव। यह संतुलन केवल संबंधों का समीकरण नहीं, बल्कि रणनीतिक स्वायत्तता (strategic autonomy) का व्यावहारिक रूप रहा है।
## समय की कूटनीति
अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में समय स्वयं एक संदेश होता है।।जब कोई राष्ट्र क्षेत्रीय संकट के बीच किसी विशेष देश की यात्रा करता है, तो उसका अर्थ केवल द्विपक्षीय कार्यक्रमों तक सीमित नहीं रहता। चाहे आधिकारिक एजेंडा तकनीकी सहयोग, नवाचार या संसदीय संबोधन का हो, वैश्विक धारणा अक्सर व्यापक संदर्भों में निर्मित होती है।
भारत के लिए यह चुनौती नई नहीं है। उभरती वैश्विक शक्ति के रूप में उसे निरंतर यह संतुलन साधना पड़ता है कि उसकी सहभागिताएँ किसी क्षेत्रीय ध्रुवीकरण का संकेत न बनें। क्योंकि विदेश नीति में इरादे (intentions) जितने महत्वपूर्ण होते हैं, उतने ही महत्वपूर्ण होते हैं perceptions।
## संप्रभुता और कथ्य का प्रश्न
किसी अन्य राष्ट्र द्वारा यह सार्वजनिक रूप से संकेत देना कि भारत किस गठबंधन का हिस्सा बनेगा, स्वाभाविक रूप से संप्रभुता-संबंधी बहस को जन्म देता है। आधुनिक कूटनीति में साझेदारियाँ पूर्व-समन्वित होती हैं, घोषणाएँ भी अक्सर सामूहिक समझ के तहत की जाती हैं। फिर भी, संप्रभु निर्णय-निर्माण की संवेदनशीलता यह अपेक्षा करती है कि किसी भी सहभागिता का आधिकारिक कथ्य स्वयं संबंधित राष्ट्र द्वारा स्पष्ट किया जाए।
भारत जैसे लोकतांत्रिक ढाँचे में यह और भी महत्वपूर्ण हो जाता है। संसद, स्थायी समितियाँ और सार्वजनिक विमर्श विदेश नीति के औपचारिक अंग हैं। यदि नीति-संबंधी निर्णयों या उनके संकेतों पर संस्थागत प्रश्न उठते हैं, तो उनका उत्तर केवल राजनीतिक स्पष्टीकरण नहीं, बल्कि रणनीतिक स्पष्टता के स्तर पर अपेक्षित होता है।
## प्रतीक बनाम नीति
विदेश यात्राएँ केवल कूटनीतिक प्रोटोकॉल नहीं होतीं; वे राजनीतिक प्रतीक भी होती हैं। स्मारकों का दौरा, संसद को संबोधन, नवाचार मंचों में भागीदारी — ये सभी गतिविधियाँ द्विपक्षीय संबंधों की ऊष्मा का प्रदर्शन करती हैं। किंतु जब क्षेत्रीय परिदृश्य अस्थिर हो, तब प्रतीकात्मक संकेतों की व्याख्या अनिवार्यतः व्यापक भू-राजनीतिक संदर्भों में होने लगती है।
भारत की विदेश नीति की सबसे बड़ी पूंजी उसकी रणनीतिक अस्पष्टता नहीं, बल्कि रणनीतिक संतुलन रही है। यह संतुलन तभी टिकाऊ रहता है जब प्रतीकों और नीतियों के बीच सामंजस्य बना रहे।
## सूचना, आरोप और उत्तरदायित्व
वैश्विक राजनीति में आरोप, संकेत और अटकलें अपरिहार्य हैं। किसी भी अंतरराष्ट्रीय विमर्श में तथ्यों और दावों के बीच स्पष्ट अंतर बनाए रखना आवश्यक है। नीति-विश्लेषण का उद्देश्य प्रश्न उठाना अवश्य है, किंतु निष्कर्षों की विश्वसनीयता प्रमाण और संस्थागत सत्यापन पर आधारित होनी चाहिए।
## संतुलन की नई परीक्षा
भारत आज एक ऐसे वैश्विक मोड़ पर है जहाँ उसकी हर कूटनीतिक चाल क्षेत्रीय सीमाओं से परे प्रभाव उत्पन्न करती है। पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच भारत को यह सुनिश्चित करना होगा कि:
• उसकी रणनीतिक साझेदारियाँ संतुलन को सुदृढ़ करें, ध्रुवीकरण को नहीं
• उसकी संप्रभु निर्णय-प्रक्रिया का कथ्य स्पष्ट और आत्मनिर्भर हो
• और उसकी विदेश नीति प्रतीकों की चमक से अधिक दीर्घकालिक स्थिरता पर आधारित रहे
क्योंकि अंततः "विदेश नीति में शक्ति केवल सैन्य या आर्थिक नहीं होती — वह विश्वसनीयता, संतुलन और समय की सूक्ष्म समझ में भी निहित होती है।"
