सुशासन का ढोंग और शर्मसार मर्यादा—जब सत्ता ही बन जाए भक्षक!
लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला
सुशासन का ढोंग और शर्मसार मर्यादा—जब सत्ता ही बन जाए भक्षक!
"हिजाब नहीं, सुशासन का असली चेहरा उतरा—बहनों के सम्मान पर अब 'मौन' का पहरा!"
बिहार की राजनीति में 'सुशासन' का दावा करने वाले मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने 15 दिसम्बर को जो कृत्य किया, उसने लोकतांत्रिक मर्यादाओं को तार-तार कर दिया है। एक नवनियुक्त डॉक्टर नुसरत परवीन, जो अपनी मेहनत से मंच तक पहुँची थी, उसके हिजाब को सरेआम खींचना केवल एक 'असंवेदनशील व्यवहार' नहीं, बल्कि महिला अस्मिता और उसकी व्यक्तिगत स्वायत्तता (Consent) पर सीधा हमला है। यह वैसी ही शर्मनाक हरकत है, जैसे किसी महिला का घूँघट उसकी मर्जी के बिना उठा देना या सरेआम उसका दुपट्टा खींच लेना।
हैरत की बात यह है कि इस गंभीर अभद्रता को जेडीयू और भाजपा 'पहचान' और 'सुरक्षा' के लचर तर्कों से ढंकने की कोशिश कर रही हैं। मुख्यमंत्री के कार्यक्रम में कोई भी व्यक्ति बिना त्रि-स्तरीय सुरक्षा जाँच और शिनाख्त के मंच तक नहीं पहुँचता। ऐसे में खुद मुख्यमंत्री द्वारा हाथ बढ़ाकर किसी महिला का फेस-कवर हटाना उनकी सुरक्षा की चिंता नहीं, बल्कि उनके 'सत्ता के मद' को दर्शाता है।
इस प्रकरण ने भाजपा के दोहरे चरित्र को भी बेनकाब कर दिया है। नवंबर 2023 में जब नीतीश कुमार ने विधानसभा में विवादित टिप्पणी की थी, तब यही भाजपा उनके इस्तीफे के लिए सड़कों पर थी। आज सत्ता की मलाई का स्वाद ऐसा है कि 'बेटी बचाओ' का नारा देने वाली पार्टी और राष्ट्रीय महिला आयोग को नुसरत परवीन का अपमान दिखाई ही नहीं दे रहा। उत्तर प्रदेश के मंत्री संजय निषाद का यह कहना कि "वो भी तो आदमी ही है", न केवल घटिया मानसिकता का परिचायक है, बल्कि अपराधीकरण को भाषाई आड़ देने की कोशिश है। क्या जीत और सत्ता किसी को भी मर्यादा लांघने का लाइसेंस दे देती है?
इस घटना का सबसे दुःखद पहलू इसका मानवीय पक्ष है। एक पढ़ी-लिखी महिला डॉक्टर, जिसने अपनी पूरी शिक्षा हिजाब में रहकर पूरी की, उसे सरकारी नौकरी छोड़कर राज्य से बाहर जाने पर मजबूर होना पड़ा। नुसरत परवीन का सहम जाना और यह कहना कि "वहां लोग हंस रहे थे", हमारे समाज और तंत्र की संवेदनहीनता का सबसे बड़ा प्रमाण है। यह उस डॉक्टर की हार नहीं, बल्कि उस 'सुशासन' की हार है जो 'जीविका दीदी' के नाम पर वोट तो बटोरता है, लेकिन एक सम्मानजनक कार्यस्थल देने में विफल रहता है।
नीतीश कुमार ने उस दिन नुसरत का हिजाब नहीं खींचा, बल्कि बिहार के उन करोड़ों लोगों के भरोसे को खींचा है जो उन्हें अपना संरक्षक मानते थे। जब रक्षक ही भक्षक की भूमिका में आ जाए और सहयोगी दल उसे जायज़ ठहराने लगें, तो समझ लेना चाहिए कि नैतिकता का पतन अंतिम चरम पर है। न्यायपालिका को इस मामले का स्वतः संज्ञान लेना चाहिए, वरना 'महिला सशक्तिकरण' की हर बात महज़ एक चुनावी शिगूफा बनकर रह जाएगी।
