सपनों का बजट, संकट का देश

 लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला 


सपनों का बजट, संकट का देश

मोदी सरकार ने एक बार फिर ऐसा केंद्रीय बजट पेश किया है, जिसमें आम जनता के लिए लगभग कुछ भी नहीं है, लेकिन देश के धनपतियों और बड़े कॉरपोरेट समूहों के लिए मुनाफ़े के नए–नए दरवाज़े खोल दिए गए हैं। यह बजट ऐसे समय में आया है जब भारत अमेरिकी टैरिफ़ की मार झेल रहा है, वैश्विक भू–राजनीति अस्थिर है, निवेशक पूँजी समेट रहे हैं और घरेलू बचत ऐतिहासिक रूप से गिर चुकी है। ऐसे नाज़ुक क्षण में सरकार के पास अवसर था कि वह सीधे जनता के जीवन से जुड़े संकटों को संबोधित करती—महँगाई, बेरोज़गारी, कृषि संकट, गिरती आय और सामाजिक असमानता। लेकिन मोदी सरकार ने एक बार फिर वर्तमान की पीड़ा से आँखें मूँदकर भविष्य के धुँधले सपने बेचने का रास्ता चुना।

यह ठीक वैसा ही है जैसा नरेन्द्र मोदी का राजनीतिक स्वभाव रहा है—आज की बात करने के बजाय कभी हजार साल पहले के गौरव में चले जाना, तो कभी आने वाले सौ वर्षों का सपना दिखा देना। बजट भी उसी मानसिकता का विस्तार है: वर्तमान जनता के लिए मन, भविष्य के कॉरपोरेट भारत के लिए घोषणाएँ।

## कॉरपोरेट कल्पनाएँ बनाम जन–यथार्

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के बजट भाषण पर अगर नज़र डालें तो 10 हज़ार करोड़ की बायोफ़ार्मा शक्ति योजना, इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन 2.0, 40 हज़ार करोड़ की इलेक्ट्रॉनिक्स कंपोनेंट्स स्कीम, मैन्युफैक्चरिंग इंसेंटिव और हाई–टेक सेक्टर की महत्वाकांक्षाएँ पूरे भाषण पर हावी रहीं। यह सब सुनने में भव्य लगता है, लेकिन सवाल यह है कि इस देश का मौजूदा भारत कहाँ है?

* ग्रामीण भारत का मजदूर, जो मनरेगा की मजदूरी से पेट भरता है—बजट में उसके लिए क्या है?

* बेरोज़गार युवा, जिसकी डिग्री बेकार हो चुकी है—उसके लिए कौन–सा ठोस रोज़गार कार्यक्रम है?

* छोटे और मध्यम कारोबारी, जो जीएसटी, महँगाई और गिरती माँग से जूझ रहे हैं—उनके लिए कौन–सी राहत है?

* गृहणियाँ, जिनकी रसोई महँगाई से चरमराई हुई है—उनके लिए कौन–सी सब्सिडी या सुरक्षा है?

बजट इन सवालों पर लगभग पूरी तरह ख़ामोश है।

## ग्रामीण भारत से सरकार का मोहभंग

मोदी सरकार मनरेगा को धीरे–धीरे खत्म कर उसकी जगह वीबी जी रामजी कानून लाने की बात करती है और उसके प्रचार–प्रसार पर विज्ञापनों में करोड़ों खर्च करती है। लेकिन बजट भाषण में यह स्पष्ट हो जाता है कि ग्रामीण भारत सरकार की प्राथमिकता सूची से बाहर हो चुका है।

मनरेगा के लिए 2025–26 का संशोधित अनुमान 88 हज़ार करोड़ रुपये था। 2026–27 के बजट अनुमान में इसे घटाकर सिर्फ़ 30 हज़ार करोड़ कर दिया गया है—यानी लगभग 66 प्रतिशत की सीधी कटौती। यह केवल बजटीय निर्णय नहीं है, यह राजनीतिक संदेश है कि गाँवों के गरीबों की मज़दूरी सरकार को बोझ लगने लगी है।

सरकार दावा करती है कि वीबी जी रामजी कानून के तहत केंद्र 60 प्रतिशत खर्च उठाएगा, लेकिन बजट में जो कटौती की गई है वह इस दावे को ही खोखला साबित करती है। सवाल उठना लाज़िमी है— "क्या यह योजना वास्तव में ग्रामीण रोज़गार के लिए है, या फिर ग़रीबों की मजदूरी से उद्योगपतियों के लिए संसाधन जुटाने की चाल?"

