मीडिया घोषणापत्र : पत्रकारिता की आत्मा बचाने का चार्टर
लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला
मीडिया घोषणापत्र : पत्रकारिता की आत्मा बचाने का चार्टरलोकतंत्र के चौथे स्तंभ की नींव डगमगा चुकी है। सत्ता की गोद में बैठा मीडिया, विज्ञापन के लालच और पदों की खरीदी-बिक्री में फँसा मीडिया—अब जनता का प्रहरी नहीं, बल्कि सौदेबाज़ बन गया है।
ऐसे में, ज़रूरी है कि हर मीडिया हाउस और हर पत्रकार अपने सामने ये सवाल रखे और जवाब माँगे। यही सवाल उनका आईना हैं, यही जवाब उनका भविष्य तय करेंगे।
✒️ वो 20 सवाल, जो मीडिया से सम्बन्धित को खुद से पूछने चाहिए
१. मैं खबर बेच रहा हूँ या दिखा रहा हूँ?
क्या मेरी रिपोर्टिंग जनता की सच्चाई है, या किसी पार्टी/कंपनी का विज्ञापन?
२. क्या मैं सत्ता से सवाल करता हूँ या सिर्फ़ उसकी प्रेस रिलीज़ पढ़ता हूँ?
पत्रकार होना और प्रवक्ता होना—क्या दोनों में फर्क बचा है?
३. क्या मेरी कलम बिक चुकी है?
विज्ञापन, स्पॉन्सर्ड कंटेंट या पद की खरीद-फ़रोख़्त—क्या मैं भी इसी खेल का हिस्सा हूँ?
४. क्या मैं जनता की नब्ज़ सुन रहा हूँ या सिर्फ़ टीआरपी की धुन पर नाच रहा हूँ?
गाँव, किसान, मज़दूर, बेरोज़गार की आवाज़ मेरी खबरों में कितनी जगह पाती है?
५. क्या मैं सच बोलने से डरता हूँ?
क्या सत्ता, विज्ञापनदाता या मालिक की नाराज़गी के डर ने मेरी सच्चाई छीन ली है?
६. क्या मैं ख़बर को हल्का बना रहा हूँ?
राष्ट्रहित के सवाल छोड़कर क्या मैं केवल बॉलीवुड, क्रिकेट और चटपटी सनसनी पर ध्यान देता हूँ?
७. क्या मैं नैतिकता से बंधा हूँ या सिर्फ़ पैकेज और प्रमोशन से?
क्या मेरी प्राथमिकता पत्रकारिता की आचार-संहिता है या अगले वेतन-इंक्रीमेंट की होड़?
८. क्या मेरी पहचान पेशेवर पत्रकार की है या दलाल की?
क्या जनता मुझे सवाल पूछने वाला समझती है या सौदेबाज़?
९. क्या मैंने लोकतंत्र को मज़बूत किया या खोखला?
मेरी हर रिपोर्ट का असर—जनता को जागरूक करता है या गुमराह?
१०. अगर कल मेरी रिपोर्टें इतिहास का हिस्सा बनें तो क्या मुझे गर्व होगा?
या मैं अपनी ही लिखी हुई खबरों को पढ़ने से कतराऊँगा?
११. क्या मैंने झूठी खबर (फेक न्यूज़) चलाने से पहले एक बार भी तथ्य-जांच की?
१२. क्या मैं बहस में एंकर हूँ या जज? – मैं सवाल पूछ रहा हूँ या खुद ही फैसला सुना देता हूँ?
१३. क्या मेरे पैनल में हर बार वही चेहरे बुलाए जाते हैं जो सत्ता को खुश करें?
१४. क्या मैं क्षेत्रीय भाषाओं और हाशिए की आवाज़ों को जगह देता हूँ?
१५. क्या मेरा कैमरा गाँव, बस्तर और झुग्गियों में भी जाता है, या सिर्फ़ दिल्ली-मुंबई तक सीमित है?
१६. क्या मैं खबर की गहराई में जाता हूँ या केवल 2 मिनट के मसालेदार ‘पैकेज’ पर टिक गया हूँ?
१७. क्या मेरी हेडलाइन डर पैदा करती है या सच सामने लाती है?
१८. क्या मैं सिर्फ़ सत्ताधारी से सवाल करता हूँ, या विपक्ष और कॉरपोरेट से भी?
१९. क्या मैंने कभी यह सोचा कि मेरी खामोशी भी अपराध है?
२०. क्या मेरे भीतर अभी भी वही जिज्ञासा और साहस है, जिसके कारण मैंने पत्रकारिता चुनी थी?
👉 ये सवाल केवल आत्ममंथन नहीं, बल्कि पत्रकारिता की आत्मा की खोज हैं।
अगर मीडिया इन्हें गंभीरता से पूछे और जवाब तलाशे, तभी लोकतंत्र की चौथी ताक़त अपनी असली ताक़त वापस पा सकती है।
"पत्रकारिता कोई नौकरी नहीं, यह लोकसेवा है।
मीडिया की आत्मा बिकेगी तो लोकतंत्र की रीढ़ टूट जाएगी।"
अब वक्त है कि हर पत्रकार और हर मीडिया संस्थान इस घोषणापत्र को अपनी दीवार पर टाँगे और रोज़ इन सवालों से गुज़रे।
क्योंकि सच यही है—
"अगर मीडिया बिक गया, तो लोकतंत्र टिक नहीं पाएगा।"