इंसान तय नहीं होता, वह तय होने की प्रक्रिया में होता है: एक क्वांटम-युगीन दृष्टि
लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला
इंसान तय नहीं होता, वह तय होने की प्रक्रिया में होता है: एक क्वांटम-युगीन दृष्टि# भूमिका: निश्चितता का भ्रम और आधुनिक संकट
हम एक ऐसे युग में जी रहे हैं जो 'स्पष्टता' की पूजा करता है। हमारी शिक्षा, हमारी न्याय व्यवस्था, हमारे दफ्तर और यहाँ तक कि हमारे परिवार भी हमसे एक ही मांग करते हैं—"तय करो।" या तो तुम इस पार हो या उस पार। या तो तुम आस्तिक हो या नास्तिक। या तो तुम सफल हो या विफल। आधुनिक सभ्यता ने मनुष्य को एक 'बाइनरी कोड' (0 और 1) में बदलने की कोशिश की है।
लेकिन क्या मनुष्य का मन इतना सरल है? क्या हम वास्तव में उतने ही निश्चित हैं जितना हम होने का नाटक करते हैं?
मनोविज्ञान की नई लहर, जिसे 'क्वांटम-लाइक कॉग्निशन' (Quantum-Like Cognition) कहा जाता है, इसी बुनियादी ढांचे को चुनौती देती है। यह सिद्धांत कहता है कि इंसान अराजक नहीं है, वह केवल 'तय' नहीं है। वह एक साथ कई संभावनाओं के सुपरपोजिशन (Superposition) में जीता है।
१. क्या है 'क्वांटम-लाइक' विचार?
क्वांटम भौतिकी में एक प्रसिद्ध सिद्धांत है—जब तक आप किसी कण को देखते नहीं हैं, वह एक साथ कई स्थितियों में हो सकता है। जैसे ही आप उसे 'देखते' (Measure) करते हैं, वह किसी एक स्थिति में सिमट जाता है।
मानव मन भी ठीक ऐसा ही है। आपसे जब कोई गंभीर सवाल पूछा जाता है, तो आपके भीतर एक साथ कई विरोधी विचार नाच रहे होते हैं। पुराना 'क्लासिकल मनोविज्ञान' इसे 'दुविधा' या 'कमजोरी' मानता था। वह मानता था कि दिमाग एक कंप्यूटर है जो डेटा प्रोसेस करता है और परिणाम देता है। लेकिन 'क्वांटम-लाइक' मॉडल कहता है कि दिमाग एक 'संभावनाओं का सागर' है। निर्णय पहले से मौजूद नहीं होता; वह सवाल और स्थिति के टकराने से उस विशिष्ट क्षण में 'पैदा' होता है।
२. सवाल ही जवाब का निर्माता है: 'ऑब्जर्वर इफेक्ट'
इस सिद्धांत की सबसे क्रांतिकारी बात यह है कि सवाल पूछने का तरीका हकीकत बदल देता है। कल्पना कीजिए कि आपसे पूछा जाए: "क्या आप अपने जीवन से संतुष्ट हैं?" आप शायद "हाँ" कह दें। लेकिन यदि इससे ठीक पहले आपसे आपकी आर्थिक तंगी, स्वास्थ्य समस्याओं या पड़ोसी से हुए झगड़े के बारे में पूछा जाए, और फिर संतुष्टि का सवाल आए, तो आपका जवाब बदल जाएगा।
शास्त्रीय मनोविज्ञान इसे 'भटकाव' कहेगा, लेकिन क्वांटम-लाइक मॉडल कहता है कि पहला सवाल आपके मन की 'अवस्था' (State) बदल देता है। आप वही इंसान हैं, दिन वही है, लेकिन संदर्भ बदलते ही आपकी हकीकत बदल गई। इसका अर्थ यह है कि हम 'तयशुदा सत्य' लेकर नहीं घूम रहे, हम संदर्भों के साथ निर्मित होने वाले सत्य हैं।
३. प्रेम और संबंध: विरोधाभासों का सह-अस्तित्व
