अख़बारों की प्राथमिकताएं: जनहित या एजेंडा?

 लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला 


अख़बारों की प्राथमिकताएं: जनहित या एजेंडा?

आज के अखबारों की सुर्खियाँ सरकारी आदेश या मौसम की जानकारी तक सीमित हो गई हैं, जनहित की खबरें नजरअंदाज हो रही हैं। सरकारी एजेंडा की आड़ में प्राथमिकताएं बिखरी दिखती हैं। नौ प्रमुख अखबारों की समीक्षा में आठ की लीड मौसम या राहत कार्यक्रम से जुड़ी मिली, जबकि केवल एक-एक मामलों में बीमारी या उद्योग से जुड़े मामले रहे। इन सभी में मुख्य खबर वही थी जो सभी में नदारद थी – यानी जनता की सच्ची कहानी। अलग-अलग अखबारों में कुछ एक-दो मामूली भिन्नता हैं, लेकिन दिन भर की बड़ी खबरें कहीं गायब रह गई हैं।


# इंदौर की त्रासदी: खबर क्यों गौण?


एक संवेदनशील घटना इस विषय की पड़ताल करती है: इंदौर में दूषित पानी से मौतों की संख्या अब 10 हो चुकी है और एक अधिकारी को बर्खास्त किया गया है। यह देश के ‘साफ़ शहर’ में हुई डरावनी त्रासदी है, जिसे पहली आँख में खबर होना चाहिए था। लेकिन बड़ी ख़बर यह है कि केंद्रीय मंत्री कैलाश विजयवर्गीय ने इस मुद्दे पर सवाल पूछने वाले पत्रकारों को तुच्छ कह दिया। एनडीटीवी संवाददाता अनुराग द्वारी के सोशल मीडिया पर वायरल एक 54 सेकंड के वीडियो में मंत्री ‘फोकट के प्रश्न’ व ‘घंटा’ जैसे अपमानजनक शब्द प्रयोग करते दिखे। इतने गंभीर हादसे पर मंत्री का रवैया कहता है कि वे यह समस्या ही नहीं मानना चाहते। फिर भी अधिकांश अखबारों ने इसे पहले पन्ने की हेडलाइन तक नहीं बनाया। पत्रकारिता का पुराना सिद्धांत है: “खबर वही होती है जो छिपाई जाती है।” अगर अधिकारियों ने इस घटना के तार सार्वजनिक नहीं किए, तो स्वाभाविक है कि कहीं से कोई बड़ा दबाव या समझौता हुआ है। आम पाठक को इस घटना के जवाब चाहिए थे, लेकिन न तो मंत्री की संवेदनहीनता और न ही मौतों की गंभीरता अखबारों की सुर्ख़ियों में झलक सकी। बजाय इसके मौसम की कहानी या दूसरे विषयों को पहले पन्ने की प्राथमिकता दे दी गई।


