नई दिल्ली: चुप्पी की राजनीति, मीडिया का मौन और राष्ट्र का सम्मान।

एम एस वर्मा ( पत्रकार एवं सामाजिक चिंतक)


चुप्पी की राजनीति, मीडिया का मौन और राष्ट्र का सम्मान

नई दिल्ली में आयोजित एक थिंक टैंक कार्यक्रम में चीन के राजदूत शू फेइहोंग ने अमेरिका को ‘गुंडा’ कहते हुए साफ़ चेतावनी दी— “चुप्पी से धौंस जमाने वालों का हौसला बढ़ता है।”

यह वाक्य केवल अमेरिका की आलोचना भर नहीं, बल्कि भारत की विदेश नीति और नेतृत्व पर अप्रत्यक्ष तंज़ है। सवाल उठता है कि क्या प्रधानमंत्री मोदी की बार-बार की चुप्पी ने वास्तव में भारत को ‘विश्वगुरु’ बनाया है या दुनिया के सामने कमजोर साबित किया है?

अमेरिका की धौंस और भारत की खामोशी

अमेरिका ने भारत पर 50% तक टैरिफ थोपे, वीज़ा पाबंदियाँ लगाईं, और कई बार अपमानजनक टिप्पणियाँ कीं। ट्रंप शासन के दौरान तो भारतीय मूल के नागरिकों पर हथकड़ी प्रकरण और ऑपरेशन सिंदूर रोकने जैसी घटनाएँ भी हुईं। हर बार अमेरिका का दबदबा साफ़ दिखा, पर भारत का प्रतिरोध कहीं सुनाई नहीं दिया।

इस चुप्पी को सत्ता समर्थक ‘रणनीतिक धैर्य’ कहकर प्रस्तुत करते हैं, लेकिन अंतरराष्ट्रीय बिरादरी इसे कमजोरी और अधीनता के रूप में देखती है।

 चीन का राजनीतिक खेल

चीन जानता है कि भारत अमेरिका के साथ साझेदारी पर निर्भर है। इसलिए बीजिंग यह अवसर छोड़ना नहीं चाहता कि भारत की चुप्पी को उजागर कर उसे ‘अमेरिकी अनुचर’ की छवि में दिखाया जाए। यही कारण है कि शू फेइहोंग का यह बयान भारत के सम्मान पर अप्रत्यक्ष चोट है।

 मीडिया की चुप्पी — सबसे बड़ा प्रश्न

सबसे गंभीर पहलू यह है कि भारत का मीडिया इस सवाल को गहराई से उठाने से बचता है।

 क्या आपने सुना कि किसी बड़े चैनल ने बहस में यह पूछा हो कि प्रधानमंत्री ने अमेरिकी टैरिफ या हथकड़ी प्रकरण पर ठोस विरोध क्यों नहीं दर्ज कराया?

 क्या अख़बारों ने संपादकीय पन्नों पर यह चर्चा की कि भारत का सम्मान मौन से सुरक्षित रहेगा या प्रतिरोध से?

इसके बजाय मीडिया का बड़ा वर्ग चीन के बयान को “अमेरिका विरोधी शोर” तक सीमित करके दिखा देता है, ताकि जनता का ध्यान इस कटाक्ष से हट जाए कि असल में तीर किसकी ओर चला था।

यही मीडिया जब घरेलू राजनीति में विपक्ष के हर बयान पर घंटों की डिबेट चलाता है, तब अंतरराष्ट्रीय मंच पर राष्ट्र की साख पर लगे सवालों को दबा जाता है। यह मीडिया की मिलीभगत नहीं तो और क्या है?

सम्मान नारे से नहीं, प्रतिरोध से

भारत आज अगर सचमुच विश्वगुरु बनना चाहता है, तो उसे मंच से नारे देने से आगे बढ़कर साहसिक कूटनीतिक प्रतिरोध दिखाना होगा। चुप्पी का मतलब समझौता है, और समझौते से पैदा होती है पराधीनता।

चीन के राजदूत का बयान हमें आईना दिखाता है कि—

👉 “सम्मान की रक्षा चुप्पी से नहीं, साहसिक प्रतिरोध से होती है। और यदि मीडिया भी इस प्रश्न पर चुप है, तो यह राष्ट्र के सम्मान पर दोहरी चोट है।”