प्रेम को लेकर हमारी समझ अक्सर बहुत रूमानी और स्थिर रही है। "या तो प्यार है, या नहीं है।" लेकिन वास्तविक जीवन में प्रेम एक 'लटकी हुई स्थिति' है।
एक ही समय में एक व्यक्ति अपने साथी के प्रति गहरा अनुराग भी महसूस कर सकता है और उसके व्यवहार से तीव्र झुंझलाहट भी। वह साथ रहना भी चाहता है और अपनी स्वतंत्रता के लिए भागना भी चाहता है। क्वांटम-लाइक नजरिया कहता है कि यह पाखंड नहीं है। यह प्रेम की वह अवस्था है जहाँ 'आकर्षण' और 'विकर्षण' दोनों एक साथ मौजूद हैं।
रिश्ते अक्सर तब टूटते हैं जब हम दूसरे से 'निश्चितता' की मांग करने लगते हैं। जब हम पूछते हैं—"साफ-साफ बताओ, क्या चाहते हो?" हम वास्तव में उस व्यक्ति की जटिल सोच को एक सरल खांचे में दबा रहे होते हैं। रिश्ता उस पल खत्म नहीं होता जब दरार आती है, बल्कि उस पल खत्म होता है जब हम 'अनिश्चित होने की स्वतंत्रता' छीन लेते हैं।
४. राजनीति और धर्म: पाखंड या मानसिक शिफ्ट?
राजनीति में हम अक्सर 'स्विंग वोटर्स' की बात करते हैं। एक वोटर का मन अंतिम क्षण तक तय नहीं होता। वह पार्टी 'ए' की भ्रष्टाचार विरोधी नीतियों को पसंद करता है, लेकिन पार्टी 'ब' के सांस्कृतिक एजेंडे से भी जुड़ा महसूस करता है। वह 'हाँ' और 'ना' के बीच के उस धुंधलके में खड़ा होता है जिसे राजनीति विज्ञान 'अनिर्णय' कहता है, लेकिन क्वांटम मॉडल उसे 'शुद्ध मानवीय अवस्था' कहता है।
यही बात धर्म पर लागू होती है। एक व्यक्ति जो प्रयोगशाला में बैठकर विज्ञान की कसमें खाता है, संकट के समय ईश्वर को पुकारने लगता है। क्या वह ढोंगी है? नहीं। संकट की स्थिति उसके मन के 'वेव फंक्शन' (Wave Function) को बदल देती है। आस्था और संदेह विरोधी नहीं हैं; वे एक ही सिक्के के दो पहलू हैं जो अलग-अलग स्थितियों में ऊपर-नीचे होते रहते हैं।
५. शिक्षा व्यवस्था: 'उत्तर' की गुलामी से 'प्रक्रिया' की मुक्ति
हमारी वर्तमान शिक्षा पद्धति 'क्वांटम सोच' की सबसे बड़ी दुश्मन है। कक्षा में जैसे ही शिक्षक सवाल पूछता है, वह उम्मीद करता है कि बच्चा तुरंत हाथ उठाए। जो बच्चा चुप है, उसे 'मंदबुद्धि' मान लिया जाता है।
लेकिन क्वांटम-लाइक दृष्टि कहती है कि वह बच्चा शायद सबसे अधिक सक्रिय है। उसके भीतर विचारों का मंथन चल रहा है। वह उत्तर देने की स्थिति में नहीं, बल्कि 'सोचने की स्थिति' में है।
नया मॉडल: शिक्षा को परिणाम (Answer) के बजाय प्रक्रिया (Thinking Process) को पुरस्कृत करना चाहिए।
गलती का सम्मान: गलती को 'विफलता' के बजाय 'अधूरा सच' मानना चाहिए। जब हम बच्चे को 'गलत' कहते हैं, तो हम उसकी सोचने की हिम्मत को वहीं रोक देते हैं। हमें उसे समय देना होगा ताकि उसकी संभावनाएँ एक परिपक्व निर्णय में बदल सकें।
६. परवरिश: ज़िद्द नहीं, असमंजस का सम्मान