# मौसम से मोदी मंत्र तक: सुर्खियों का एजेंडा


जब जनहित की कोई बड़ी कहानी नहीं मिलती, तो कई अखबार तथाकथित “बड़ी ख़बर” को मौसम या सरकार के नारों में तलाशने लगते हैं। उदाहरण के लिए, अमर उजाला ने लीड पर ‘भीषण सर्दी से नए साल का आगाज…’ जैसी रिपोर्ट दी। नवोदय टाइम्स ने भी मौसम की ख़बर को सबसे ऊपर रखा, और सेकेंड लीड में ‘नए साल का मोदी मंत्र: सुधार, प्रदर्शन और परिवर्तन’ जैसा शीर्षक लगाया। जबकि असल मुद्दा तो यह था कि इंदौर में लोगों की जान जा रही है, न कि सरकारी नारे। इन प्रयासों से आम पाठकों को शायद फर्क न पड़े, लेकिन स्पष्ट है कि प्राथमिकता जनता की आवाज़ उठाने की बनी नहीं रह गई। कुछ अखबार स्पष्ट रूप से सरकार का पक्ष रखने लगे हैं। नवोदय टाइम्स का सेकेंड लीड मोदी मंत्र को उजागर करता है, जबकि असलियत यह है कि सिस्टम की खामियों पर सवाल उठाने चाहिए थे। इसी तरह एक अन्य अखबार ने खबर बनाई ‘घर से 5 करोड़ नकद और 8 करोड़ के आभूषण मिले’ – लेकिन घर किसका था, नाम नहीं बताया। बिना नाम बताने से ही लगता है कि सच कुछ और ही है, सच्ची खबर वही जिसे छिपाया जा रहा है। इसी माहौल में एक और देशभक्ति अजीब सी दिशा ले रही है: जेलों में बंद पत्रकार या कार्यकर्ताओं की सुनवाई में भेदभाव। अलार्म बजाने वाले Arnab Goswami को हफ़्ते भर में जमानत मिल जाती है, जबकि सिद्दीकी कप्पन जैसे को दो साल में नहीं मिली। सुप्रीम कोर्ट ने अब ‘उपेक्षित या पिछड़े वर्ग’ के मामले पहले सुनने का निर्णय लिया है। ये प्राथमिकताएँ न्याय के सिद्धांत से मेल नहीं खातीं; सवाल तो यह कि क्या दबदबा या पसंद-नापसंद के आधार पर फैसले हो रहे हैं? इसके विपरीत, सरकारी नीतियों की तुलना में जमीनी हालात ज्यूका दिखाते हैं। उदाहरण के लिए, घरेलू विमान सेवाओं की हालत बेहद नाज़ुक है। कहा तो यह गया कि सरकार ने इंडिगो एयरलाइंस को विशेष छूट दी जिससे उसके बाजार हिस्सेदारी पर असर पड़ा। बाद में जब इंडिगो को ज़ुर्माना किया गया और 458 करोड़ रु. का GST जुर्माना लगाया गया, तो समाचारों में इसे ‘सरकारी कार्रवाई’ बताया गया। अख़बारों की रिपोर्ट कहती है कि यह कानून के अनुसार है, मगर असल सवाल यह है कि सरकार ने पहले इंडिगो को क्यों बढ़ावा दिया और अब उस पर शिकंजा क्यों कस रही है। याद रहे कि कोई भी सरकारी विमान सेवा बची नहीं है और बेरोज़गारी चरम पर है। ऐसी घड़ी में, यदि इंडिगो को भारी आर्थिक क्षति होती है या बवाल होने लगता है, तो यह सिर्फ एक कंपनी का नहीं बल्कि पूरे देश का संकट होगा। लेकिन हवा में उड़ रही ख़बरों से तो यही लगता है कि सरकारी मशीनरी अपने काम में बेदाग़ है और आलोचना करने वालों की कोई हैसियत नहीं। देशबन्धु अख़बार ने एक गंभीर राजनीतिक खबर पहले पन्ने पर छापी कि तृणमूल कांग्रेस के प्रतिनिधिमंडल ने चुनाव आयोग से मुलाकात की। यह खबर इसलिए महत्वपूर्ण थी क्योंकि आज की संदिग्ध चुनावी मिजाज में विपक्षी पार्टियाँ सशंकित हैं। अभिषेक बनर्जी ने बताया कि आयोग से उनकी मुलाकात में एकाध मुद्दे पर ही स्पष्टीकरण मिला, बाक़ी सवाल टाल दिए गए। साथ ही उन्होंने अनुरोध किया कि समान विचारधारा वाली पार्टियाँ चुनावी धांधली पकड़ने के सॉफ्टवेयर साझा करें। ऐसी खबर भी किसी बड़े अखबार की प्रमुख खबर नहीं बन पाई। इन सब बातों से साबित होता है कि बड़े मुद्दे पर कतरने की प्रवृत्ति बढ़ रही है। अखबार अक्सर मौसम या सरकारी घोषणाओं को लीड बना रहे हैं, जबकि ज़रूरी सवाल वादों के बजाय हक़ीक़त की ओर जाते हैं।


