स्ट्रोक का बदलता चेहरा — युवाओं के लिए बढ़ती चेतावनी
लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला
स्ट्रोक का बदलता चेहरा — युवाओं के लिए बढ़ती चेतावनी
भारत में स्ट्रोक को लंबे समय तक एक ऐसी बीमारी माना गया जो मुख्यतः वृद्धावस्था से जुड़ी है। परंतु नेशनल स्ट्रोक रजिस्ट्री के ताज़ा विश्लेषण ने इस धारणा को निर्णायक रूप से चुनौती दी है। हर सात में से एक स्ट्रोक मरीज की उम्र 45 वर्ष से कम होना केवल एक सांख्यिकीय तथ्य नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य नीति, जीवनशैली और चिकित्सा व्यवस्था—तीनों के लिए गंभीर संकेत है। इससे भी अधिक चिंताजनक यह कि लक्षण शुरू होने के तीन महीने के भीतर आधे से अधिक मरीज या तो जीवन खो देते हैं या स्थायी दिव्यांगता से जूझते हैं।
यह अध्ययन, जो 2020 से 2022 के बीच 30 अस्पतालों में दर्ज लगभग 35 हजार मामलों पर आधारित है, हमें स्ट्रोक की समस्या को केवल चिकित्सा दृष्टि से नहीं, बल्कि सामाजिक और संरचनात्मक दृष्टि से भी देखने को बाध्य करता है। औसत आयु 59.4 वर्ष दर्ज होना बताता है कि बीमारी अभी भी वृद्धों में अधिक है, किंतु युवाओं में बढ़ती हिस्सेदारी भविष्य की एक नई स्वास्थ्य चुनौती की ओर संकेत करती है।
सबसे पहली और सबसे स्पष्ट समस्या है—इलाज में देरी। स्ट्रोक जैसी स्थिति में समय ही जीवन और कार्यक्षमता का निर्धारक बन जाता है। ‘गोल्डन पीरियड’ यानी शुरुआती 4.5 घंटे के भीतर अस्पताल पहुँचना उपचार की सफलता की कुंजी माना जाता है, फिर भी केवल 20 प्रतिशत मरीज ही इस महत्वपूर्ण समय-सीमा में चिकित्सा सुविधा तक पहुँच सके। लगभग 38 प्रतिशत मरीजों का 24 घंटे बाद पहुँचना बताता है कि समस्या केवल व्यक्तिगत लापरवाही की नहीं, बल्कि जागरूकता, परिवहन, प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं और आपातकालीन प्रतिक्रिया तंत्र की भी है।
यहाँ ग्रामीण भारत का संदर्भ विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। 72 प्रतिशत मरीजों का ग्रामीण क्षेत्रों से आना स्वास्थ्य सेवाओं की पहुँच में असमानता को उजागर करता है। स्ट्रोक के लक्षणों की पहचान, त्वरित चिकित्सा परामर्श और विशेषज्ञ उपचार तक पहुँच—ये सभी सुविधाएँ शहरी क्षेत्रों की तुलना में ग्रामीण इलाकों में सीमित हैं। परिणामस्वरूप, मरीज या तो देर से अस्पताल पहुँचते हैं या ऐसी स्थिति में पहुँचते हैं जहाँ उपचार की संभावनाएँ पहले ही कम हो चुकी होती हैं।
जोखिम कारकों की तस्वीर भी उतनी ही स्पष्ट और शिक्षाप्रद है। 74.5 प्रतिशत मरीजों में उच्च रक्तचाप का पाया जाना यह रेखांकित करता है कि स्ट्रोक केवल एक आकस्मिक घटना नहीं, बल्कि अक्सर लंबे समय से अनियंत्रित स्वास्थ्य स्थितियों का परिणाम होता है। डायबिटीज, तंबाकू सेवन और शराब—ये सभी कारक जीवनशैली से गहराई से जुड़े हैं। समस्या यह है कि इन जोखिमों को हम अक्सर तब तक गंभीरता से नहीं लेते जब तक कोई बड़ी घटना न हो जाए।
युवाओं में बढ़ते स्ट्रोक मामलों का एक पहलू मनोवैज्ञानिक और सामाजिक भी है। आधुनिक जीवनशैली—तनाव, अनियमित दिनचर्या, जंक फूड, शारीरिक निष्क्रियता—ने ऐसी स्वास्थ्य समस्याओं को जन्म दिया है जिन्हें पहले मध्य या वृद्धावस्था से जोड़ा जाता था। युवा वर्ग स्वयं को ‘स्वस्थ’ मानकर नियमित जांच और रोकथाम की आदतों से दूर रहता है, जबकि उच्च रक्तचाप और डायबिटीज जैसी स्थितियाँ अक्सर बिना स्पष्ट लक्षणों के विकसित होती हैं। इस परिदृश्य में समाधान बहुस्तरीय होना चाहिए।
* पहला, जनजागरूकता। स्ट्रोक के शुरुआती लक्षण—चेहरे का टेढ़ा होना, हाथ या पैर में अचानक कमजोरी, बोलने में कठिनाई—इनकी पहचान को उतना ही सामान्य ज्ञान बनाना होगा जितना हृदयाघात के लक्षणों को।
* दूसरा, नियमित जांच और रोकथाम। उच्च रक्तचाप और डायबिटीज की स्क्रीनिंग को प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं का अनिवार्य हिस्सा बनाना होगा, विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों में।
* तीसरा, आपातकालीन स्वास्थ्य ढाँचा। एम्बुलेंस नेटवर्क, टेलीमेडिसिन और स्ट्रोक-रेडी अस्पतालों की संख्या व क्षमता में वृद्धि आवश्यक है।
* चौथा, जीवनशैली सुधार। यह केवल व्यक्तिगत अनुशासन का प्रश्न नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य अभियानों, स्कूल शिक्षा और कार्यस्थल नीतियों से भी जुड़ा विषय है।
स्ट्रोक के आँकड़े हमें भयभीत करने के लिए नहीं, जागृत करने के लिए हैं। यदि समय पर पहचान, त्वरित उपचार और जोखिम कारकों का नियंत्रण सुनिश्चित हो, तो स्ट्रोक के परिणामों को उल्लेखनीय रूप से बदला जा सकता है। चुनौती बड़ी है, परंतु समाधान असंभव नहीं। आवश्यक है कि हम स्ट्रोक को केवल एक चिकित्सकीय घटना नहीं, बल्कि एक राष्ट्रीय स्वास्थ्य प्राथमिकता के रूप में देखें—जहाँ जागरूक नागरिक, उत्तरदायी नीति और सक्षम स्वास्थ्य व्यवस्था साथ मिलकर काम करें।