## कृषि : कॉरपोरेट फ़सलें, किसान उपेक्षित

बजट भाषण में खेती–बाड़ी के नाम पर विविधीकरण और नारियल, कोको, चंदन, मेवे जैसी “उच्च मूल्य वाली फसलों” की बातें की गईं। इससे कुछ संपन्न व्यावसायिक किसानों को लाभ हो सकता है, लेकिन देश की खाद्य सुरक्षा की रीढ़—अनाज उत्पादक किसान—के लिए बजट में कुछ नहीं है।

* न न्यूनतम समर्थन मूल्य पर कोई ठोस आश्वासन,

* न बढ़ती कृषि लागत पर राहत,

* न फसल कीमतों की अस्थिरता पर कोई योजना।

यह स्पष्ट संकेत है कि मोदी सरकार की कृषि नीति अब खाद्य सुरक्षा नहीं, कॉरपोरेट कृषि के इर्द–गिर्द घूम रही है।

## असमानता पर चुप्पी, हाशिए के समाज पर उपेक्षा

इस बजट में देश में बढ़ती आर्थिक असमानता पर एक शब्द भी चिंता व्यक्त नहीं की गई। एससी, एसटी, ओबीसी, अल्पसंख्यक, कमजोर आर्थिक वर्ग—सबके लिए बजट कटौती है, लेकिन उद्योगपतियों के लिए इंसेंटिव की भरमार। महिला सशक्तिकरण की बात करने वाली सरकार के बजट में -

* न महिलाओं के लिए रोज़गार बढ़ाने की कोई ठोस योजना है,

 महिला श्रम भागीदारी बढ़ाने की कोई रणनीति।

प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना में हुए घोटालों पर सरकार चुप है, मेक इन इंडिया अब केवल नारा बनकर रह गया है, और पिछले जटों के वादे एक–एक कर भुला दिए गए हैं।

## चुनावी बजट, राज्यों को साधने की राजनीति

मोदी सरकार का बजट हमेशा की तरह चुनावी भूगोल को ध्यान में रखकर गढ़ा गया है। पिछले साल बिहार केंद्र में था, इस बार तमिलनाडु, केरल, आंध्र प्रदेश और ओडिशा फोकस में हैं। वित्त मंत्री की साड़ी से लेकर योजनाओं के भूगोल तक, सब कुछ राजनीतिक संकेत देता है।

रेयर अर्थ कॉरिडोर का प्रस्ताव इसका बड़ा उदाहरण है। इसे आत्मनिर्भर भारत और चीन पर निर्भरता कम करने का कदम बताया जा रहा है। लेकिन इसके साथ जुड़े पर्यावरणीय और सामाजिक ख़तरे सरकार के भाषण से ग़ायब हैं।

बीच सैंड मिनरल्स खनन से समुद्री कटाव, समुद्री जीवन का विनाश और रेडियोएक्टिव थोरियम–यूरेनियम का जोखिम है। केरल और तमिलनाडु में पहले ही इसका विरोध हो चुका है।

देश में खनन माफिया के इतिहास को देखते हुए सवाल है—

क्या यह योजना स्थानीय समुदायों के लिए रोज़गार लाएगी, या फिर कॉरपोरेट मुनाफ़े के लिए विस्थापन का नया अध्याय लिखेगी?

## ग़रीब के नाम पर राजनीति, अमीर के नाम पर नीति

नरेन्द्र मोदी “ग़रीब–ग़रीब” की माला जपते हैं, लेकिन हर बजट में नीति उद्योगपतियों के पक्ष में झुकती जाती है। अगर सरकार वास्तव में गरीबों के साथ होती, तो देश में 5 किलो मुफ़्त राशन की स्थायी मजबूरी नहीं बनती। यह बजट एक बार फिर साबित करता है कि मोदी सरकार का आर्थिक मॉडल -

* ऊपर के लिए इंसेंटिव,

* नीचे के लिए कटौती,

* और बीच के वर्ग के लिए सपनों का प्रचार

  पर टिका हुआ है।

यह विकास का नहीं, असमानता के स्थायीकरण का बजट है।

इतिहास इसे एक ऐसे बजट के रूप में याद रखेगा, जिसने संकट के समय जनता को नहीं, बल्कि कॉरपोरेट तिजोरियों को प्राथमिकता दी।