नई दिल्ली: संविधान बनाम सत्ता: अदालतें पूछ रही हैं सवाल, मीडिया चुप क्यों है?

 

संविधान बनाम सत्ता: अदालतें पूछ रही हैं सवाल, मीडिया चुप क्यों है?

भारतीय लोकतंत्र के लिए कल का दिन ऐतिहासिक था। मुख्य न्यायाधीश ने सीधे-सीधे सवाल उठाया —

👉 “अगर कोई संवैधानिक अधिकारी वैध कारण के बिना अपना काम करने से मना कर दे तो क्या अदालतें शक्तिहीन होकर बैठी रहें? क्या हम बंधे हुए हैं?”

यह सवाल केवल राज्यपालों के विधेयकों पर अटकाने की आदत पर नहीं है, यह पूरे शासन तंत्र पर सवाल है। क्योंकि आज देश में कई संवैधानिक संस्थाएँ सत्ता के दबाव में काम करती दिख रही हैं।

 राज्यपाल: सत्ता का राजनीतिक मोहरा

राज्यपाल का पद संविधान के अनुसार “संवैधानिक प्रमुख” का है, लेकिन आज यह अक्सर राजनीतिक टूल में बदल गया है।

विधेयक महीनों-बरसों तक रोके जाते हैं।

निर्वाचित सरकारों के फैसले बाधित किए जाते हैं।

“ना” या “हाँ” कहने की बजाय फाइलें धूल खाती रहती हैं।

यह लोकतंत्र नहीं, अराजकता है। क्योंकि निर्णय न लेना भी एक निर्णय है।

सरकार की दलील और सच्चाई

सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि “विधेयक पर देरी राजनीतिक मामला है, अदालत को इसमें दखल नहीं देना चाहिए।”

लेकिन सवाल है — अगर संवैधानिक पदाधिकारी संविधान की जिम्मेदारी ही पूरी न करें तो जनता कहाँ जाए? जवाबदेही किसकी हो?

मीडिया का मौन अपराध

यह सब बहस कल सुप्रीम कोर्ट में हुई। The Hindu ने इसे प्रमुखता दी, कुछ अख़बारों ने अंदर के पन्नों पर। लेकिन बहुसंख्यक मीडिया का रुख साफ है — जहाँ सत्ता असहज हो, वहाँ चुप रहो।

संसद सत्र पर “166 घंटे बर्बाद” और “248 करोड़ डूबे” जैसी हेडलाइन गढ़ी जाती हैं।

लेकिन असली मुद्दा — चर्चा क्यों नहीं कराई गई? राज्यपाल क्यों टालमटोल कर रहे हैं? — वह गायब है।

 राहुल गांधी ने वोट चोरी का आरोप लगाया, तो मीडिया आरोप पर बहस नहीं करता, बल्कि आरोप लगाने वाले को ही कटघरे में खड़ा कर देता है।

 नई प्रवृत्ति: नैरेटिव पत्रकारिता

आज मीडिया का बड़ा हिस्सा पत्रकारिता नहीं कर रहा है, बल्कि सत्ता का नैरेटिव गढ़ने और बेचने का ठेका उठा लिया है।

“संसद का समय बर्बाद” — विपक्ष को दोषी ठहराने वाली हेडलाइन।

“कांग्रेस असुरक्षित” — प्रधानमंत्री का बयान अखबारों में फोटो सहित प्रमुखता पाता है।

मुख्यमंत्री पर हमला हुआ, पुलिस आयुक्त बदला गया — खबर ऐसे लिखी जाती है जैसे सब कुछ सत्ता की सजगता से हुआ, जबकि सच्चाई है सुरक्षा में विफलता।

 असली खतरा

यह सिर्फ खबरों की भाषा का मामला नहीं है। यह लोकतंत्र के भविष्य का सवाल है।

अगर मीडिया सत्ता की गलतियों को छिपाएगा,

अदालत के सवालों को दबाएगा,

विपक्ष की आवाज को बदनाम करेगा,

तो जनता तक सच्चाई कभी नहीं पहुँचेगी। और यही वह बिंदु है जहाँ लोकतंत्र की नींव दरकती है।

मुख्य न्यायाधीश का सवाल केवल अदालत का नहीं है, यह जनता का भी सवाल है:

👉 “क्या संवैधानिक संस्थाएँ सत्ता की मनमानी से बेबस रहेंगी?”

लेकिन अफ़सोस यह है कि इस सवाल को मीडिया ने देशव्यापी बहस नहीं बनाया। उसने वही किया जो वह अक्सर करता है — सत्ता का मुखपत्र बनकर रहा।

अगर लोकतंत्र बचाना है, तो जनता को यह खेल समझना होगा। क्योंकि जब अदालतें पूछ रही हैं, और मीडिया चुप है — तब असली जिम्मेदारी जनता पर है।