नितिन नवीन की 'पर्ची नियुक्ति'—मोदी-शाह बनाम संघ, तानाशाही और विमर्श बदलने की रणनीति

 नितिन नवीन की 'पर्ची नियुक्ति'—मोदी-शाह बनाम संघ, तानाशाही और विमर्श बदलने की रणनीति

भारतीय जनता पार्टी द्वारा बिहार के सड़क राज्य मंत्री नितिन नवीन को राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष नियुक्त करना, और इससे पहले उत्तर प्रदेश अध्यक्ष के रूप में पंकज चौधरी की नियुक्ति, तमाम कयासों पर विराम लगाते हुए एक बार फिर अमित शाह और नरेंद्र मोदी की जोड़ी के 'चौंकाने वाले' और केंद्रीयकृत फैसलों को उजागर करती है। यह फैसला केवल संगठनात्मक बदलाव नहीं है, बल्कि पार्टी के आंतरिक लोकतंत्र, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की घटती भूमिका और राजनीतिक विमर्श को नियंत्रित करने की रणनीति का प्रतीक है।


1. मोदी-शाह बनाम राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS)


* संघ की घटती भूमिका: एक समय था जब RSS की भूमिका भाजपा के राजनीतिक और संगठनात्मक फैसलों में मुख्य रूप से प्रतिबिंबित होती थी। लेकिन भजनलाल शर्मा की राजस्थान में नियुक्ति से लेकर अब नितिन नवीन और पंकज चौधरी जैसे अपेक्षाकृत जूनियर नेताओं की नियुक्ति तक, यह स्पष्ट होता है कि RSS की भूमिका इन प्रमुख राजनीतिक फैसलों में अप्रभावी हो गई है।

* जीत की क्रोनोलॉजी: लेख में एक गंभीर विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है कि RSS भी अब यह समझने लगा है कि भाजपा की जीत का कारण अब केवल विचारधारा या जमीनी कार्यकर्ता नहीं हैं, बल्कि यह "चुनाव आयोग और संगठित रूप से चुनाव चोरी करना" जैसे कारकों पर निर्भर करती है।

* संघ की मजबूरी: चूँकि यह 'संगठित कार्य' मोदी-शाह की राजनीतिक शक्ति के कारण संभव हो पाया है, इसलिए RSS को प्रतिकूल फैसलों के बाद भी खामोश रहना पड़ रहा है। यह खामोशी मजबूरी है, जो आंतरिक रूप से स्वीकार करती है कि परिणाम के पीछे की "क्रोनोलॉजी" बदल चुकी है।


2. विमर्श बदलने की मॉडस ऑपरेंडी


नितिन नवीन की नियुक्ति का समय और उनका अपेक्षाकृत जूनियर प्रोफाइल इस बात की ओर इशारा करता है कि यह फैसला सामरिक (Strategic) है, न कि विशुद्ध रूप से संगठनात्मक।


* विपक्ष की काट: नियुक्ति का मुख्य उद्देश्य उस समांतर सनसनी को पैदा करना था, ताकि विपक्ष के प्रभावशाली मुद्दे—विशेष रूप से राहुल गांधी की 'वोट चोरी के खिलाफ़ दिल्ली रैली'—जनता का विमर्श न बन जाए। 5 लाख लोगों की उपस्थिति और 'संविधान बचाओ' के नारे को काउंटर करने के लिए यह एक 'डायवर्जन' रणनीति थी।

* पर्ची से तानाशाही तक: यह नियुक्ति भाजपा के आंतरिक लोकतंत्र की पोल खोलती है। किसी भी राज्य इकाई का प्रस्ताव या समर्थन न होना, कोई आंतरिक विमर्श या चुनाव न होना और सिर्फ एक पर्ची के माध्यम से राष्ट्रीय अध्यक्ष बना दिया जाना, आलाकमान की तानाशाही का स्पष्ट परिचायक है।


3. कठपुतली अध्यक्ष और कॉर्पोरेट शैली का प्रबंधन


नितिन नवीन की प्रोफाइल को देखते हुए उनके महिमा मंडन के पीछे की वजहें साफ हैं:


* जूनियर नेता का चयन: तीसरी बार के विधायक नितिन नवीन का कोई प्रभावशाली जातिगत या जनाधार नहीं है। संगठन में उनका योगदान सीमित रहा है। एक इतने जूनियर नेता को राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया जाना इस बात का सबूत है कि शीर्ष नेतृत्व राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में अपनी कठपुतली को बिठाना चाहता है।

* कॉर्पोरेट स्टाइल: यह एक लोकतांत्रिक दल के प्रबंधन को बिल्कुल कॉर्पोरेट स्टाइल में स्थानांतरित करने जैसा है। जहाँ अध्यक्ष सिर्फ एक कार्यात्मक (Functional) पद होता है, और वास्तविक शक्ति शीर्ष नेतृत्व के पास केंद्रित रहती है।

* दूसरी पंक्ति का वनवास: इस तरह की नियुक्ति से यह भी स्पष्ट है कि दूसरी पंक्ति के उन वरिष्ठ नेताओं का राजनीतिक वनवास तय किया जा रहा है, जो भविष्य में शीर्ष नेतृत्व को चुनौती दे सकते थे। यह अध्यक्ष लंबी अवधि तक सेवाएं दे सकता है, और इस प्रकार लंबे समय तक शीर्ष नेतृत्व को चुनौती देने वाला कोई नहीं रहेगा।


4. राजनीतिक अटकलों का तूफान


लेख कुछ महत्वपूर्ण राजनीतिक घटनाक्रमों की ओर इशारा करता है, जो इन नियुक्तियों को एक व्यापक राजनीतिक पृष्ठभूमि प्रदान करते हैं:


* पवार के भोज और अडानी की उपस्थिति: शरद पवार के घर राहुल गांधी के साथ गौतम अडानी का रात्रिभोज, और पृथ्वीराज चव्हाण का यह वक्तव्य कि "19 दिसंबर को प्रधानमंत्री बदला जा सकता है," राजनीतिक गलियारों में बड़े बदलाव की अटकलों को हवा दे रहे हैं।

* विदेशी नीति और अस्थिरता: भारत द्वारा अमेरिका से पीछा छुड़ाने की कोशिशें और अमेरिका का सत्ता बदलने का इतिहास, भारत में भी कुछ बाहरी प्रयासों की संभावना पैदा करता है।

* बिहार में असमंजस: नीतीश कुमार को लेकर जारी असमंजस के बीच बिहार के नेता नितिन नवीन को राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाना, शायद बिहार में मध्यवर्ती चुनाव या समीकरणों में बड़े बदलाव की तैयारी भी हो सकती है।


अंततः, नितिन नवीन की नियुक्ति भारतीय जनता पार्टी के इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ है, जो दिखाता है कि पार्टी अब जनता के विश्वास, संगठनात्मक लोकतंत्र या RSS के मार्गदर्शन के बजाय, केंद्रीयकृत शक्ति, विमर्श नियंत्रण और चुनावी सफलता के लिए हर तरह के हथकंडों पर निर्भर है।