# दवा सुरक्षा और नियामक पारदर्शिता


मीडिया की अनदेखी का एक ओर चौंकाने वाला उदाहरण दवा सुरक्षा से जुड़ा है। द टेलीग्राफ में आज सामने आई रिपोर्ट बताती है कि भारत की केंद्रीय औषधि नियामक संस्था CDSCO ने कथित नकली रेबीज वैक्सीन की जांच और उससे जुड़े अहम तथ्यों को सार्वजनिक नहीं किया। न तो उसने यह बताया कि जांच में कहाँ क्या गड़बड़ी मिली और न ही उन 694 कंपनियों के नाम जो विभिन्न दवाओं में गुणवत्ता संबंधी मुद्दों में शामिल रहीं। यानी जांच हुई पर जनता को केवल आधी सूचना दी गई। रैबीज़ एक घातक वायरस संक्रमण है, जिससे बचने के लिए संपर्क के तुरंत बाद वैक्सीन लगवाना अनिवार्य है। द टेलीग्राफ रिपोर्ट के मुताबिक, 13 जनवरी 2025 को इंडियन इम्यूनोलॉजिकल्स (सरकारी फर्म) ने CDSCO को एक संदिग्ध वैक्सीन बैच की जानकारी दी। फिर मार्च में दिल्ली डॉग्स विभाग ने सार्वजनिक नोटिस जारी किया। मगर इन 74 दिनों में जनता को कोई चेतावनी नहीं दी गई। उस दौरान लाखों लोग इसी कंपनी का वैक्सीन ले चुके होंगे, क्यूँकि भारत में हर दिन औसतन 2500 लोग रैबीज़ की रोकथाम के लिए इंजेक्शन लगवाते हैं और प्रभावित वैक्सीन का हिस्सा 40% हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि ये चुप्पी नियामक की मूल जिम्मेदारी में विफलता दिखाती है। सरकारी कंपनी ने बाद में ‘नकली’ कहने से साफ़ इनकार किया, मगर माना कि एक बैच की पैकिंग में समस्या थी और उसे बाजार से वापस लिया। दूसरी ओर, ऑस्ट्रेलियाई अधिकारियों ने बाहर से आगाह किया कि भारत में कुछ नकली रैबीज़ वैक्सीन बैच मिल रहे हैं। यानी एसोसिएशन का मानना है कि एक सरकारी कंपनी ने कम से कम ‘संशयास्पद’ बैच बनाया और गिरवी रखा। पारदर्शिता के नाम पर इतने दिनों की खामोशी बेशक आश्चर्यजनक है। कोविड-काल के खतरनाक खांसी वाली सिरप कांड के बाद ऐसा समझा जाता था कि कोई लापरवाही नहीं होगी, पर यहां वही सिलसिला देखने को मिला। इस घटनाक्रम से स्पष्ट होता है कि मीडिया के बिना जनता जानलेवा उत्पादन का शिकार हो सकती है। अगर द टेलीग्राफ ने यह खबर प्रमुखता से नहीं छापी होती, तो रेबीज़ वैक्सीन घोटाला भी गुमनाम रह जाता। दूसरा चौंकाने वाला उदाहरण सरकार की नीति का दोगलापन है – सरकार ने 100mg से अधिक नाइट्रिक ऑक्साइड (जोकि एक आम दर्द-निवारक है) को प्रतिबंधित कर दिया, जबकि खतरनाक हैंगओवर देने वाली खांसी की सिरप पर अभी भी पहले जैसे प्रतिबंध नहीं है। यानी खतरनाक दवा पर कड़ी, सुरक्षित दवा पर नर्म रवैया – यह जनता के प्रति ज़िम्मेदारी कहां रह गई?


# मीडिया की असली भूमिका


आज जब देश में सरकार की संवेदनहीनता उजागर हो रही है, तब मीडिया को भी सरकार की कोखलहट पर सवाल उठाने चाहिए। जनहित की बातों को प्रमुखता देकर ही सिस्टम पर दबाव बनाया जा सकता है। लेकिन अधिकांश अखबार आज उसी रवैये को बढ़ावा दे रहे हैं जो सरकारी प्रवक्ता का है – यानी सतही कवरेज और प्रतिरक्षा। सवाल पूछने वालों को ‘फ़ोकट’ कह देना, गंभीर सवालों को हवा में उड़ाल देना आसान है, लेकिन इससे लोकतंत्र सुरक्षित नहीं रहेगा। मीडिया को अब “सरकार ने क्या किया” न पूछना चाहिए, बल्कि “सरकार ने जनहित की समस्याओं को छुपाने के लिए क्या किया” यह दिखाना चाहिए। यही कामकाजी पत्रकारिता की पहचान है। जब तक संवाददाता दर्द-नाक सच को नहीं दिखाएंगे, सत्ता को सही मायने में जवाबदेह नहीं ठहराया जा सकेगा। जनता की जान-माल की रक्षा इसी दृढ़ पत्रकारिता से होगी, न कि सुर्खियों में आने वाले नीरस मौसम अपडेट या राजनैतिक नारों से।