प्रयागराज: स्नान, सुरक्षा और सख़्ती: क्या माघ मेला आस्था का उत्सव है या प्रशासनिक प्रयोगशाला?

लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला 

स्नान, सुरक्षा और सख़्ती: क्या माघ मेला आस्था का उत्सव है या प्रशासनिक प्रयोगशाला?

प्रयागराज का माघ मेला भारतीय आस्था का वह जीवित प्रतीक है, जहाँ गंगा–यमुना–सरस्वती के संगम पर स्नान केवल धार्मिक क्रिया नहीं, बल्कि सांस्कृतिक स्मृति और सामूहिक चेतना का अनुष्ठान होता है। लेकिन मकर संक्रांति और मौनी अमावस्या 2026 के लिए तैयार किया गया प्रशासनिक “मेगा प्लान” एक बड़ा सवाल खड़ा करता है—क्या यह मेला श्रद्धालुओं के लिए है या व्यवस्थाओं की परीक्षा के लिए?

मुख्यमंत्री के निर्देशों के तुरंत बाद जिस तेज़ी से योजनाएँ बनीं, वे प्रशासनिक सक्रियता का संकेत तो देती हैं, लेकिन उनकी भाषा और संरचना में श्रद्धा से अधिक नियंत्रण की छाया स्पष्ट दिखती है।

## आस्था का वर्गीकरण और घाटों का ‘राज्य–मानचित्र’


इस बार अलग–अलग राज्यों से आने वाले श्रद्धालुओं के लिए अलग–अलग स्नान घाट तय किए गए हैं। पहली नज़र में यह भीड़ प्रबंधन का तार्किक उपाय लगता है, लेकिन गहराई से देखें तो यह आस्था का भौगोलिक वर्गीकरण है—जहाँ श्रद्धालु अब केवल भक्त नहीं, बल्कि “डाटा–यूनिट” हैं जिन्हें अलग–अलग चैनलों में प्रवाहित किया जाएगा।


850 मीटर लंबा ऐरावत घाट, 42 पार्किंग स्थल, 1.30 लाख वाहनों की सीमा—ये आँकड़े दक्षता दर्शाते हैं, पर यह भी बताते हैं कि मेला अब प्राकृतिक प्रवाह नहीं, नियंत्रित यातायात व्यवस्था बनता जा रहा है।


## नो व्हीकल, नो कैमरा: आस्था पर अनुशासन की शर्तें


13 जनवरी की शाम से लेकर प्रमुख स्नान पर्वों तक पूरे मेला क्षेत्र को “नो व्हीकल ज़ोन” घोषित करना सुरक्षा के लिहाज़ से समझा जा सकता है। लेकिन संगम सहित 3.69 किलोमीटर क्षेत्र में नो फोटोग्राफी और नो वीडियोग्राफी ज़ोन घोषित करना एक अलग ही विमर्श खोलता है।


प्रश्न यह नहीं कि सुरक्षा ज़रूरी है या नहीं—प्रश्न यह है कि

* क्या श्रद्धालु अपनी आस्था का दृश्य भी अपने साथ नहीं ले जा सकता?

* क्या हर कैमरा संदिग्ध है और हर नागरिक संभावित अपराधी?


मीडिया को छूट और आम नागरिक पर प्रतिबंध—यह विभाजन बताता है कि राज्य अब दृश्य का स्वामी बनना चाहता है।


## CCTV, ATS, RAF और ‘श्रद्धा की निगरानी’


ATS, RAF, PAC, जल पुलिस, NDRF—सुरक्षा की यह परतें एक ओर आश्वस्त करती हैं, तो दूसरी ओर यह भी संकेत देती हैं कि मेला अब आस्था का समागम कम, उच्च–सुरक्षा क्षेत्र अधिक बन चुका है।


हर प्रवेश द्वार पर तलाशी, सत्यापन, CCTV से निरंतर निगरानी—यह सब मिलकर माघ मेले को एक ऐसे स्थान में बदल देता है जहाँ श्रद्धालु स्वयं को भक्त से पहले निगरानी में खड़ा नागरिक महसूस करता है।


## आपात योजनाएँ और ‘ग्रीन कॉरिडोर’: व्यवस्था या भय की स्वीकारोक्ति?


10 इमरजेंसी प्लान और ग्रीन कॉरिडोर की घोषणा यह स्वीकार करती है कि भीड़ और अव्यवस्था की आशंका अब भी प्रशासन के मन में है। सवाल यह नहीं कि तैयारी क्यों की गई, बल्कि यह है कि क्या हर उत्सव को आपदा की संभावना मानकर ही चलना अब नई प्रशासनिक संस्कृति बन चुकी है?


## श्रद्धा बनाम शासन की भाषा


माघ मेला 44 दिनों तक चलेगा, पाँच प्रमुख स्नान पर्व शेष हैं। यह आयोजन भारत की उस आत्मा का प्रतिनिधित्व करता है जो बिना आमंत्रण, बिना आदेश, बिना पास के संगम की ओर बढ़ती है।


लेकिन यदि हर कदम पर प्रतिबंध, हर दृश्य पर रोक और हर व्यक्ति पर संदेह होगा, तो मेला रहेगा—पर उसका लोकतांत्रिक और आत्मीय स्वरूप धीरे–धीरे क्षीण हो जाएगा।


सुरक्षा ज़रूरी है। व्यवस्था आवश्यक है, लेकिन आस्था को अनुशासन की कैद में बदल देना—यह न तो परंपरा है, न समाधान।


माघ मेला केवल स्नान का पर्व नहीं, यह नागरिक और राज्य के रिश्ते की भी परीक्षा है।