एप्स्टीन फाइल्स का 'पांडोरा बॉक्स'—वैश्विक कुलीनतंत्र की नैतिक अंत्येष्टि

 Lucknow desk pradeep shukla 


एप्स्टीन फाइल्स का 'पांडोरा बॉक्स'—वैश्विक कुलीनतंत्र की नैतिक अंत्येष्टि

आज 19 दिसंबर, 2025 की तारीख इतिहास में एक ऐसे दिन के रूप में दर्ज हो रही है, जिसने आधुनिक सभ्यता के स्वयंभू संरक्षकों के चेहरे से 'शुचिता' का अंतिम नकाब भी नोच दिया है। अमेरिका के 'न्याय विभाग' (DoJ) और हाउस ओवरसाइट कमेटी द्वारा जारी किए गए 95,000 से अधिक फोटो और 300 जीबी से अधिक के डेटा ने उस 'ग्लोबल एलीट' (वैश्विक कुलीनतंत्र) को नग्न कर दिया है, जो बंद कमरों में मानवता के विरुद्ध अपराधों को 'जीवनशैली' की तरह जीते थे।

१. 'ब्लर' किए गए चेहरे और चयनात्मक पारदर्शिता

दिसंबर के इस 'ट्रेलर' ने ही वैश्विक राजनीति में भूकंप ला दिया है। फाइलों में बिल गेट्स, डोनाल्ड ट्रंप, बिल क्लिंटन, प्रिंस एंड्रयू और स्टीव बैनन जैसे नामों का बार-बार आना केवल एक व्यक्तिगत विफलता नहीं, बल्कि एक व्यवस्थित पतन का प्रमाण है।

 तकनीकी सेंसरशिप: वायरल हो रही तस्वीरों में कई चेहरों पर काली स्याही और 'ब्लर' का प्रयोग यह संकेत देता है कि तंत्र अभी भी कुछ 'अति-महत्वपूर्ण' मोहरों को बचाने की कोशिश कर रहा है।

भारतीय संदर्भ: हालांकि अभी तक किसी भारतीय राजनेता का सीधा 'आपत्तिजनक' साक्ष्य सामने नहीं आया है, लेकिन कूटनीतिक गलियारों में उन तीन सांसदों के नामों की चर्चा तेज है, जो 2014-2018 के बीच एप्स्टीन के वैश्विक नेटवर्किंग सर्किट का हिस्सा रहे थे।

२. अंतर्राष्ट्रीय कूटनीति: 'सॉफ्ट पावर' का अंत

एप्स्टीन कांड ने अमेरिका और ब्रिटेन की 'सॉफ्ट पावर' (नैतिक नेतृत्व) को अपूर्णीय क्षति पहुँचाई है।

ब्रिटिश राजशाही का संकट: प्रिंस एंड्रयू की तस्वीरों ने 'क्राउन' की साख को उस चौराहे पर खड़ा कर दिया है जहाँ से वापसी असंभव लगती है। यह केवल एक व्यक्ति का मामला नहीं, बल्कि उस 'इंस्टीट्यूशन' की वैधता पर सवाल है जो नैतिकता का प्रतीक माना जाता था।

 भू-राजनीतिक अविश्वास: जब दुनिया के सबसे ताकतवर लोकतंत्र के दो पूर्व राष्ट्रपति (क्लिंटन और ट्रंप) एक ही 'सेक्स अपराधी' के साथ संदिग्ध साये में दिखते हैं, तो अंतर्राष्ट्रीय समझौतों और मानवाधिकारों पर उनके प्रवचनों की कीमत कौड़ियों के भाव रह जाती है।

३. नैरेटिव का 'डिजिटल कसाईखाना'

वर्तमान दौर में 'सत्य' की पहचान करना इसलिए कठिन हो गया है क्योंकि सत्ता ने 'प्रचार तंत्र' को ही सत्य बना दिया है। जैसा कि आपने उल्लेख किया:

तुलनात्मक कुतर्क (Whataboutery): नीतीश कुमार द्वारा हिजाब खींचने वाली घटना को गहलोत के घूँघट हटाने वाले 'सुधारवादी संदर्भ' से जोड़ना इसी डिजिटल चालाकी का हिस्सा है।

 मर्यादा का उल्लंघन: राजनीति ने अब 'पवित्रता' को त्यागकर 'प्रभाव' को अपना लिया है। कल का 'भ्रष्ट' आज का 'उपमुख्यमंत्री' बन जाता है, क्योंकि अब नैतिकता 'चरित्र' से नहीं, बल्कि 'वफादारी और नंबर गेम' से तय होती है।

४. नैतिकता: पश्चिम बनाम भारत

अमेरिका में जहाँ 'व्यक्तिगत स्वतंत्रता' का विस्तार है, वहाँ भी बिल क्लिंटन जैसे दिग्गजों को 'सत्य' छिपाने के लिए महाभियोग झेलना पड़ा। लेकिन क्या भारत में वह चेतना शेष है?

भारत में चारित्रिक पवित्रता को 'राष्ट्रीय गौरव' से जोड़ा जाता है। लेकिन आज जब संसद के पटल से असत्य को 'तथ्य' बनाकर पेश किया जाता है और संस्थाएं उस पर मौन रहती हैं, तो यह एप्स्टीन कांड से भी बड़ा 'नैतिक पतन' है।

एप्स्टीन का सबक: एप्स्टीन कांड हमें सिखाता है कि "अपार धन और पहुंच जवाबदेही से सुरक्षा कवच नहीं हो सकते।" यदि भारत में भी इन फाइलों की आंच पहुँचती है, तो क्या हमारा तंत्र उन्हें बचाने का नैरेटिव गढ़ेगा या उन पर वही 'बुलडोजर न्याय' लागू करेगा जो आम नागरिकों के लिए आरक्षित है?

## न्याय की अंतिम पुकार

एप्स्टीन फाइल्स केवल फोटो का संग्रह नहीं, बल्कि उस 'सड़ांध' का एक्स-रे है जो वैश्विक सत्ता संरचनाओं के भीतर तक फ़ैल चुकी है। यदि हम डिजिटल नैरेटिव के शोर में इस पतन को सामान्य (Normalize) मान लेते हैं, तो हम उस भविष्य की ओर बढ़ रहे हैं जहाँ 'अधिकार' केवल ताकतवरों की जागीर होंगे।

सत्य अब फाइलों से बाहर आ चुका है; अब प्रश्न यह नहीं है कि फोटो में कौन है, प्रश्न यह है कि क्या दुनिया के पास इन 'अछूत' हस्तियों को कानून के दायरे में लाने की 'रीढ़' बची है?