जसवंतनगर/इटावा: निलोई–परसौआ सड़क, गड्ढों व जलभराव से राहगीर बेहाल।
चीफ एडिटर: एम.एस वर्मा
मनोज कुमार
निलोई–परसौआ सड़क, गड्ढों व जलभराव से राहगीर बेहाल।
जसवंतनगर/इटावा। प्रदेश सरकार जहां हर गांव तक बेहतर सड़कें पहुंचाने के दावे कर रही है, वहीं तहसील क्षेत्र के ग्राम निलोई से परसौआ को जोड़ने वाली सड़क इन दावों की हकीकत उजागर कर रही है। बीते करीब दो वर्षों से यह सड़क जगह-जगह गड्ढों और जलभराव से जूझ रही है, जिससे आए दिन वाहन चालकों और पैदल राहगीरों को जान जोखिम में डालकर सफर करना पड़ रहा है।
स्थानीय ग्रामीणों प्रदीप कुशवाहा, दयानंद, विश्वनाथ, संजय, गौरव अंशुल आदि का कहना है कि सड़क पर हर समय पानी भरा रहने के कारण गड्ढे नजर नहीं आते। इसी वजह से बाइक सवार, साइकिल सवार और बुजुर्ग कई बार गिरकर घायल हो चुके हैं। हालात की जानकारी होने के बावजूद ग्राम पंचायत और लोक निर्माण विभाग की ओर से अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई है।
इस मार्ग से कई गांवों के लोग प्रतिदिन आवागमन करते हैं। स्थिति की गंभीरता इस बात से भी समझी जा सकती है कि इसी जर्जर सड़क से 108 एंबुलेंस पीजीआई सैफई जाती है, जबकि स्कूली बच्चे भी रोज इसी रास्ते से आने-जाने को मजबूर हैं। ग्रामीणों का सवाल है कि यदि किसी दिन एंबुलेंस गड्ढे में फंस गई या कोई बड़ा हादसा हो गया, तो इसकी जिम्मेदारी कौन लेगा?
ग्रामीणों ने बताया कि सड़क की बदहाल स्थिति को लेकर कई बार प्रशासनिक अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों से शिकायत की गई, लेकिन हर बार सिर्फ आश्वासन ही मिले। बरसात के दिनों में हालात और भी भयावह हो जाते हैं, जब सड़क तालाब में तब्दील हो जाती है और गांवों का पानी सड़क पर बहने लगता है।
लोगों में इस बात को लेकर गहरा आक्रोश है कि एक ओर सरकार करोड़ों रुपये खर्च कर सड़क निर्माण के दावे कर रही है, वहीं दूसरी ओर बनी हुई सड़कें ही ग्रामीणों के लिए खतरे का सबब बनती जा रही हैं। ग्रामीणों का कहना है कि शायद किसी बड़ी दुर्घटना के बाद ही संबंधित अधिकारी जागेंगे। अब बड़ा सवाल यह है कि प्रशासन किसी बड़ी दुर्घटना का इंतजार कर रहा है, या फिर आम जनता की जान की कीमत वास्तव में इतनी सस्ती हो चुकी है?
ग्रामीणों ने मांग की है कि निलोई–परसौआ सड़क की तत्काल मरम्मत, गड्ढों को भरने और स्थायी जल निकासी व्यवस्था सुनिश्चित की जाए, ताकि रोजाना हो रहे हादसों पर रोक लग सके। चेतावनी दी गई है कि यदि शीघ्र समाधान नहीं हुआ, तो गांववासी आंदोलन करने को मजबूर होंगे।