माता-पिता अक्सर अपने बच्चों को 'ज़िद्दी' या 'अस्थिर' का ठप्पा लगा देते हैं। "कल तो तुम्हें यह पसंद था, आज क्यों नहीं?" हम भूल जाते हैं कि बच्चा एक निर्माणाधीन (Under Construction) मन है। वह एक साथ कई मानसिक अवस्थाओं में होता है। वह आपकी बात मानकर 'अच्छा बच्चा' भी बनना चाहता है और अपनी इच्छा पूरी कर 'स्वतंत्र' भी महसूस करना चाहता है।
जब हम उसे सजा का डर दिखाकर तुरंत फैसला करने पर मजबूर करते हैं, तो हम उसे 'निर्णय लेना' नहीं, बल्कि 'डरना' सिखाते हैं।
समाधान: परवरिश का उद्देश्य बच्चे को 'आज्ञाकारी' बनाना नहीं, बल्कि उसे 'अपनी उलझनों के साथ सहज' बनाना होना चाहिए। जो बच्चा अपनी उलझन को स्वीकार करना सीख जाता है, वह बड़ा होकर एक संतुलित और आत्मचिंतन करने वाला वयस्क बनता है।
७. सामाजिक और विधिक निहितार्थ: न्याय की नई परिभाषा
यदि हम मान लें कि इंसान 'तय' नहीं होता, तो हमारी न्याय प्रणाली को भी बदलना होगा। वर्तमान में कानून 'मंशा' (Intention) पर टिका है—क्या उसने यह जानबूझकर किया?
क्वांटम-लाइक सोच कहती है कि कई बार इंसान जानबूझकर और अनजाने के बीच की एक धुंधली गली में होता है। वह अपराध नहीं करना चाहता, लेकिन स्थितियों का दबाव और उस विशिष्ट क्षण का आवेग उसे उस ओर धकेल देता है। यह अपराधियों को छोड़ने की दलील नहीं है, बल्कि 'पुनर्वास' (Rehabilitation) की दिशा में एक मानवीय कदम है। यह स्वीकार करना कि "इंसान बुरा नहीं है, उसकी स्थिति उस पल बुरी थी।"
८. 'फ्री विल' (Free Will) का रहस्य
क्या हम स्वतंत्र हैं या हमारी नियति पहले से तय है?
क्वांटम-लाइक सोच इस शाश्वत प्रश्न का एक सुंदर उत्तर देती है: "हम संभावनाओं के भीतर स्वतंत्र हैं।" हम पूरी तरह मजबूर नहीं हैं (Determinism), और न ही हम हर पल पूरी तरह आजाद हैं (Absolute Free Will)। हम अक्सर 'निर्णय की दहलीज़' पर खड़े होते हैं। हमारे संस्कार और अतीत हमें कुछ संभावनाओं की तरफ झुकाते हैं, लेकिन वर्तमान क्षण का विवेक हमें एक नया रास्ता चुनने की अनुमति देता है।
# निष्कर्ष: अनिश्चितता का उत्सव
आधुनिक दुनिया ने हमें 'निश्चितता' का कैदी बना दिया है। हम ऐप से मौसम पूछते हैं, एल्गोरिदम से पूछते हैं कि क्या देखना है, और समाज से पूछते हैं कि कैसे जीना है। हम अनिश्चितता से डरते हैं।
लेकिन Quantum-Like Cognition हमें एक बहुत बड़ी राहत देता है। यह हमें बताता है कि अपूर्ण होना, उलझन में होना और विरोधाभासों को एक साथ लेकर चलना ही 'मनुष्य' होने की गरिमा है।
हकीकत यह नहीं है कि हम क्या हैं। हकीकत यह है कि हम हर पल 'क्या हो सकते हैं'। हम एक तैयार उत्तर नहीं हैं; हम एक निरंतर पूछा जा रहा सवाल हैं। और इस सवाल का बने रहना ही जीवन की सुंदरता है।
हमें 'तय' होने की दौड़ से बाहर निकलना होगा। हमें स्वीकार करना होगा कि "मुझे नहीं पता" एक वैज्ञानिक और दार्शनिक रूप से समृद्ध उत्तर है। जिस दिन हम अपने और दूसरों के 'असमंजस' का सम्मान करना सीख जाएंगे, उस दिन यह दुनिया अधिक दयालु, अधिक सहिष्णु और वास्तव में मानवीय बन जाएगी।
