जय श्रीमन्नारायण

 लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला 


जय श्रीमन्नारायण 

आंग्ल नव-वर्ष : काल नहीं, चेतना का पुनर्जागरण

आंग्ल नव-वर्ष घड़ियों की सुइयों का आगे बढ़ना नहीं है— यह चेतना का पुनः संस्कार है। यह वह संधि-क्षण है जहाँ बीता हुआ काल अनुभव बनकर और आने वाला काल संकल्प बनकर आत्मा के द्वार पर उपस्थित होता है।


सनातन दृष्टि में समय (काल) कोई बाह्य सत्ता नहीं—काल स्वयं चेतना का विस्तार है। जो भीतर बदलता है, वही बाहर बदलता है। इसलिए धर्म कहता है— भाग्य आकाश से नहीं गिरता, वह कर्म, पुरुषार्थ और समर्पण की संयुक्त साधना से गढ़ा जाता है।


## कर्म : बंधन नहीं, मुक्ति का द्वार


श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण मनुष्य को कर्म से मुक्त नहीं करते, बल्कि कर्म के बंधन से मुक्त करते हैं—


कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।


यह श्लोक अकर्मण्यता का नहीं, असक्ति-विहीन कर्म का उद्घोष है। फल-आसक्ति जब टूटती है, तब कर्म तप बन जाता है, और तप से ही जीवन में तेज प्रकट होता है। जो कर्म फल की लालसा से मुक्त होकर किया जाता है, वही कर्म आत्मा को ऊँचा उठाता है। और जो कर्म भय, आलस्य या टालने की वृत्ति से रहित होता है, वही कर्म साधना बनता है।


## तमस से सात्त्विकता की यात्रा


हाथ पर हाथ रखकर बैठना केवल शारीरिक जड़ता नहीं—यह तमोगुण की मानसिक स्थिति है। जब मन कहता है— “सब अपने आप हो जाएगा”, तब धर्म स्मरण कराता है—


उद्धरेदात्मनाऽत्मानं नात्मानमवसादयेत्। (गीता)


अपने उद्धार का दायित्व स्वयं अपने कंधों पर उठाना ही मानव जन्म की गरिमा है। राजस से सात्त्विक उन्नयन संघर्ष से नहीं, साधना से होता है। कई बार लक्ष्य दूर नहीं होता—हमारा समर्पण अधूरा होता है।


## आत्मा : अनन्त सामर्थ्य का स्रोत


अपने भीतर झाँकिए—वहाँ कोई साधारण सत्ता नहीं, अनन्त आत्मा निवास करती है।


नायमात्मा बलहीनेन लभ्यः। (उपनिषद)


आत्मा दुर्बल को नहीं मिलती। जब पुरुषार्थ और ईश्वर-समर्पण एक ही श्वास में समाहित हो जाते हैं, तब सफलता कोई उपलब्धि नहीं—स्वाभाविक परिणति बन जाती है।


## नववर्ष का वास्तविक संकल्प


इस नवसंवत्सर पर नये वचन नहीं, नयी चेतना लें—


* कर्म को पूजा बनाइए

* असफलता को शिक्षिका मानिए

* और अहंकार नहीं, अहं-शून्यता को साथ रखिए


तभी समय आपका सेवक बनेगा।


🌺 स्वस्ति-वाचन एवं मंगल प्रार्थना 🌺


इस पावन नववर्ष में—


प्रथम पूज्य श्री महागणपति आपके जीवन से विघ्न नहीं, विघ्न-बोध का भी नाश करें।


परब्रह्म श्रीहरि विष्णु धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष में आपको संतुलन प्रदान करें।


देवाधिदेव महादेव आपको भय नहीं, अभय दें; आसक्ति नहीं, विवेक दें।


जगत्जननी माँ भगवती आपकी रक्षा ही नहीं, आपके भीतर की शक्ति को जाग्रत करें।


महालक्ष्मी समृद्धि को साधना से जोड़े रखें ताकि वैभव अहंकार न बने।


वीणापाणि माँ सरस्वती आपकी वाणी में मधुरता, बुद्धि में विवेक और ज्ञान में विनय भरें।


सर्वे भवन्तु सुखिनः  सर्वे सन्तु निरामयाः।

सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दुःखभाग्भवेत्॥


आपका जीवन केवल आपकी सफलता की कथा न बने, बल्कि सृष्टि के लिए आशीर्वाद बने।


✨ स्वस्ति। शुभम्। मंगलम्। ✨


आपका 

प्रदीप शुक्ल, लखनऊ