'पितृपूजन' में डूबी पत्रकारिता और ₹90 पार के डॉलर पर राष्ट्रीय आत्म-हनन

 लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला 


'पितृपूजन' में डूबी पत्रकारिता और ₹90 पार के डॉलर पर राष्ट्रीय आत्म-हनन

"2047 का विज़न दिखाने वाले देश की पत्रकारिता का बौद्धिक स्तर: 'पुतिन, कौन हैं सबसे महान PM?'। यह मूर्खता नहीं, यह आत्मघाती 'बौद्धिक दिवालियापन' है!"

हम एक ऐसे दौर में जी रहे हैं, जहाँ देश की अर्थव्यवस्था ₹90 पार के डॉलर से जूझ रही है और क्षेत्रीय सुरक्षा खतरे में है, लेकिन हमारे राष्ट्रीय विमर्श का शिखर—रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के भारत दौरे का इंटरव्यू—चार्ट-टॉपिंग चाटुकारिता का एक शर्मनाक दस्तावेज बन गया है।

यह केवल खोया हुआ अवसर नहीं है; यह भारतीय मीडिया और कूटनीतिक तंत्र के एक बड़े हिस्से के मानसिक दिवालियापन और बौद्धिक आत्म-हनन का प्रमाण है।

I. पत्रकारिता का पतन: 'गंभीरता' से 'गायन' तक

एक पत्रकार का काम शक्ति से प्रश्न पूछना होता है, न कि शक्ति के सामने नतमस्तक होना। पुतिन जैसे वैश्विक नेता, जो अकूत तेल, सैन्य शक्ति और कूटनीतिक दृढ़ता के धनी हैं, उनके मुख से निकला एक शब्द भारत की ऊर्जा सुरक्षा, सैन्य प्रौद्योगिकी और भू-राजनीतिक भविष्य को हमेशा के लिए बदल सकता था।

मगर हमारे पत्रकारों ने क्या पूछा?

"आपके कार्यकाल में जितने भारतीय प्रधानमंत्री रहे, उनमें सबसे महान कौन लगता है?"

यह सवाल पत्रकारिता का नहीं, बल्कि पितृपूजन की धार्मिक आस्था का प्रश्न है। यह प्रश्न पूछकर हमारे पत्रकारों ने सिर्फ अपनी ही नहीं, बल्कि पूरे देश की बौद्धिक सम्पदा का अपमान किया। उन्होंने यह दिखा दिया कि उनकी प्राथमिकता राष्ट्रीय हित, आर्थिक सुरक्षा, या BRICS करेंसी नहीं, बल्कि सत्ताधारी नेता की व्यक्तिगत प्रशंसा बटोरना है।

पुतिन का जवाब— "किसी दूसरे देश के नेताओं को इस तरह वर्गीकृत करना अशोभनीय है"—किसी राष्ट्राध्यक्ष का डिप्लोमैटिक उत्तर नहीं था, बल्कि भारतीय पत्रकारिता पर किया गया एक तीखा और शालीन व्यंग्य था।

II. साउथ ब्लॉक का लकवा: जब कूटनीति चाटुकारिता बन जाए

यदि यह मान भी लिया जाए कि पत्रकारों में बौद्धिक साहस नहीं था, तो सबसे बड़ी विफलता साउथ ब्लॉक (विदेश मंत्रालय) की है। अंतर्राष्ट्रीय शिखर बैठकों में, महत्वपूर्ण सवालों की फेहरिस्त रणनीतिक और कूटनीतिक विशेषज्ञों द्वारा तैयार की जाती है।

जिन आठ भू-रणनीतिक सवालों (जैसे नॉर्दर्न सी रूट का स्थायी साझेदार, गोल्ड-आधारित BRICS भुगतान प्रणाली, मेक-इन-इंडिया के तहत S-500 तकनीक का हस्तांतरण) को पूछा जाना चाहिए था, उन्हें जानबूझकर छोड़ दिया गया।

 यह अक्षमता क्यों?: क्या विदेश मंत्रालय में अब इतनी भी दूरदर्शिता नहीं बची कि वे रूस की मजबूरी (प्रतिबंध और चीन पर बढ़ती निर्भरता) को पहचानकर, अपनी 2047 की ऊर्जा और सैन्य सुरक्षा का बीमा करवा सकें?

आत्मघाती कूटनीति: UNSC में वीटो पावर वाले स्थायी सीट का समर्थन, या 20-25 साल तक रियायती तेल, गैस और यूरिया की गारंटी—ये ऐसे अवसर थे जो अरबों डॉलर की बचत और वैश्विक प्रतिष्ठा दिला सकते थे। लेकिन विदेश मंत्रालय की प्राथमिकता इन समझौतों को सुनिश्चित करना नहीं, बल्कि 'मोदी की तारीफ हुई' की हेडलाइन बेचना थी।

यह केवल 'अक्षमता' नहीं है। यह एक ऐसी बौद्धिक गुलामी का प्रतीक है, जहाँ देश की संस्थाएँ अपनी रणनीतिक बुद्धि को सत्तारूढ़ दल की व्यक्तिगत महिमा के चरणों में समर्पित कर चुकी हैं।

III. मूर्खता की प्रयोगशाला और राष्ट्रीय त्रासदी

आज देश की अर्थव्यवस्था लड़खड़ा रही है, डॉलर ₹90 पार है, और चीन सीमा पर आँखें दिखा रहा है। ऐसे में हमें चेन्नई-व्लादिवोस्तोक सी-रूट चाहिए था, हाइपरसोनिक मिसाइल तकनीक चाहिए थी, और भविष्य के युद्धों के लिए 'सुरक्षित तटस्थता' का लाइसेंस चाहिए था।

हमें मिला क्या? 'पितृपूजन' की ब्रेकिंग न्यूज़, और पुतिन का इस्तेमाल करके यह घोषणा कि "पुतिन ने मोदी की तारीफ की"—यही हमारी विदेश नीति का सबसे बड़ा लक्ष्य हो गया है।

जिन पत्रकारों को देश की जनता ने 'सत्य' खोजने के लिए माइक दिया था, वे आज 'नोएडा की सोनपरियाँ' बनकर तालियां बजाने और मलमूत्र ढोने तक सीमित रह गए हैं। यह पत्रकारिता नहीं, यह एक राष्ट्रीय त्रासदी है। जब मीडिया बौद्धिक रूप से दिव्यांग हो जाए और कूटनीति चाटुकारिता में बदल जाए, तो देश का भविष्य अंधकारमय होना निश्चित है। हमें इस बौद्धिक दिवालियापन पर केवल दुःख नहीं, बल्कि गुस्सा व्यक्त करना चाहिए।