अतीत की गिरफ्त, वर्तमान की उपेक्षा स्मृति दिवस और सत्ता की प्राथमिकताएं।

 संवाददाता: प्रदीप शुक्ला 

अतीत की गिरफ्त, वर्तमान की उपेक्षा

स्मृति दिवस और सत्ता की प्राथमिकताएं

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के सत्ता संभालने के बाद लिए गए बड़े प्रतीकात्मक फैसलों में एक है—14 अगस्त को विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस के रूप में मनाना। 18वीं सदी के कवि गिरिधर ने कहा था— 

“बीती ताहि बिसारि दे, आगे की सुधि लेय।” 

यानी अतीत से सबक लेकर आगे बढ़ना ही बुद्धिमानी है। पर मोदी सरकार के एजेंडे में अतीत का चयनित पाठ तो है, मगर वर्तमान और भविष्य की ठोस योजना नदारद है। आज़ादी के 75 साल बाद भी जनता की रोज़मर्रा की समस्याओं पर चर्चा करने के बजाय, सरकार का विमर्श नेहरू युग से शुरू होकर मुगलकाल, और जरूरत पड़े तो त्रेतायुग-द्वापर तक खिंच जाता है।

 चयनित अतीत – ब्रिटिश राज का बचाव

विभाजन की पीड़ा को याद करने में कोई बुराई नहीं, लेकिन मोदी सरकार जिस अतीत को चुनती है, उसमें ब्रिटिश राज का ज़िक्र गायब रहता है—मानो गाड़ी का ड्राइवर स्पीड ब्रेकर से बचने के लिए उसे किनारे से काटकर निकल जाए। 18 जुलाई 1947 को ब्रिटिश संसद ने भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम पारित कर विभाजन की प्रक्रिया तय की थी। सीमा रेखा ब्रिटिश वकील सर सिरिल रैडक्लिफ ने खींची, जिसने हिन्दू बहुल क्षेत्र भारत और मुस्लिम बहुल क्षेत्र पाकिस्तान में बांटे। अगर तारीख सचमुच ऐतिहासिक आधार पर चुननी होती, तो 14 अगस्त नहीं बल्कि 18 जुलाई ज्यादा सटीक होती। पर ब्रिटिश भूमिका को छूना, सत्ता के अतीत-प्रेम के एजेंडे में नहीं है।

सावरकर और हिंदू महासभा की भूमिका

इतिहास के पन्ने पलटें तो पाएंगे कि विभाजन की वैचारिक जमीन तैयार करने वालों में हिंदू महासभा और उसके नेता विनायक दामोदर सावरकर भी थे। 1937 के अहमदाबाद अधिवेशन में सावरकर ने साफ कहा—भारत में दो राष्ट्र हैं: हिन्दू और मुस्लिम (समग्र सावरकर वाङ्गमय, खंड 6, पृ. 296)। संघ परिवार के प्रिय इतिहासकार आर.सी. मजूमदार ने भी लिखा—साम्प्रदायिक आधार पर बंटवारे के लिए हिंदू महासभा एक बड़ा कारक थी (Struggle for Freedom, पृ. 611)। डॉ. आंबेडकर ने Pakistan or the Partition of India (1946) में सावरकर की सोच को उजागर किया—वे चाहते थे हिन्दू प्रधान राष्ट्र, और मुस्लिम इसके अधीन सेवक राष्ट्र।

1942 में जब भारत छोड़ो आंदोलन अपने चरम पर था, सावरकर ब्रिटिश सेना में हिंदू युवकों की भर्ती का आह्वान कर रहे थे—"हिंदुओं का सैन्यीकरण करो और राष्ट्र का हिंदूकरण करो"। यही नहीं, बंगाल, सिंध और उत्तर-पश्चिम प्रांत में हिंदू महासभा मुस्लिम लीग के साथ मिलकर सरकार चला रही थी। ये तथ्य भाजपा चाहे जितना छुपाए, मिटा नहीं सकती।

शब्द बनाम कर्म – असली कसौटी

विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस पर मोदी ने लिखा—“भारत हमारे इतिहास के दुखद अध्याय के दौरान झेली गई पीड़ा को याद करता है… अकल्पनीय क्षति का सामना करने और फिर से शुरुआत करने की ताकत का सम्मान करना चाहिए।” सवाल है—अगर यह सम्मान सच्चा है, तो आज नफरत फैलाने वाले नेताओं पर कार्रवाई क्यों नहीं? प्रधानमंत्री खुद कपड़ों से पहचानने वाली राजनीति और धार्मिक नारों पर वोट मांगना क्यों नहीं छोड़ते?

विभाजन के समय लाखों मुसलमान पाकिस्तान नहीं गए, भारत को ही मातृभूमि चुना। आज उन्हीं से देशभक्ति के सबूत मांगना और पाकिस्तान जाने की नसीहत देना, विभाजन की पीड़ा को भुलाना नहीं तो और क्या है?

जब तक सत्ता शब्दों को कर्म में नहीं बदलती, तब तक लालकिले की प्राचीर से गूंजने वाले वाक्य, इतिहास में खोखले नारों की तरह दर्ज होंगे—और यही आज के भारत की सबसे बड़ी विभीषिका है।