जब खबर सत्ता का प्रतिबिंब बन जाए — और जनता गायब
लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला
जब खबर सत्ता का प्रतिबिंब बन जाए — और जनता गायब
भारतीय मीडिया के पहले पन्ने आज एक गहरा सवाल पूछते हैं—क्या देश में खबरें अब तथ्यों और जनता के हितों से नहीं, बल्कि सत्ता की प्राथमिकताओं और प्रचार की रणनीति से तय हो रही हैं?
प्रधानमंत्री की विदेश यात्रा, उनके वक्तव्य, और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर प्रस्तुत राष्ट्रवादी विमर्श सुर्खियों में हैं। आतंकवाद, वैश्विक नेतृत्व, भारतीय मूल्य — ये भाषा सिर्फ कूटनीति का हिस्सा नहीं बल्कि मीडिया नैरेटिव की दीवारें बन चुकी हैं।
इसी बीच, दिल्ली—देश की राजधानी— दुनिया का सबसे प्रदूषित शहर घोषित होती है, लेकिन यह खबर पहले पन्नों पर जगह नहीं पाती। क्यों?
क्योंकि एक्यूआई में दम घुट जाने वाली दिल्ली हेडलाइन के लिए उतनी उपयोगी नहीं जितना कि एक वैश्विक मंच पर भारत की छवि का अलंकरण।
# नैरेटिव बनाम न्यूज़: चुनाव क्या है?
यह सिर्फ संयोग नहीं कि श्रम कानूनों में बड़े बदलाव — जो करोड़ों कर्मचारियों की सुरक्षा, भविष्य और आजीविका को प्रभावित करते हैं — को सुधार के रूप में पेश किया गया।
उन बदलावों में सुरक्षा-कवच कमजोर है, स्थायी नौकरियों का भविष्य संदेह में है, ट्रेड यूनियनों को कमजोर करने की जमीन तैयार है — लेकिन खबरों में यह सब गायब है।
और जब श्रमिक संघ विरोध की चेतावनी देते हैं, तब कहीं एक कोने में — दो कॉलम में — खबर छपती है कि सरकार अब प्रतिक्रिया लेने को तैयार है।
यह बिल्कुल साफ है: पहले प्रचार, फिर कानून, फिर विरोध — और फिर प्रतिक्रिया का नाटक।
# प्रदूषण: जब मौत धीरे-धीरे आए तो वह सुर्खी नहीं बनती
दिल्ली की हवा लोगों के फेफड़ों में धुआं भर रही है।
लेकिन उस खबर को तब तक सुर्खी नहीं मिलती जब तक:
* अंतरराष्ट्रीय संस्था सूची जारी न करे,
* लोग सड़कों पर मास्क पहनने के लिए मजबूर न हों,
* और राजनीतिक जवाबदेही टल न जाए।
यह वही राजधानी है जिसे पिछले 10 वर्षों में “वर्ल्ड क्लास” बनाने का वादा किया गया था, लेकिन हवा इतनी ज़हरीली है कि समय आने पर इतिहास लिखेगा: “दिल्ली में लोकतंत्र ज़िंदा था लेकिन हवा मर चुकी थी।”
# मीडिया: प्रहरी या पोस्टर?
यह प्रश्न अब पुराना हो चुका है कि मीडिया लोकतंत्र का चौथा स्तंभ है या सत्ता का विज्ञापन जहाज़। आज प्रश्न यह है: क्या मीडिया अपने पाठक के प्रति जवाबदेह है या अपने मालिक, निवेशकों और सत्ता संरचना के प्रति?
जब एक ही दिन में:
* सत्ता का भाषण लीड न्यूज़ बनता है,
* प्रदूषण, श्रम अधिकार और स्वास्थ्य जैसे मुद्दे गायब हो जाते हैं,
* और सवालों की जगह भाषणों का प्रसारण होता है —
तो लोकतंत्र में पत्रकारिता की भूमिका कमजोर नहीं, बल्कि प्रतिस्थापित हो चुकी है।
# खतरा सिर्फ सेंसरशिप नहीं — बल्कि चयनात्मक दृश्यता है
यह सेंसरशिप से अधिक सलीकेदार नियंत्रण है।
सत्ता कहती नहीं — संकेत देती है।
मीडिया दबाव में नहीं — रिश्ते में है।
और यह रिश्ता बताता है कि आज:
* कुछ खबरें छपती हैं,
* कुछ खबरें दबा दी जाती हैं,
* और कुछ खबरों को दबाने की जरूरत ही नहीं पड़ती, क्योंकि वे लिखी ही नहीं जातीं।
# लोकतंत्र तब नहीं मरता जब आवाज़ दबाई जाती है — वह तब मरता है जब जनता सुर्खियों में नहीं होती
आज मीडिया का बड़ा हिस्सा देश के मुद्दे नहीं, देश की छवि लिख रहा है और छवि तब खतरनाक हो जाती है जब वह सच्चाई की जगह ले लेती है।
एक लोकतांत्रिक समाज की पत्रकारिता वह है जो सत्ता से नहीं डरती — उससे सवाल करती है। आज जरूरत है उस पत्रकारिता की जो पूछ सके:
* दिल्ली में दम क्यों घुट रहा है?
* श्रम कानून किसके लिए बने हैं?
* और सत्ता का भाषण खबर क्यों है, लेकिन जनता की हालत नहीं?
क्योंकि अंत में,
🖋 समाचार का मतलब वह नहीं जो सत्ता कहे — समाचार वह है जो जनता भुगत रही है।
