जन्माष्टमी: भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव की आध्यात्मिक महिमा।

 संवाददाता: प्रदीप शुक्ला 

जन्माष्टमी: भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव की आध्यात्मिक महिमा

सत्यव्रतं सत्यपरं त्रिसत्यं सत्यस्य योनिं निहितं च सत्ये।

सत्यस्य सत्यमृतसत्यनेत्रं सत्यात्मकं त्वां शरणं प्रपन्नाः।।

यह श्लोक श्रीमद्भागवत पुराण के दशम स्कन्ध से लिया गया है। यह भगवान श्रीहरि की स्तुति करता है।

समस्त संसार के प्राणदाता, सृष्टि के पालक और परम सत्य के स्वरूप भगवान श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव, जन्माष्टमी, संपूर्ण विश्व में श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाया जाता है। यह केवल एक तिथि नहीं, बल्कि अधर्म पर धर्म की, असत्य पर सत्य की और अंधकार पर प्रकाश की विजय का पावन पर्व है। इस दिव्य अवसर पर हम उस परम सत्ता का स्मरण करते हैं, जिन्होंने धर्म की स्थापना और सज्जनों की रक्षा के लिए अवतरित होने का संकल्प लिया।

 देवताओं द्वारा गर्भ में भगवान की स्तुति

भगवान श्रीकृष्ण के प्राकट्य से पूर्व, जब वे माता देवकी के गर्भ में विराजमान थे, तब स्वयं भगवान शंकर और ब्रह्मा जी अपने अनुचरों सहित कंस के कारागार में प्रकट हुए। उनके साथ समस्त देवता और नारद जैसे ऋषि भी उपस्थित थे। उन सबने मधुर वचनों में परम पुरुषोत्तम भगवान श्रीहरि की स्तुति करते हुए उनके दिव्य स्वरूप और गुणों का गान किया। देवताओं ने कहा कि हे प्रभु, आप ही सभी सत्य के परम आधार हैं, आप ही तीनों कालों में सत्य रूप से विद्यमान रहते हैं। आपका संकल्प और आपकी प्रतिज्ञा सदैव सत्य होती है। हम आपकी शरण में आए हैं, क्योंकि आप ही इस सृष्टि के मूल कारण, पालनकर्ता और अंततः लय करने वाले हैं।

 संसार वृक्ष और भगवान की माया

स्तुति करते हुए देवताओं ने इस संपूर्ण प्रपंच को एक वृक्ष के समान बताया, जिसके सुख-दुःख दो फल हैं, सत्त्व, रज और तम तीन जड़ें हैं, तथा काम, क्रोध, लोभ, मोह और मात्सर्य जैसे छह स्वभाव हैं। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि यद्यपि ब्रह्मा, विष्णु और महेश इस सृष्टि के कर्ता, पालक और संहारक माने जाते हैं, परंतु जिनकी बुद्धि आपकी माया से आच्छादित है, वे ही आपको इन रूपों में पृथक देखते हैं। ज्ञानी पुरुष तो आप ही को ब्रह्मादि के रूप में स्थित देखते हैं, क्योंकि ये सभी आपके ही अवतार हैं।

बिभर्षि रूपाण्यवबोध आत्मा क्षेमाय लोकस्य चराचरस्य।

सत्त्वोपपन्नानि सुखावहानि सतामभद्राणि मुहुः खलानाम्।।

देवताओं ने यह भी कहा कि हे ज्ञानस्वरूप प्रभु, आप चराचर संसार के कल्याण के लिए ही बार-बार शुद्ध सत्त्वगुण से युक्त स्वरूपों को धारण करते हैं, जो सत्पुरुषों के लिए सुखदायक और दुष्टों के लिए दुःखदायी होते हैं।

भक्ति और मोक्ष का महात्म्य

देवताओं ने स्पष्ट किया कि भगवान के अवतार का उद्देश्य केवल दुष्टों का संहार करना नहीं, बल्कि भक्तों को मोक्ष प्रदान करना भी है।

त्वय्यम्बुजाक्षाखिलसत्त्वधाम्नि समाधिनावेशितचेतसैके।

त्वत्पादपोतेन महत्त्वकृतेन कुर्वन्ति गोवत्सपदं भवाब्धिम्।।

इस श्लोक के माध्यम से वे बताते हैं कि हे कमलनेत्र! ज्ञानी और विवेकी पुरुष समाधि द्वारा अपने चित्त को आपकी शुद्ध मूर्ति में स्थापित करके, आपके चरण रूपी नौका का आश्रय लेकर इस संसार-सागर को बछड़े के खुर के समान छोटा बना देते हैं, अर्थात् अनायास ही पार कर जाते हैं।

वे आगे कहते हैं कि जो लोग भक्ति का मार्ग छोड़कर स्वयं को मुक्त मानते हैं, उनकी बुद्धि अशुद्ध होती है और वे कठोर तपस्या से उच्च पद प्राप्त करके भी अंततः नीचे गिर जाते हैं। इसके विपरीत, जो भक्त आपके प्रति दृढ़ प्रेम रखते हैं, वे कभी भक्ति मार्ग से विचलित नहीं होते। आपकी कृपा से वे निर्भय होकर विघ्नों की सेना के ऊपर भी विजय प्राप्त करते हैं।

 जन्म का रहस्य और प्रार्थना

अंत में, देवताओं ने श्रीकृष्ण के जन्म को पृथ्वी के लिए एक महान सौभाग्य बताया। उन्होंने कहा कि हे हरे! आपके जन्म मात्र से ही इस पृथ्वी का भार उतर गया है।


न तेऽभवस्येश भवस्य कारणं विना विनोदं बत तर्कयामहे।

भवो निरोधः स्थितिरप्यविद्या कृता यतस्त्वय्यभयाश्रयात्मनि।।

इस श्लोक में वे कहते हैं कि हे ईश! आप जन्मरहित हैं और आपके जन्म लेने का कारण केवल आपकी लीला ही हो सकता है। आपका जन्म, स्थिति और प्रलय अविद्या द्वारा प्रतीत होते हैं, परमार्थतः नहीं।

स्तुति के अंत में, देवताओं ने भगवान से प्रार्थना की कि जिस प्रकार आपने मत्स्य, कूर्म, वराह और नृसिंह जैसे अवतारों में हमारी और तीनों लोकों की रक्षा की है, उसी प्रकार इस समय भी पृथ्वी का भार दूर कीजिए। उन्होंने माता देवकी से भी कहा कि आपके उदर में साक्षात परम पुरुष ने अवतार लिया है, इसलिए अब कंस से भयभीत होने की कोई आवश्यकता नहीं है।

यह जन्माष्टमी हमें यह स्मरण कराती है कि जब-जब धर्म की हानि होती है, तब-तब भगवान स्वयं अवतरित होते हैं। यह पर्व हमें भक्ति और शरणागति के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है, क्योंकि यही मोक्ष का एकमात्र साधन है।